आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और बढ़ते स्क्रीन टाइम ने हमारी नींद पर गहरा असर डाला है। अक्सर लोग नींद की कमी को सिर्फ अगले दिन की थकान या सुस्ती समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार यह एक साइलेंट किलर साबित हो सकती है। पल्मोनरी क्रिटिकल केयर एवं स्लीप मेडिसिन विशेषज्ञ, All India Institute of Medical Sciences Bhopal में काम कर चुकी Dr. Kirti Kadian के मुताबिक लंबे समय तक नींद की कमी न सिर्फ मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, बल्कि शरीर को कई गंभीर बीमारियों के खतरे में भी डाल सकती है।

AIIMS में की गई BLESS कोहोर्ट स्टडी में भारत में ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया की व्यापकता और उससे जुड़े जोखिम कारकों का विश्लेषण किया गया। यह अध्ययन BLESS (Biomarker and Lifestyle Epidemiology of Sleep Study) के डेटा पर आधारित था, जिसका उद्देश्य भारतीय आबादी में स्लीप एपनिया की स्थिति को समझना था। इस रिसर्च का मुख्य मकसद यह जानना था कि भारत में ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया कितनी आम समस्या है, किन लोगों में इसका खतरा ज्यादा होता है और यह किन स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा हुआ है। World Sleep Day के मौके पर AIIMS की विशेषज्ञ से जानते हैं कि भारत में स्लीप डिसऑर्डर कितना आम है, नींद की कमी से किन बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है और इसका सही इलाज क्या है।

भारत में स्लीप डिसऑर्डर कितना आम है?

डॉक्टर के अनुसार भारत में स्लीप डिसऑर्डर काफी आम है, लेकिन बहुत से लोगों को इसके बारे में पता ही नहीं होता। एक स्टडी में यह पाया गया कि सामान्य दिखने वाले लोगों में भी लगभग 30% लोगों में मॉडरेट से लेकर सीवियर ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया (OSA) पाया गया। कई लोगों में इसके स्पष्ट लक्षण भी नहीं दिखाई देते, जबकि कुछ लोगों में खर्राटे जैसे लक्षण होते हैं। जिन लोगों में लक्षण दिखाई देते हैं, उनमें 60–80% मरीजों में स्लीप एपनिया पाया जाता है। इसलिए इस समस्या को अक्सर लोग सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि यह एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या हो सकती है।

स्लीप डिसऑर्डर का डायग्नोसिस कैसे किया जाता है?

  • स्लीप डिसऑर्डर का सही निदान करने के लिए स्लीप स्टडी (पॉलीसोम्नोग्राफी) की जाती है। इस टेस्ट में कई चीजों की जांच होती है जैसे:
  • EEG (इलेक्ट्रोएन्सेफेलोग्राम), इससे नींद के अलग-अलग चरणों का पता चलता है।
  • श्वसन संबंधी डेटा,  इससे ये पता चलता है कि मरीज की सांस लेने की प्रक्रिया कैसी है।
  • ऑक्सीजन सैचुरेशन,  इससे यह देखा जाता है कि नींद के दौरान शरीर में ऑक्सीजन का स्तर कितना है।
  • इन सभी आंकड़ों के आधार पर डॉक्टर यह तय करते हैं कि मरीज को स्लीप एपनिया है या नहीं।

स्लीप एपनिया का दिल और ब्लड प्रेशर पर क्या असर पड़ता है?

  • डॉक्टर के अनुसार स्लीप एपनिया का सबसे पहले असर ब्लड प्रेशर पर पड़ता है। अक्सर मरीजों में रात के समय ही ब्लड प्रेशर बढ़ना शुरू हो जाता है और धीरे-धीरे उन्हें हाइपरटेंशन यानी हाई बीपी की समस्या हो जाती है। जिन लोगों को स्लीप एपनिया होता है, उनमें आगे चलकर दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है जैसे
  • एट्रियल फाइब्रिलेशन
  • हार्ट अटैक
  • दूसरी कार्डियोवैस्कुलर बीमारियां
  • कुछ स्टडी में यह भी पाया गया है कि स्लीप एपनिया वाले लोगों में दिल और दिमाग से जुड़ी बीमारियों का खतरा 40% से 80% तक बढ़ सकता है।

क्या स्लीप एपनिया से स्ट्रोक और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों का खतरा बढ़ता है?

