शिवम की उम्र करीब 24 साल है। उसकी अकादमिक पढ़ाई लगभग पूरी हो चुकी है और अब वह नौकरी की तलाश में है। लेकिन करियर को लेकर वह लगातार असमंजस में रहता है। कभी उसे लगता है कि अपना बिजनेस शुरू करना चाहिए, तो कभी नौकरी करना बेहतर विकल्प लगता है। यही स्थिति उसकी रोजमर्रा की जिंदगी के छोटे-बड़े फैसलों में भी दिखाई देती है। वह किसी निर्णय पर पहुंचने से पहले बार-बार सोचता है, विकल्पों को तौलता है, फिर भी सही फैसला लेने को लेकर आश्वस्त नहीं हो पाता।
यहां तक कि शादी या त्योहार के लिए खरीदारी करते समय भी वह अकेले अपने लिए आउटफिट तक तय नहीं कर पाता। जब माता-पिता उससे शादी को लेकर सवाल करते हैं, तब भी वह कोई स्पष्ट निर्णय नहीं ले पाता। यानी उसके लिए छोटे से छोटा फैसला लेना भी तनाव और उलझन का कारण बन जाता है। मनोवैज्ञानिक संदर्भ में Decision Paralysis ऐसी स्थिति को कहा जाता है, जिसमें व्यक्ति विकल्पों और संभावित परिणामों के बारे में इतना अधिक सोचने लगता है कि उसके लिए निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है। हालांकि, हर बार निर्णय लेने में परेशानी होना अपने आप में कोई मानसिक बीमारी नहीं है; इसके पीछे चिंता, परफेक्शनिज्म, आत्मविश्वास की कमी या गलत फैसला लेने का डर जैसे कई कारण हो सकते हैं।
किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता,
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता।
ये पंक्तियां मशहूर ग़ज़लकार निदा फ़ाज़ली की हैं। जो डिसीजन पैरालिसिस से पीड़ित लोगों को इस मानसिक स्थिति से उभरने में मदद कर सकती हैं।
डिसीजन पैरालिसिस क्या होता है?
फोर्टिस हेल्थकेयर में अदायु माइंडफुलनेस हॉस्पिटल में सलाहकार मनोचिकित्सक डॉ. नेहा अग्रवाल ने जनसत्ता को बताया डिसीजन पैरालिसिस का मतलब है फैसला लेने में असमर्थ होना। इसमें व्यक्ति के सामने कई विकल्प होते हैं और वह हर विकल्प के फायदे-नुकसान पर बहुत ज्यादा सोचता है, लेकिन इसके बावजूद किसी एक निर्णय पर नहीं पहुंच पाता। वह लगातार सोचता रहता है कि कौन-सा विकल्प सही होगा या कहीं उससे कोई गलती तो नहीं हो जाएगी।
डिसीजन पैरालिसिस क्यों होता है, डिप्रेशन में क्यों बढ़ सकती है फैसला लेने की परेशानी?
डिप्रेशन में व्यक्ति की Decision Making Capacity प्रभावित हो सकती है। उसे किसी फैसले के फायदे और नुकसान दोनों दिखाई देते हैं, लेकिन लगातार सोचने और लो मूड की वजह से मानसिक थकान बढ़ जाती है। थका हुआ दिमाग फैसला लेने से बचने लगता है। इसके अलावा डिप्रेशन में आत्मविश्वास कम होने और Fear of Failure यानी गलत फैसला हो जाने के डर के कारण भी व्यक्ति निर्णय लेने से कतराता है।
OCD में भी हो सकता है डिसीजन पैरालिसिस
OCD में कई बार व्यक्ति में परफेक्शनिज्म देखने को मिलता है। वह किसी फैसले को लेकर बार-बार हां और ना के बीच उलझ सकता है। उसे दोनों विकल्प सही भी लग सकते हैं और दोनों से जुड़े फायदे-नुकसान या संभावित खतरे भी दिखाई दे सकते हैं। इसी वजह से वह लगातार सोचता रहता है और किसी एक निर्णय पर पहुंचना मुश्किल हो जाता है।
एंग्जायटी भी हो सकती है वजह
