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बुजुर्ग ही नहीं, युवाओं को भी शिकार बना रहा गठिया

गठिया को आम तौर पर बुजुर्गों में होने वाली बीमारी समझा जाता है और इसका इलाज भी हड्डी के डॉक्टरों से कराया जाता है, लेकिन रुमैटो आर्थराइटिस एक ऐसी बीमारी है जो बड़ी संख्या में युवा आबादी को अपनी चपेट में ले रहा है।

Author नई दिल्ली | October 18, 2016 2:19 AM

गठिया को आम तौर पर बुजुर्गों में होने वाली बीमारी समझा जाता है और इसका इलाज भी हड्डी के डॉक्टरों से कराया जाता है, लेकिन रुमैटो आर्थराइटिस एक ऐसी बीमारी है जो बड़ी संख्या में युवा आबादी को अपनी चपेट में ले रहा है। इसके बावजूद एम्स जैसे संस्थान में भी अभी तक इसके मरीजों को भर्ती करने के लिए अलग बिस्तर तक नहीं हैं। डॉक्टर मरीजों के इलाज के लिए अपने स्तर पर दूसरे विभागों से जुगाड़ करके काम चला रहे हैं। विश्व गठिया दिवस के मौके पर रविवार को इस बीमारी के बारे में लोगों की भ्रांतियां दूर करने व सही इलाज की समझ पैदा करने के लिए एम्स में परिचर्चा की गई। भारत में गठिया के कितने मरीज हैं, इसका तो कोई आंकड़ा नहीं है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध आंकड़े दिखाते हैं कि विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों में ढाई गुना अधिक मरीज हैं। गठिया पर एनल्स आॅफ रुमैटिक डिजीज 2015 की रपट के मुताबिक, दुनिया भर में किसी बीमारी से जीवन भर की विकलांगता के लिए मजबूर लोगों क ी सूची में इस बीमारी का फीसद 21.23 है। इस लिहाज से मानसिक बीमारी पहले नंबर पर है।

यानी बीमारी की वजह से कुल विकलांग लोगों में 23.2 फीसद लोग मानसिक बीमारी से पीड़ित होने की वजह से अशक्त जीवन जीने को मजबूर हैं। गठिया युवा आबादी को इस कदर अपनी चपेट में ले रहाहै कि अगर इसका इलाज न किया गया तो युवा पीढ़ी के लोग पूरी तरह से विकलांग हो सकते हैं। इस बीमारी के चलते मरीजों में दूसरी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। गठिया पर शोध और इलाज की 2009 की एक रपट के मुताबिक, इससे हार्ट फेल होने का खतरा ढाई गुना बढ़ जाता है। इसके साथ ही लंबे समय तक सूजन वाली गठिया से उच्च रक्तचाप की बीमारी भी हो जाती है। इससे गठिया के मरीजों के श्वसन तंत्र में संक्रमण के खतरे बढ़ जाते हैं। इस संक्रमण के चलते होने वाली मौतों का फीसद 19 से 44 है।

अकेले एम्स में ही आठ-नौ महीनो में गठिया के करीब 24000 मरीज आए, जिनमें एक चौथाई नए मरीज थे और उन्हें ओपीडी में इलाज दिया गया। इनमें से कई को भर्ती करने की जरूरत भी पड़ी। इसके बावजूद इस बीमारी पर लंबे समय तक लगातार कड़े संघर्ष के बाद एम्स में विभाग बनाने में अब जाकर सफलता मिली। यहां के चार रुमैटोलॉजिस्ट में से महज एक डॉ उमा कुमार ने ही एम्स में काम जारी रखा, बाकी तीन 2009 में ही निजी अस्पतालों में चले गए थे। देश भर में लाखों मरीजों के बावजूद कुल 200 डॉक्टर ही हंै जो रुमैटोलॉजिस्ट हैं।

डॉ कुमार ने बताया कि इस बीमारी को लेकर लोगों ही नहीं बल्कि डॉक्टरों में भी जागरूकता की कमी है। लिहाजा कभी मरीज खुद से तो कभी डॉक्टरों से रेफर होकर हड्डी के डॉक्टरों के पास इलाज के लिए जाते हैं। जहां स्टेरॉयड से इलाज किया जाता है जबकि गठिया के सभी मरीजों को स्टेरॉयड की जरूरत नहीं होती है। गठिया 200 तरह की होती है, जिसके कारण मुख्य रूप से जीवनशैली संबंधी गड़बड़ी संक्रमण और अन्य कारणों से होती है। इसको लेकर तरह-तरह की भ्रंतियां इलाज की राह में आज भी रोड़ा हैं। सही व समय पर इलाज से गठिया के खराब मामलों में भी मरीज का जीवन स्तर बेहतर व आसान किया जा सकता है। सामान्य डॉक्टरों को भी इस बीमारी के बारे में जागरूक व प्रशिक्षित किए जाने की जरूरत है ताकि ज्यादा से ज्यादा मरीजों को राहत ही जा सके।

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