एशल 25 साल की है और हर वक्त थकान,सिरदर्द और शरीर के अलग-अलग हिस्सों में दर्द से परेशान रहती है। बॉडी के एक अंग का इलाज करना चाहती है तो दूसरी नई कोई तकलीफ पैदा हो जाती है। दर्द और डॉक्टरों का सिलसिला बदस्तूर जारी रहता है। एक्स-रे, एमआरआई या ब्लड रिपोर्ट्स पूरी तरह नॉर्मल आती हैं लेकिन दर्द और तकलीफ का पता नहीं चलता। एशल की ये समस्या शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक है जिसे मेडिकल भाषा में Somatic Symptom Disorder कहा जाता है। इसमें व्यक्ति को वास्तव में शारीरिक दर्द होता है, लेकिन उसकी जड़ें हमारे मानसिक स्वास्थ्य और तनाव से जुड़ी होती हैं। कभी-कभी हमारा शरीर उन तकलीफों को बयान करता है जिन्हें शब्द नहीं मिल पाते। जानते हैं मन और शरीर का यह जटिल संबंध क्या है और इसका सही उपचार कैसे संभव है।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। सोमैटिक सिम्पटम डिसऑर्डर या किसी भी स्वास्थ्य समस्या के सटीक निदान के लिए किसी योग्य मनोचिकित्सक या डॉक्टर से व्यक्तिगत परामर्श जरूर लें।
दिमाग और दर्द के शॉर्ट सर्किट को रिसर्च से समझें
Harvard Health और Mayo Clinic की रिसर्च के मुताबिक Somatic Symptom Disorder(SSD) में दिमाग का एंटीरियर सिंगुलेट कॉर्टेक्स (Anterior Cingulate Cortex) जो दर्द के प्रति भावनाओं को प्रोसेस करता है, वो अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है। ऐसी स्थिति में रिपोर्ट्स नॉर्मल आती हैं क्योंकि हड्डियों या खून में कोई खराबी नहीं होती, लेकिन दिमाग का ‘पेन सेंटर’ शरीर को लगातार दर्द के सिग्नल भेज रहा होता है। इसे सेंट्रल सेंसिटाइजेशन कहा जाता है।
American Psychological Association (APA) के अनुसार, जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक तनाव, दुख या ट्रॉमा को व्यक्त नहीं कर पाता, तो शरीर उसे शारीरिक भाषा में बदल देता है। इसे सोमैटाइजेशन (Somatization) कहते हैं। रिसर्च दिखाती है कि बचपन का कोई तनाव या वर्तमान की चिंता सिरदर्द या क्रोनिक थकान के रूप में बाहर आती है। The Lancet में प्रकाशित एक रिसर्च के अनुसार, SSD के मरीज अक्सर ‘डॉक्टर शॉपिंग यानी बार बार डॉक्टर बदलते रहते हैं। 25-50% प्राथमिक चिकित्सा (OPD) के मामले ऐसे होते हैं जिनका कोई स्पष्ट शारीरिक कारण नहीं मिलता। एशल की तरह मरीज को लगता है कि डॉक्टर उसकी बीमारी समझ नहीं पा रहे, जबकि समस्या ‘न्यूरोलॉजिकल’ न होकर ‘साइकोलॉजिकल’ होती है।
SSD पर साइकोलोजिस्ट क्या कहते हैं?
फोर्टिस हॉस्पिटल, शालीमार बाग, दिल्ली में डायरेक्टर ऑफ एकेडमिक, अदायु माइंडफुलनेस (फोर्टिस नेटवर्क हॉस्पिटल) में हेड ऑफ डिपार्टमेंट और वरिष्ठ कंसल्टेंट मनोचिकित्सक डॉ. विशाल छाबड़ा ने बताया यह परेशानी व्यक्ति की पूरी जिंदगी को प्रभावित कर सकती है। अगर मरीज ठीक नहीं होता, तो उसकी जिंदगी उसके दर्द और लक्षणों के इर्द-गिर्द ही घूमने लगती है। वह सामान्य जीवन जीना लगभग छोड़ देता है, बार-बार डॉक्टर के पास जाता है, घर में ही सीमित हो जाता है और बाहर निकलने से बचता है। उसे डर रहता है कि कहीं कोई नया दर्द या समस्या न हो जाए, जिससे उसकी लाइफ काफी सीमित हो जाती है। भले ही शारीरिक रूप से गंभीर बीमारी न हो, लेकिन उसकी क्वालिटी ऑफ लाइफ काफी खराब हो जाती है।
SSD के 5 मुख्य संकेत
- 6 महीने से अधिक समय तक शारीरिक दर्द का बने रहना।
- रिपोर्ट नॉर्मल होने के बावजूद अत्यधिक चिंता करना।
- दिन का अधिकांश समय लक्षणों के बारे में सोचने में बिताना।
- बार-बार डॉक्टर बदलना (Doctor Shopping)।
- दर्द के कारण सामान्य काम या ऑफिस जाने में असमर्थता।
SD की समस्या क्या समय के साथ गंभीर होती है?