एंग्जायटी डिसीजन पैरालिसिस का कारण भी हो सकती है और इसका परिणाम भी। जब व्यक्ति बहुत ज्यादा चिंतित या परेशान होता है, तो उसका भावनात्मक दिमाग ज्यादा सक्रिय हो जाता है और तार्किक तरीके से सोचकर निर्णय लेना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में व्यक्ति अपने फैसले पर भरोसा नहीं कर पाता और गलत निर्णय लेने का डर उस पर हावी रहता है।
नींद की कमी और मानसिक थकान का असर
दिमाग के थके होने पर निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। अगर कोई व्यक्ति पूरी रात नहीं सोया है या लगातार काम, तनाव और दूसरी जिम्मेदारियों के कारण मानसिक रूप से थका हुआ है, तो उसके लिए आसान से आसान फैसला लेना भी मुश्किल हो सकता है। यही वजह है कि छात्रों को भी पर्याप्त नींद लेने की सलाह दी जाती है, क्योंकि थका हुआ दिमाग एकाग्रता और निर्णय लेने दोनों को प्रभावित कर सकता है।
परफेक्शनिज्म और डिसीजन पैरालिसिस में अंतर
परफेक्शनिज्म और डिसीजन पैरालिसिस अलग-अलग चीजें हैं। जरूरी नहीं कि हर परफेक्शनिस्ट व्यक्ति को डिसीजन पैरालिसिस हो। हालांकि, परफेक्ट फैसला लेने की कोशिश, बहुत सारे विकल्पों में से सबसे बेहतर विकल्प चुनने की चाह और Fear of Regret यानी बाद में पछताने का डर व्यक्ति को निर्णय लेने में उलझा सकता है।
कम आत्मविश्वास और Low Self-Esteem का संबंध
कम आत्मविश्वास या Low Self-Esteem भी व्यक्ति की निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। व्यक्ति को अपनी पसंद और फैसलों पर भरोसा कम होता है। उसे डर रहता है कि अगर उसने गलत निर्णय ले लिया तो उसकी छवि या आत्मसम्मान को नुकसान पहुंचेगा। इसी डर की वजह से वह जोखिम लेने और खुद फैसला करने से बच सकता है।
ज्यादा विकल्प भी बना सकते हैं फैसला मुश्किल
कई बार समस्या विकल्पों की कमी नहीं बल्कि बहुत ज्यादा विकल्प होने की होती है। मनोविज्ञान में इसे Paradox of Choice कहा जाता है। जब व्यक्ति के सामने बहुत सारे विकल्प होते हैं, तो वह हर विकल्प की तुलना करने लगता है और सबसे बेहतर विकल्प तलाशने में उलझ जाता है। इससे संतुष्टि कम हो सकती है और निर्णय लेने में ज्यादा समय लग सकता है।
कपड़े खरीदने से लेकर रिश्ते चुनने तक असर
डिसीजन पैरालिसिस रोजमर्रा के छोटे फैसलों से लेकर जिंदगी के बड़े फैसलों तक असर डाल सकता है। कुछ लोग दुकान पर जाकर कई आउटफिट पसंद करने के बावजूद एक कपड़ा तय नहीं कर पाते। इसी तरह करियर में कौन-सी नौकरी चुनें, बिजनेस करें या नौकरी, किस क्षेत्र में आगे बढ़ें जैसे फैसले टलते रह सकते हैं। रिश्तों में भी व्यक्ति लगातार बेहतर विकल्प की तलाश में कमिटमेंट से बच सकता है।
ओवरथिंकिंग और डिसीजन पैरालिसिस में अंतर
ओवरथिंकिंग और डिसीजन पैरालिसिस एक ही चीज नहीं हैं। ओवरथिंकिंग में व्यक्ति किसी विषय पर जरूरत से ज्यादा सोचता है, जबकि डिसीजन पैरालिसिस में बहुत सोचने के बावजूद वह किसी निर्णय तक नहीं पहुंच पाता। यानी डिसीजन पैरालिसिस में ओवरथिंकिंग एक हिस्सा हो सकती है, लेकिन दोनों को समान नहीं माना जा सकता।
डिसीजन पैरालिसिस में व्यक्ति अपने फैसले पर बार-बार शक क्यों करता हैं?
