गर्मियों के मौसम में जब थर्मामीटर का पारा 43°C छूता है, तो पसीने से तर-बतर होना लाजिमी है। शिद्दत की ये गर्मी सिर्फ हम भारतीयों को ही नहीं बल्कि यूरोप के लोगों को भी रुला रही है। इस समय यूरोप भीषण हीटवेव (Heatwave) की चपेट में है। फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, यूके, ऑस्ट्रिया, हंगरी, स्विट्जरलैंड, पोलैंड और नीदरलैंड जैसे देशों में पारा 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है, जिसमें कई जगह पुराने तापमान के रिकॉर्ड टूट गए हैं। इस समय भारत में भी भीषण गर्मी है यहां भी कई राज्यों में पारा 45°C को पार कर चुका है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यूरोप और भारत में समान तापमान होने के बावजूद यूरोप में पड़ने वाली 43 डिग्री की गर्मी, भारत की उतनी ही गर्मी के मुकाबले इंसानी शरीर को कहीं ज्यादा बेहाल कर रही है?
यूरोप इन दिनों भीषण हीटवेव की चपेट में है। इस बीच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट ने नई बहस छेड़ दी है। यूजर उमेद प्रताप सिंह ने X पर लिखा क्या यूरोप में 43°C और भारत में 43°C अलग होता है? यहां तो तापमान 48°C तक पहुंच जाता है। यह पोस्ट तेजी से वायरल हो गया जिसके बाद कई लोगों ने बताया कि एक जैसा तापमान होने के बावजूद दोनों जगहों पर गर्मी का एहसास अलग क्यों होता है। आइए जानते हैं कि यूरोप की 43°C की गर्मी भारत के 43°C से ज्यादा क्यों रुला रही है?
यूरोप की 43°C की गर्मी भारत के 43°C से ज्यादा क्यों रुला रही है?
यूरोप की 43°C की गर्मी भारत के 43°C से ज्यादा खतरनाक है, ये बात पहली नजर में हैरान करने वाली लग सकती है, लेकिन इसके पीछे एक गहरा और ठोस वैज्ञानिक कारण है। मौसम वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के अनुसार, यूरोप की भौगोलिक स्थिति, हवा में नमी (Humidity) का स्तर और वहां के घरों की बनावट इस सामान्य से दिखने वाले तापमान को वहां के लोगों के लिए बेहद खतरनाक बना देती है। यूरोप का कूलिंग सिस्टम भारत के कूलिंग सिस्टम से पूरी तरह अलग है। वहां ज्यादातर घरों में एयर कंडीशनर नहीं होते। बहुत कम घरों में पंखे लगे होते हैं। कई अपार्टमेंट्स में खिड़कियां भी पूरी तरह नहीं खुलतीं और केवल लगभग 10 डिग्री तक ही खोली जा सकती हैं। यूरोप का इंफ्रास्ट्रक्चर ठंडे मौसम को ध्यान में रखकर बनाया गया है। वहां 43°C की गर्मी भारत के 55°C जैसी महसूस हो सकती है। कुदरत के कहर से परेशान होकर अब लोग मजबूरी में पोर्टेबल एसी खरीद रहे हैं। गर्मी बढ़ाने में नमी (Humidity) भी अहम भूमिका निभाती है। तटीय इलाकों में नमी ज्यादा होती है इसलिए वहां 35°C तापमान भी बेहद असहनीय लगता है।
एक जैसा तापमान फिर भी यूरोप ज्यादा परेशान, डॉक्टर ने बताई वजह
एलीट केयर क्लिनिक के कंसल्टेंट फिजिशियन डॉ. पल्लेटी शिवा कार्तिक रेड्डी बताते हैं कि 43°C तापमान मानव शरीर के लिए किसी भी देश में समान रूप से चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन आसपास का वातावरण यह तय करता है कि यह कितना खतरनाक साबित होगा। एक्सपर्ट के मुताबिक हवा में नमी, सीधी धूप, हवा की गति, रात में तापमान कितना गिरता है और शहरों में गर्मी कितनी देर तक बनी रहती है, जैसे कारक शरीर पर पड़ने वाले गर्मी के असर को काफी हद तक प्रभावित करते हैं। वहीं, ग्लेनीगल्स हॉस्पिटल, मुंबई की इंटरनल मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. मंजुषा अग्रवाल कहती हैं कि 43°C का तापमान किसी भी जगह शरीर पर दबाव डालता है, लेकिन व्यक्ति इसे कैसे महसूस करेगा यह वातावरण पर निर्भर करता है। एक्सपर्ट के मुताबिक ज्यादा नमी होने पर पसीना जल्दी नहीं सूखता, जबकि कंक्रीट की इमारतें और खराब वेंटिलेशन की वजह से शरीर के लिए ठंडा होना मुश्किल होता है। इससे हीट एग्जॉशन (Heat Exhaustion) और हीट स्ट्रोक (Heat Stroke) का खतरा बढ़ जाता है।