SSD की परेशानी बहुत तेजी से नहीं बढ़ती, लेकिन इसका पैटर्न वैक्सिंग और वेनिंग होता है। यानी कभी लक्षण बढ़ जाते हैं और कभी कम हो जाते हैं। यह ऊपर-नीचे चलता रहता है।
क्या इसका संबंध एंग्जायटी या डिप्रेशन से होता है?
सोमैटिक सिम्पटम डिसऑर्डर के मरीजों में एंग्जायटी और डिप्रेशन दोनों हो सकते हैं। कई बार ये समस्याएं साथ-साथ चलती हैं और मरीज को मानसिक रूप से ज्यादा परेशान करती हैं। इस परेशानी का डायग्नोसिस डॉक्टर या साइकियाट्रिस्ट करते हैं। आमतौर पर तब शक होता है जब मरीज बार-बार शारीरिक लक्षणों की शिकायत करता है, लेकिन जांच में कोई स्पष्ट कारण नहीं मिलता।
SSD की बीमारी का पता कैसे चलता है?
सोमैटिक सिम्पटम डिसऑर्डर का पता लगाने के लिए कोई खास मेडिकल टेस्ट नहीं होता। डॉक्टर मरीज के व्यवहार, लक्षणों और मेडिकल हिस्ट्री के आधार पर इसका आकलन करते हैं।
इस परेशानी में क्या मरीज को सच में शारीरिक दर होता है?
आपको बता दें कि इस मानसिक बीमारी में मरीज को सचमुच शारीरिक दर्द होता है। यह सिर्फ कल्पना नहीं होती। अगर उसके दर्द को नजरअंदाज किया जाए या उसे झुठलाया जाए, तो उसकी परेशानी और बढ़ सकती है।
इसका इलाज कैसे किया जाता है?
इस मानसिक बीमारी का इलाज दवाइयों से किया जाता है जो दर्द का एहसास कम कराने में मदद करती हैं। इसके अलावा, अगर मरीज को एंग्जायटी या डिप्रेशन भी है, तो उसका भी इलाज किया जाता है। इस मानसिक बीमारी का इलाज कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी (CBT) से किया जाता है जो सबसे ज्यादा उपयोगी मानी जाती है। इसमें मरीज को सिखाया जाता है कि दर्द के बावजूद वह अपनी जिंदगी को कैसे बेहतर तरीके से जी सकता है। साथ ही उसे यह समझाया जाता है कि इसके लक्षणों का संबंध स्ट्रेस से भी हो सकता है और स्ट्रेस को कैसे कम किया जाए।
फैमिली और फ्रेंड का स्पोर्ट रखता है मायने
इस परेशानी से उबरने में परिवार और दोस्तों का सपोर्ट बहुत जरूरी होता है। मरीज का मजाक उड़ाना या उसे “ड्रामा” कहना उसकी स्थिति को और खराब कर सकता है। इसके बजाय उसे समझना और सहयोग देना जरूरी है।
मरीज खुद इस समस्या को कैसे मैनेज कर सकता है?
मरीज इस परेशानी से बाहर आने के लिए नियमित रूप से डॉक्टर के संपर्क में रहे। अगर जरूरत हो, तो साइकियाट्रिस्ट से काउंसलिंग लेनी चाहिए। परेशानी का इलाज करने के लिए लाइफस्टाइल में बदलाव करना भी बहुत जरूरी है। समय पर सोना-उठना, हेल्दी खाना, नियमित एक्सरसाइज, लोगों से बातचीत करना और डर का सामना करना-ये सभी चीजें मरीज की स्थिति को बेहतर बना सकती हैं। यह जानलेवा या बहुत गंभीर बीमारी नहीं है, लेकिन मरीज की जिंदगी को काफी प्रभावित कर सकती है। वह दिनभर अपनी बीमारी को लेकर परेशान रह सकता है और कुछ भी प्रोडक्टिव नहीं कर पाता। इससे उसकी क्वालिटी ऑफ लाइफ बहुत खराब हो जाती है।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। सोमैटिक सिम्पटम डिसऑर्डर या किसी भी स्वास्थ्य समस्या के सटीक निदान के लिए किसी योग्य मनोचिकित्सक या डॉक्टर से व्यक्तिगत परामर्श जरूर लें।
