पिछले कुछ वर्षों में मोटापे के इलाज में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। आज सेमाग्लूटाइड (Semaglutide) और टिरजेपेटाइड (Tirzepatide) जैसी नई एंटी-ओबेसिटी दवाएं कई मरीजों में 15 से 20 प्रतिशत तक वजन कम करने में मदद कर रही हैं। पहले इस स्तर का वजन कम करना बैरिएट्रिक सर्जरी के जरिए ही संभव माना जाता था। इन दवाओं ने मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज और इससे जुड़ी मेटाबॉलिक बीमारियों से जूझ रहे लाखों लोगों के लिए उम्मीद की नई किरण जगाई है। भारत में भी हम डॉक्टर पिछले कुछ वर्षों से इन दवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं और पिछले एक साल में टिरजेपेटाइड उपलब्ध होने के बाद इनका उपयोग तेजी से बढ़ा है।

हाल ही में द बीएमजे (The BMJ) में प्रकाशित दो बड़े वैज्ञानिक विश्लेषणों ने इन दवाओं की प्रभावशीलता और सीमाओं दोनों पर महत्वपूर्ण जानकारी दी है। एक अध्ययन में लगभग एक लाख लोगों के 262 क्लीनिकल ट्रायल का विश्लेषण किया गया, जबकि दूसरे अध्ययन में यह देखा गया कि दवा बंद करने के बाद मरीजों के शरीर में क्या बदलाव आते हैं। इन अध्ययनों से यह स्पष्ट होता है कि ये दवाएं मोटापे के इलाज में महत्वपूर्ण उपलब्धि जरूर हैं, लेकिन केवल वजन कम होना ही इलाज की सफलता का पैमाना नहीं हो सकता। भारत जैसे देश में, जहां लोगों में शरीर में चर्बी अधिक और मांसपेशियां अपेक्षाकृत कम होती हैं, यह बात और भी ज्यादा जरूरी हो जाती है।

वजन कम होने से जीवन की गुणवत्ता कितनी बदलती है?

कई लोगों को लगता है कि वजन कम होते ही जीवन पूरी तरह बदल जाएगा, लेकिन हालिया शोध कुछ अलग तस्वीर दिखाता है। 45 हजार से अधिक प्रतिभागियों पर किए गए विश्लेषण में पाया गया कि वजन कम होने के बावजूद जीवन की गुणवत्ता (Quality of Life) में सुधार अपेक्षा के अनुसार बहुत बड़ा नहीं था। हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि मरीजों को फायदा नहीं होता। अपने क्लीनिकल अनुभव में मैंने देखा है कि जो मरीज पहले कुछ कदम चलने में भी थक जाते थे, वे दोबारा सामान्य रूप से चलने लगते हैं। जिन लोगों को ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया था, उन्हें वर्षों बाद अच्छी नींद आने लगती है। कई मरीजों का आत्मविश्वास बढ़ता है और उनकी रोजमर्रा की गतिविधियां आसान हो जाती हैं। लेकिन यह भी सच है कि केवल वजन कम हो जाना हर व्यक्ति के जीवन में समान स्तर का बदलाव नहीं लाता।

भारतीयों के लिए सबसे बड़ी चिंता मसल लॉस

इन दवाओं से जुड़ी सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है मांसपेशियों (Muscle Mass) का कम होना। जो दवाएं सबसे अधिक फैट कम करती हैं, वे कुछ मात्रा में लीन बॉडी मास यानी मांसपेशियों को भी कम करती हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार टिरजेपेटाइड से मसल लॉस अपेक्षाकृत अधिक देखा गया है, जबकि सेमाग्लूटाइड में भी यह प्रभाव मौजूद है। ध्यान देने वाली बात यह है कि चाहे डाइट हो, सर्जरी हो या दवा हो वजन कम करने के लगभग हर तरीके में कुछ न कुछ मांसपेशियां कम होती हैं।

