अनामिका के भाई को 10 साल पहले ब्रेन हेमरेज हुआ था, लेकिन आज तक वह पूरी तरह ठीक नहीं हो पाए हैं। पिछले एक दशक से वह बिस्तर पर हैं। अनामिका ने उनके इलाज और देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ी। आधुनिक चिकित्सा से लेकर पारंपरिक घरेलू उपायों तक, उन्होंने हर संभव कोशिश की, लेकिन भाई की हालत में इतना सुधार नहीं हो सका कि वह दोबारा अपने पैरों पर खड़े हो सकें।
अनामिका इरादों से बेहद मजबूत हैं। भाई की देखभाल के साथ-साथ पूरे परिवार की जिम्मेदारियां भी वो बखूबी निभा रही हैं। उन्हें देखकर शायद ही कोई अंदाजा लगा सके कि वह कभी शारीरिक या मानसिक रूप से थकती होंगी। लेकिन सच्चाई यह है कि हर मजबूत दिखने वाला इंसान हर समय मजबूत नहीं होता। कई बार जो व्यक्ति सबसे ज्यादा लोगों का सहारा बनता है, वही भीतर से सबसे ज्यादा थका हुआ और भावनात्मक रूप से बोझिल होता है।
मेडिकल साइंस में ऐसी स्थिति, जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक दूसरों की देखभाल करते-करते, उनकी भावनात्मक परेशानियां सुनते-सुनते और लगातार उनका सहारा बनते-बनते खुद मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक रूप से थकने लगे तो ये Compassion Fatigue (कम्पैशन फटीग) कहलाता है। यह कोई आधिकारिक मानसिक बीमारी (डायग्नोसिस) नहीं है, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे एक गंभीर मनोवैज्ञानिक स्थिति मानते हैं, जिसे समय रहते पहचानना और संभालना बेहद जरूरी है।
Compassion Fatigue क्या है? मनोवैज्ञानिक भाषा में इसे कैसे परिभाषित किया जाता है?
फोर्टिस हेल्थकेयर में अदायु माइंडफुलनेस हॉस्पिटल में सलाहकार मनोचिकित्सक डॉ. नेहा अग्रवाल ने बताया Compassion Fatigue ऐसी स्थिति है जिसमें किसी व्यक्ति को लंबे समय तक दूसरों की देखभाल (Caregiving) या उनके दर्द और ट्रॉमा से जुड़े रहने के कारण भावनात्मक , मानसिक और शारीरिक थकान महसूस होने लगती है। यह मानसिक स्थिति उन लोगों में अधिक देखी जाती है जो लगातार दूसरों की मदद करते हैं। डॉक्टर नेहा ने बताया Compassion Fatigue कोई ICD (International Classification of Diseases) में दर्ज मेडिकल डायग्नोसिस नहीं है, बल्कि यह ऐसी स्थिति को समझाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला मनोवैज्ञानिक शब्द है।
Compassion Fatigue और Burnout में क्या अंतर है? क्या दोनों के लक्षण एक जैसे हो सकते हैं?
डॉक्टर नेहा ने बताया कंपेशन फटिग और बर्न आउट दोनों के लक्षण काफी हद तक एक जैसे हो सकते हैं, लेकिन इनके कारण अलग-अलग होते हैं। Burnout मुख्य रूप से लगातार काम के दबाव (Workload) और लंबे समय तक बिना आराम के काम करने से होता है। वहीं Compassion Fatigue लगातार दूसरों के दर्द, दुख और भावनात्मक बोझ को अपने ऊपर लेने की वजह से होता है। दोनों स्थितियों में बॉडी में जो लक्षण दिखते हैं उसमें थकान, नींद खराब होना, चिड़चिड़ापन, ध्यान और याददाश्त में कमी,भूख में बदलाव, मूड स्विंग जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। लेकिन Compassion Fatigue में व्यक्ति धीरे-धीरे दूसरों के प्रति सहानुभूति भी खोने लगता है क्योंकि वो लगातार भावनात्मक रूप से खुद को खर्च कर चुका होता है। Burnout कई बार छुट्टी या आराम लेने से ठीक हो सकता है, जबकि Compassion Fatigue में भावनात्मक प्रोसेसिंग और कई बार काउंसलिंग की भी जरूरत पड़ती है।
किन लोगों में Compassion Fatigue होने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है?
इस मानसिक स्थिति का सबसे अधिक जोखिम उन लोगों में होता है जो लगातार दूसरों की देखभाल या ट्रॉमा से जुड़े रहते हैं। इनमें डॉक्टर, नर्स,ICU और इमरजेंसी स्टाफ, कैंसर एवं पैलिएटिव केयर से जुड़े लोग, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, सोशल वर्कर, पुलिसकर्मी, ट्रामा या War कवर करने वाले पत्रकार, लंबे समय से बीमार मरीजों की देखभाल करने वाले परिवार के सदस्यों में Compassion Fatigue का खतरा बढ़ जाता है। जहां भी लगातार भावनात्मक जुड़ाव और केयरगिविंग होती है, वहां Compassion Fatigue का खतरा बढ़ जाता है।
क्या परिवार और दोस्तों की परेशानियां सुनने वाला व्यक्ति भी इसका शिकार हो सकता है?