भारत और यूरोप के लोगों में गर्मी सहने की क्षमता भी है अलग
डॉ. रेड्डी बताते हैं कि भारत के कई हिस्सों में हर साल लंबे समय तक तेज गर्मी पड़ती है। ऐसे में यहां के लोगों का शरीर और जीवनशैली काफी हद तक इस मौसम के अनुरूप ढल चुकी है। इसके विपरीत, यूरोप के अधिकांश क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से गर्मियां अपेक्षाकृत ठंडी रहती हैं। इसलिए अचानक आने वाली भीषण हीटवेव वहां के लोगों और पूरे सिस्टम के लिए बड़ी चुनौती बन जाती है। एक्सपर्ट ने बताया कि शहरों का ढांचा भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जहां पेड़ कम हों, इमारतें गर्मी ज्यादा सोखती हों और हवा का आवागमन कम हो, वहां समान तापमान भी अधिक गर्म महसूस होता है।
घरों का डिजाइन और एयर कंडीशनर क्यों हैं अहम?
डॉ. मंजुषा अग्रवाल के अनुसार जिन घरों में एयर कंडीशनर नहीं होते, जहां इमारतें गर्मी रोककर रखने के लिए बनाई गई हों और प्राकृतिक वेंटिलेशन कम हो, वहां लंबे समय तक घर के अंदर भी तापमान बहुत अधिक बना रहता है। इससे डिहाइड्रेशन, हीट एग्जॉशन, हीट स्ट्रोक और पहले से मौजूद दिल, फेफड़ों तथा किडनी से जुड़ी बीमारियों के गंभीर होने का खतरा बढ़ जाता है। यह जोखिम खासतौर पर बुजुर्गों और क्रोनिक बीमारियों से पीड़ित लोगों में अधिक होता है।
यूरोप के घर बढ़ाते हैं गर्मी
डॉ. रेड्डी बताते हैं कि यूरोप के अधिकांश घर लंबे और ठंडे सर्दियों के मौसम को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। इनमें मोटा इंसुलेशन, छोटी खिड़कियां और सीमित क्रॉस-वेंटिलेशन होता है, जिससे गर्मियों में घर के अंदर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती। उन्होंने कहा कि जब शरीर लंबे समय तक गर्मी में रहता है और उसे पर्याप्त ठंडक नहीं मिलती, तो शरीर की तापमान नियंत्रित करने की क्षमता प्रभावित होने लगती है। इससे डिहाइड्रेशन, हीट एग्जॉशन और हीट स्ट्रोक का खतरा काफी बढ़ जाता है।
नमी कैसे बढ़ा देती है गर्मी का असर?
डॉ. रेड्डी बताते हैं कि हमारा शरीर मुख्य रूप से पसीने के जरिए खुद को ठंडा करता है। जब पसीना स्किन से वाष्प बनकर उड़ता है, तब शरीर की अतिरिक्त गर्मी बाहर निकल जाती है। लेकिन यदि हवा में पहले से ही नमी अधिक हो, तो पसीना आसानी से नहीं सूखता। ऐसे में शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती और व्यक्ति को ज्यादा गर्मी महसूस होती है। इसी वजह से 35°C तापमान में यदि नमी ज्यादा हो तो कई बार 43°C की सूखी गर्मी से भी ज्यादा असहनीय और खतरनाक महसूस हो सकता है। एक्सपर्ट के मुताबिक ‘फील्स लाइक’ (Feels Like) तापमान वास्तव में यह बताता है कि शरीर पर गर्मी का वास्तविक प्रभाव कितना पड़ रहा है। इसलिए केवल थर्मामीटर पर दिखने वाला तापमान ही नहीं, बल्कि नमी, हवा और दूसरे पर्यावरणीय कारकों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। यही कारण है कि कई बार कम तापमान भी अधिक खतरनाक महसूस हो सकता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी और जिन विशेषज्ञों से हमने बात की, उनकी राय पर आधारित है। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी सलाह या दिनचर्या अपनाने से पहले अपने डॉक्टर से परामर्श जरूर लें।