कुछ लोग फैसला लेने के बाद भी बार-बार सोचते हैं कि उनका निर्णय सही था या नहीं। इसके पीछे गलत फैसला लेने का डर, अपनी पसंद पर भरोसे की कमी, अपनी छवि खराब होने की चिंता या हर स्थिति में सबसे बेहतर विकल्प चुनने की इच्छा हो सकती है। इसी वजह से व्यक्ति बार-बार दूसरों से Reassurance यानी आश्वासन मांग सकता है।
करियर, रिलेशनशिप और पैसों पर भी पड़ सकता है असर
डिसीजन पैरालिसिस का असर सिर्फ छोटे फैसलों तक सीमित नहीं रहता। व्यक्ति करियर में नौकरी या बिजनेस चुनने, रिश्ते में कमिटमेंट करने और आर्थिक मामलों में निवेश या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से बच सकता है। ऐसा इंसान लगातार बेहतर विकल्प तलाशता रहता है और जरूरी फैसले टालता रहता है। इस सोच की वजह से इंसान जिंदगी में कई बार महत्वपूर्ण अवसर भी गंवा सकता है।
फैसले टालने से बढ़ सकता है तनाव और गिल्ट
जब व्यक्ति लंबे समय तक फैसला नहीं ले पाता, तो उसका तनाव और एंग्जायटी बढ़ सकती है। बाद में उसे इस बात का गिल्ट भी हो सकता है कि उसने समय पर निर्णय क्यों नहीं लिया। लगातार निर्णय न ले पाने की वजह से व्यक्ति को अपनी क्षमता पर भी संदेह होने लग सकता है और उसका आत्मविश्वास और कम हो सकता है।
कैसे पहचानें कि मदद लेने की जरूरत है?
डिसीजन पैरालिसिस को लेकर लोगों में जागरूकता कम हो सकती है। कई बार परिवार या दोस्त व्यक्ति को बताते हैं कि वह हर बात पर बहुत ज्यादा सोचता है। अगर फैसले लेने में लगातार बहुत ज्यादा समय लग रहा है, इसकी वजह से रोजमर्रा का काम, करियर, रिश्ते या दूसरी महत्वपूर्ण चीजें प्रभावित हो रही हैं और व्यक्ति खुद इससे परेशान है, तो उसे मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए। खासकर यह समझना जरूरी है कि कहीं इसके पीछे एंग्जायटी, डिप्रेशन या OCD जैसी कोई स्थिति तो नहीं है।
फैसले लेने की क्षमता बेहतर करने के तरीके
सबसे पहले अपने सामने मौजूद विकल्पों को सीमित करें और केवल कुछ जरूरी विकल्पों की Shortlist बनाएं। किसी फैसले के लिए खुद को एक निश्चित समय दें, ताकि लगातार सोचते रहने की आदत कम हो। सबसे परफेक्ट विकल्प तलाशने के बजाय “Good Enough” विकल्प चुनने की कोशिश करें। हर फैसले में परफेक्ट परिणाम की गारंटी नहीं होती, इसलिए फैसला लेने के बाद उसके परिणाम को स्वीकार करना भी सीखना जरूरी है।
पेन और पेपर की मदद से लें फैसला
अगर दिमाग में बहुत सारे विचार चल रहे हैं और निर्णय नहीं हो पा रहा है, तो विकल्पों को कागज पर लिखना मददगार हो सकता है। हर विकल्प के फायदे और नुकसान लिखने से विचारों का मानसिक बोझ कम हो सकता है और व्यक्ति स्थिति को ज्यादा स्पष्ट तरीके से देख पाता है। लिखकर अपनी प्राथमिकताओं को समझना और उनके आधार पर फैसला लेना निर्णय प्रक्रिया को आसान बना सकता है।
अपनी प्राथमिकताएं तय करना जरूरी
हर फैसले में यह देखना जरूरी है कि आपके लिए वास्तव में क्या ज्यादा महत्वपूर्ण है। समय, पैसा, मेहनत और सुविधा जैसी चीजों को प्राथमिकता के आधार पर देखें। उदाहरण के लिए, अगर किसी काम में खुद कई घंटे लगाने के बजाय विशेषज्ञ की मदद लेने से समय बच सकता है, तो अपनी प्राथमिकता के अनुसार फैसला लेना बेहतर हो सकता है।
कब साइकोलोजिस्ट से करें संपर्क?
अगर व्यक्ति खुद कोशिश करने के बावजूद लगातार निर्णय नहीं ले पा रहा है और इसका असर उसकी पढ़ाई, नौकरी, करियर, रिश्तों या रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ रहा है, तो उसे साइकोलोजिस्ट से सलाह लेना उचित है। विशेषज्ञ यह पता लगाने में मदद कर सकते हैं कि इसके पीछे सामान्य निर्णय संबंधी कठिनाई है या एंग्जायटी, डिप्रेशन, OCD अथवा कोई अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्या।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी सामान्य जागरूकता के लिए है। फैसला लेने में परेशानी होना हमेशा किसी मानसिक बीमारी का संकेत नहीं होता। यदि यह समस्या लगातार बनी रहे और पढ़ाई, नौकरी, रिश्तों या रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रही हो, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लें।