लेकिन मांसपेशियां हमारे शरीर की ताकत, चलने-फिरने की क्षमता, ब्लड शुगर कंट्रोल और हेल्दी तरीके से उम्र बढ़ने के लिए बेहद जरूरी हैं। भारत में यह चिंता और भी बड़ी है क्योंकि भारतीयों में पश्चिमी देशों की तुलना में पहले से ही मांसपेशियां कम होती हैं। उम्र बढ़ने और डायबिटीज के साथ सार्कोपेनिया (Sarcopenia) यानी मांसपेशियों की कमजोरी तेजी से बढ़ रही है। अगर वजन कम हो जाए लेकिन मांसपेशियां तेजी से घट जाएं, तो गिरने, कमजोरी, विकलांगता और अस्पताल में भर्ती होने का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए मेरा मानना है कि इन दवाओं के साथ हर मरीज को पर्याप्त प्रोटीन, नियमित रेजिस्टेंस एक्सरसाइज और समय-समय पर मसल स्ट्रेंथ की जांच की सलाह भी दी जानी चाहिए।

दवा बंद करने के बाद वजन फिर क्यों बढ़ जाता है?

वास्तविक चुनौती तब शुरू होती है जब मरीज दवा लेना बंद कर देता है। दूसरे बीएमजे अध्ययन में पाया गया कि दवा बंद करने के बाद मरीजों का वजन औसतन हर महीने लगभग 400 ग्राम बढ़ने लगता है। सेमाग्लूटाइड और टिरजेपेटाइड जैसी नई दवाओं का इस्तेमाल करने वाले अधिकांश मरीज लगभग डेढ़ से दो साल के अंदर फिर से अपने पुराने वजन के करीब पहुंच जाते हैं। सिर्फ वजन ही नहीं, बल्कि ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल में जो सुधार आया था, वह भी धीरे-धीरे खत्म होने लगता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मोटापा भी हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज की तरह एक क्रॉनिक बीमारी है, जिसे लंबे समय तक कंट्रोल करना जरूरी है।

अक्सर लोगों के मन में ये सवाल रहता है कि जो लोग वजन कम करने की दवाओं का सेवन करते हैं उन्हें ये दवा जिंदगी भर लेना होती है क्या? क्या मरीज कई वर्षों तक इंजेक्शन लेते रहेंगे? क्या हर व्यक्ति इतना खर्च उठा पाएगा?

भारत में जल्द ही जेनेरिक सेमाग्लूटाइड आने की उम्मीद है, जिससे इलाज का खर्च कुछ कम हो सकता है। लेकिन इसके बावजूद लंबे समय तक इलाज करवाना देश के बड़े हिस्से के लिए महंगा साबित हो सकता है। मेरी राय में इन दवाओं का उपयोग उन मरीजों को प्राथमिकता देकर किया जाना चाहिए जिन्हें मोटापे के साथ डायबिटीज, फैटी लिवर (MASLD), स्लीप एपनिया या हृदय रोग जैसी गंभीर समस्याएं भी हैं। केवल कॉस्मेटिक वजन घटाने के लिए इनका अंधाधुंध इस्तेमाल उचित नहीं होगा।

क्या केवल इंजेक्शन से भारत में मोटापा खत्म हो जाएगा?

मेरा जवाब है नहीं। ये दवाएं मोटापे के इलाज में एक बड़ी उपलब्धि जरूर हैं, लेकिन इन्हें चमत्कारी इलाज नहीं माना जाना चाहिए। भारत में मोटापे की महामारी से निपटने के लिए हेल्दी डाइट, नियमित शारीरिक गतिविधि, बचपन से मोटापे की रोकथाम और लोगों में जागरूकता बढ़ाना उतना ही जरूरी है। वेट लॉस की दवाएं इन प्रयासों का विकल्प नहीं, बल्कि उनका पूरक हो सकती हैं। मोटापे के इलाज का असली उद्देश्य केवल वजन कम करना नहीं है। हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि मरीज की मांसपेशियां सुरक्षित रहें, उसकी शारीरिक क्षमता बेहतर हो, मेटाबॉलिक स्वास्थ्य सुधरे और वह लंबे समय तक हेल्दी लाइफ जिएं।  इलाज की सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि इलाज के दौरान अधिकतम कितना वजन कम हुआ, बल्कि इस बात से कि वर्षों बाद भी मरीज हेल्दी वेट, मजबूत मांसपेशियां और अच्छा मेटाबॉलिक स्वास्थ्य बनाए रख पाया या नहीं।

(डॉ. अनूप मिश्रा, चेयरमैन, फोर्टिस सी-डॉक, डायबिटीज एंड एलाइड साइंसेज)