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विश्व ऑटिज्म दिवस पर विशेषः ऑटिज्म से जूझ रहे बच्चे भी बनते हैं आत्मनिर्भर

गाजियाबाद में रहने वाली आरती बताती हैं कि ‘मैं एक ऑटिस्टिक (ऑटिज्म से पीड़ित) बच्चे की मां हूं और रोजमर्रा की जिंदगी में अपने बच्चे के साथ होने वाले सामान्य व्यवहार की साक्षी हूं।

ऑटिस्टिक लोग भी पार्टी, समारोह आदि उतनी ही पसंद करते हैं, जितना कि हम सब लेकिन वे अपनी पसंद को अलग तरीके से जाहिर करते हैं।

आशीष दुबे

गाजियाबाद में रहने वाली आरती बताती हैं कि ‘मैं एक ऑटिस्टिक (ऑटिज्म से पीड़ित) बच्चे की मां हूं और रोजमर्रा की जिंदगी में अपने बच्चे के साथ होने वाले सामान्य व्यवहार की साक्षी हूं। यही कारण है कि मैंने आंकड़ों से हटकर तथ्यों को केंद्र बिंदु मानकर अब छह साल के हो चुके अपने छोटे बेटे को पूरी तरह से आत्मनिर्भर बना लिया है’। आरती न केवल ऑटिज्म से पीड़ित अपने बेटे को विशेष स्कूल के बजाए गाजियाबाद के निजी स्कूल में पढ़ा रही हैं। उनका कहना है कि पहली कक्षा में वह अन्य बच्चों के साथ घुल मिलकर पूरी तरह सामान्य हो गया है। ऑटिस्टिक लोग भी पार्टी, समारोह आदि उतनी ही पसंद करते हैं, जितना कि हम सब लेकिन वे अपनी पसंद को अलग तरीके से जाहिर करते हैं। ऑटिज्म से संबंधित जानकारियां चिकित्सकों, थैरेपिस्ट, साइकोलॉजिस्ट जैसे लोगों से ही मिलती है। जिस कारण एक सामान्य इंसान चाह कर भी उनके कठिन परीक्षण (डायग्नोसिस) को सामान्य नहीं मान सकता। इसलिए ऑटिस्टिक बच्चों के माता-पिता ही समाज के लोगों को जागरूक कर सकते हैं।

आरती ने ऑटिज्म पीड़ित बच्चे की देखभाल के लिए नामी कंपनी की नौकरी छोड़ दी है। ऑटिज्म पीड़ित बच्चे को सामान्य बनाते हुए उन्होंने, ‘बोल हल्के-हल्के’ शीर्षक से दो पुस्तकें भी लिखी हैं। उनके मुताबिक ऑटिज्म पीड़ित बच्चे की परवरिश में व्यवहारिक पहलुओं को जानना जरूरी है। आरती बताती हैं कि इससे पीड़ित ज्यादातर बच्चे आंख मिलाकर बात करना पसंद नहीं करते हैं।

बहुत सारी थैरेपी के बाद उन्हें आंख मिलाकर बात करना आ भी जाए, तो भी यह उनके लिए सहूलियत भरा नहीं होता है। खासकर अंजान लोगों के साथ। इसका मतलब यह कतई नहीं होता है कि वह ध्यान नहीं दे रहे हैं। बिना आंख मिलाए भी वे आपकी बातों को बहुत अच्छी तरह समझ लेते हैं। इसलिए आंख मिलाकर देखना या न देखना उनकी सहूलियत पर रहने दीजिए। वह बताती हैं कि हम ऑटिस्टिक लोगों को ज्यादा से ज्यादा समझ सकें, ताकि इन्हें समाज की मुख्य धारा में शामिल होने में परेशानी ना हो। अगर परिवार एवं समाज के स्तर पर ऑटिस्टिक लोगों के प्रति समझ बढ़ेगी, तभी उनकी सहभागिता आगे चलकर सर्वप्रथम विद्यालयों में एवं बाद में सार्वजनिक जीवन में बढ़ पाएगी।

पीड़ितों के कुछ सामान्य लक्षण
कुछ व्यवहार या हरकतें बार-बार दोहराना
मसलन बैठे हुए भी शरीर को आगे पीछे हिलाते रहना, हाथ फड़फड़ाना, किसी जगह पर गोल-गोल घूमना आदि।
किसी के मुस्कुराकर देखने पर न मुस्कुराना
स्वयं की दुनिया में तल्लीन रहना
तेज आवाज या तेज रोशनी को पसंद न करना
आपसी संवाद में कम रुचि दिखलाना

विश्व में 59 में एक बच्चा इससे पीड़ित
हर साल 2 अप्रैल को विश्व ऑटिज्म दिवस का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि विश्व में 59 में से एक बच्चा आॅटिस्टिक है। ऑटिज्म मस्तिष्क के विकास के दौरान होने वाला विकार है, जो व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार और संपर्क को प्रभावित करता है। इसके लक्षण जन्म या बाल्यावस्था से ही नजर आने लगते हैं।

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