डॉक्टर नेहा ने बताया अगर कोई व्यक्ति कभी-कभार किसी की समस्या सुनता है तो इससे Compassion Fatigue नहीं होता। लेकिन यदि लंबे समय तक लगातार किसी की देखभाल करनी पड़े या रोजाना दूसरों के दुख और भावनात्मक बोझ को संभालना पड़े, तो परिवार का सदस्य भी इसका शिकार हो सकता है। जो लोग अपने किसी गंभीर रूप से बीमार परिजन की वर्षों तक देखभाल करते हैं, उनमें इसका खतरा बढ़ जाता है।
क्या माता-पिता भी Compassion Fatigue का शिकार हो सकते हैं?
डॉक्टर नेहा ने बताया अगर माता-पिता या कोई भी व्यक्ति अपने परिवार, बच्चों या किसी प्रियजन की देखभाल में इतना अधिक भावनात्मक रूप से शामिल हो जाए कि अपनी शारीरिक और मानसिक जरूरतों को नजरअंदाज करने लगे, तो वह भी Compassion Fatigue का शिकार हो सकता है।
Compassion Fatigue के शुरुआती संकेत और गंभीर लक्षण क्या हैं?
डॉक्टर नेहा ने बताया इस मानसिक स्थिति से ग्रस्त इंसान में मानसिक और शारीरिक दोनों तरह के लक्षण मौजूद होते हैं। बात करें मानसिक लक्षणों की तो मूड स्विंग होना, उदासी, बेचैनी, एंग्जायटी, चिड़चिड़ापन, दूसरों के प्रति सहानुभूति कम होना, ध्यान लगाने में कठिनाई होना, याददाश्त कमजोर होना,लोगों से दूरी बनाना,सामाजिक अलगाव, काम पर जाने का मन न करना,निर्णय लेने में परेशानी होना, काम से बार-बार छुट्टी लेना शामिल है। इस मानसिक स्थिति के शारीरिक भी कुछ लक्षण दिखते हैं जैसे लगातार थकान, नींद की समस्या, भूख में बदलाव जैसे लक्षण भी दिखाई देते हैं।
क्या Compassion Fatigue की वजह से व्यक्ति भावनात्मक रूप से सुन्न हो सकता है?
डॉक्टर ने बताया लगातार भावनात्मक दबाव के कारण व्यक्ति का मिजाज़ चिड़चिड़ा हो सकता है। दूसरों के प्रति संवेदनशीलता कम हो सकती है। ऐसा इंसान लोगों से दूरी बनाने लगता है और सामाजिक रूप से अलग-थलग पड़ सकता है। ऐसे लोगों की अपने काम में रुचि भी कम होने लगती है।
क्या Compassion Fatigue में डिप्रेशन या एंग्जायटी का खतरा बढ़ सकता है?
डॉक्टर नेहा ने बताया अगर समय रहते इस स्थिति को पहचाना और संभाला न जाए तो इस मानसिक स्थिति से पीड़ित इंसान में एंग्जायटी,डिप्रेशन,लगातार निराशा, गंभीर मानसिक तनाव जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। ऐसी स्थिति में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर दवाओं का भी सहारा लिया जा सकता है।
Compassion Fatigue का इलाज कैसे करें?
मनोचिकित्सक नेहा ने बताया सबसे पहले गिल्ट या अपराध बोध से बाहर निकलना जरूरी है। बहुत से लोग यह सोचकर खुद को आराम नहीं देते कि उनका अपना कोई तकलीफ में है तो वो खुद कैसे खुश रह सकते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि आप एक सीमा तक ही किसी की मदद कर सकते हैं। अपनी शारीरिक और मानसिक सेहत का भी ध्यान रखना जरूरी है। ऐसी स्थिति में Compassion Fatigue से जूझ रहे व्यक्ति को नियमित व्यायाम करना चाहिए।
पर्याप्त नींद लें। अपने लिए टाइम निकालें। जरूरत पड़ने पर छोटे-छोटे ब्रेक लें। डॉक्टर ने बताया अगर आप खुद भावनात्मक रूप से खाली हो चुके हैं तो आप दूसरों की प्रभावी मदद भी नहीं कर पाएंगे इसलिए आपको अपनी सेहत का ध्यान रखना जरूरी है।
Compassion Fatigue से जूझ रहा व्यक्ति कब जाए डॉक्टर के पास
सबसे पहले व्यक्ति अपने लिए वक्त निकालें। अगर पर्याप्त नींद, घूम फिर कर,मेडिटेशन के बाद भी आपको खुद में कुछ फर्क नहीं नजर आ रहा तो मरीज को मनोवैज्ञानिक (Psychologist) या मनोचिकित्सक (Psychiatrist) से मिलना चाहिए। गंभीर मामलों में दवाओं की भी आवश्यकता पड़ सकती है।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता और जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें दी गई जानकारी किसी चिकित्सीय सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है। यदि आप लंबे समय से मानसिक थकान, तनाव, अवसाद, चिंता या भावनात्मक समस्याओं का अनुभव कर रहे हैं, तो किसी योग्य मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से सलाह अवश्य लें।