  • डॉक्टर के अनुसार स्लीप एपनिया का असर केवल दिल पर ही नहीं बल्कि दिमाग पर भी पड़ता है। इससे 
  • स्ट्रोक
  • दौरे (सीजर)
  • लकवा (पैरालिसिस)
  • ऐसी स्थितियों में 40–80% तक जोखिम बढ़ सकता है, इसलिए समय पर इसका इलाज करना बहुत जरूरी होता है।

स्लीप एपनिया में शरीर में क्या होता है?

स्लीप एपनिया में व्यक्ति की नींद बार-बार टूटती है, जिससे लगातार और गहरी नींद नहीं मिल पाती।
इससे शरीर में सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम बार-बार सक्रिय हो जाता है।

हार्मोनल बदलाव नींद को कैसे प्रभावित करते हैं?

नींद की कमी से कॉर्टिसोल हॉर्मोनल में होता है बदलावनींद के दौरान कॉर्टिसोल (Stress hormone) हॉर्मोम का स्तर कम होना चाहिए, लेकिन स्लीप एपनिया में इनका स्तर बढ़ा रहता है। इसी वजह से शरीर में कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं शुरू हो जाती हैं।

क्या स्लीप एपनिया मोटापा बढ़ा सकता है?

डॉक्टर के अनुसार स्लीप एपनिया और नींद की कमी से भूख को नियंत्रित करने वाले हार्मोन प्रभावित हो जाते हैं। घ्रेलिन (Ghrelin) यह हार्मोन भूख बढ़ाता है और इसका स्तर बढ़ जाता है। लेप्टिन (Leptin) हार्मोन पेट भरने का संकेत देता है और इसका स्तर कम हो जाता है। इसके कारण व्यक्ति को बार-बार भूख लगती है और वह ज्यादा खाने लगता है। इससे बिंज ईटिंग और मोटापा बढ़ने लगता है।

क्या स्लीप एपनिया से डायबिटीज का खतरा बढ़ता है?

नींद की कमी और स्लीप एपनिया से इंसुलिन का असर कम हो जाता है, जिसे इंसुलिन रेजिस्टेंस कहा जाता है। इससे शरीर में ग्लूकोज का मेटाबॉलिज्म प्रभावित होता है और धीरे-धीरे डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। मोटापा और स्लीप एपनिया मिलकर एक विषैला चक्र (vicious cycle) बना देते हैं, जिससे कई स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ती जाती हैं।

स्लीप एपनिया से और कौन-कौन सी समस्याएं हो सकती हैं?

अगर लंबे समय तक स्लीप एपनिया का इलाज नहीं किया जाए तो कई जटिलताएं हो सकती हैं जैसे

  • हाई ब्लड प्रेशर
  • दिल की बीमारियां
  • न्यूरोलॉजिकल समस्याएं
  • याददाश्त कमजोर होना
  • थकान और कमजोरी
  • समय के साथ इन समस्याओं की गंभीरता बढ़ती जाती है।

अच्छी नींद के लिए स्लीप हाइजीन के क्या टिप्स हैं?

डॉक्टर के अनुसार अच्छी नींद के लिए सही स्लीप हाइजीन बहुत जरूरी है। इसके लिए कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए जैसे

  • सोने का कमरा शांत, ठंडा और अंधेरा होना चाहिए।
  • सोने से पहले मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल कम करें।
  • स्क्रीन की रोशनी से मेलाटोनिन हार्मोन का स्राव कम हो जाता है, जो नींद के लिए जरूरी होता है।
  • दिनभर सक्रिय रहना चाहिए ताकि रात में अच्छी नींद आ सके।
  • रात में भारी एक्सरसाइज करने से बचें। अगर करनी हो तो केवल हल्की स्ट्रेचिंग करें।
  • डाइट का ध्यान रखें। डाइट में शुगर की मात्रा कम और प्रोटीन की मात्रा अधिक करें।

डिस्क्लेमर:

यह लेख केवल शैक्षणिक और सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें दी गई सलाह किसी पेशेवर चिकित्सा परामर्श, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है। अपनी जीवनशैली या सोने के पैटर्न में कोई भी बड़ा बदलाव करने से पहले, कृपया अपने डॉक्टर या किसी योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें। जंसत्ता इस जानकारी की व्यक्तिगत व्याख्या या उससे होने वाले किसी भी प्रभाव के लिए जिम्मेदार नहीं है।