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पहले मजाक फिर नजीर

चीन के साथ भारत का संबंध इन दिनों कई वजहों से विवादित है। इस कारण अपने इस पड़ोसी मुल्क को देखने का हमारा नजरिया भी तेजी से बदला है।

airसांकेतिक फोटो।

चीन के साथ भारत का संबंध इन दिनों कई वजहों से विवादित है। इस कारण अपने इस पड़ोसी मुल्क को देखने का हमारा नजरिया भी तेजी से बदला है। कोविड-19 के कारण तो खासतौर पर चीन के प्रति दृष्टिकोण में बड़ा फर्क आया है। दिलचस्प है कि इस देश के प्रति अपनी राय तब्दील करने में भारत अकेला देश नहीं है।

खैर, यह तो रही व्यापारिक, राजनीतिक या महामारी की समस्या से जुड़ी बात। इन सबसे अलग होकर बात करें तो चीन कई मामलों में ऐसा देश भी है, जिससे दुनिया काफी कुछ सीख सकती है। इस सीख से जुड़ा एक बड़ा पहलू यह है कि हाल के दशकों में चीन ने अपने शहरों को खासतौर से वायु प्रदूषण के खतरे से जिस तरह बाहर निकाला है, वह एक मिसाल है।

एक वक्त था जब दिल्ली-एनसीआर की तरह ही चीन के कई बड़े शहर धुंध (स्मॉग) की चादर में लिपटे रहते थे। बेजिंग में तो हर व्यक्ति के लिए मास्क पहनकर बाहर निकलना एक आम बात थी। कई दिनों तक स्कूल-कॉलेजों और सरकारी संस्थानों को बंद करने के आदेश दिए जाते थे। इन सबके पीछे कारण था वायु प्रदूषण का खतरनाक स्तर पर पहुंच जाना। पर चीन ने वायु प्रदूषण के खिलाफ 2013 में जंग छेड़ी और आज हालात ये हैं कि वहां के शहरों में धुंध और वायु प्रदूषण की समस्या काफी हद तक नियंत्रित हो चुकी है। अब वहां लोगों को पहले की तरह परेशान नहीं होना पड़ता है। जाहिर है कि इस दौरान चीन ने इसके लिए कई बड़े कदम उठाए हैं।

दिलचस्प है कि 2012 तक चीन के 90 फीसद शहरों की हवा का स्तर वहां के तय मानकों से कई गुना अधिक था। आलम यह था कि चीन के 74 बड़े शहरों में से महज आठ शहरों में वायु प्रदूषण निर्धारित स्तर से कम था। ऐसी भी रिपोर्ट आई कि चीन में वायु प्रदूषण से हर साल पांच लाख लोगों की मौत समय से पहले हो रही है।

यह वह दौर था जब बेजिंग के लोगों की मास्क लगाई हुई तस्वीरें विश्व मीडिया में प्रकाशित हो रही थीं और हर तरफ चीन का मजाक उड़ाया जा रहा था। स्थिति की भयावहता को देखते हुए चीन ने 2013 में वायु प्रदूषण दूर करने के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना तैयार की। सरकार ने इस पर 277 अरब डॉलर खर्च करने का फैसला किया। इसके साथ ही योजनाओं पर तेजी से अमल शुरू कर दिया गया।

इसके तहत कारखानों को उत्तर चीन और पूर्वी चीन से दूसरे स्थानों पर ले जाया गया या बंद कर दिया गया। कई कारखानों में उत्पादन कम करने और कोयले का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर घटाने जैसे बड़े फैसले किए गए। इसके अलावा जर्जर वाहनों को सड़कों से हटाने का निर्णय लिया गया। खासतौर पर बेजिंग, शंघाई और ग्वांगझू की सड़कों पर कारों की संख्या कम करने पर जोर दिया गया।

चीन की सरकार ने 74 शहरों को वायु प्रदूषण घटाने के लिए सबसे पहले चुना। इनमें मानकों के अनुसार योजनाएं लागू की गईं। इसका असर यह हुआ कि पीएम 2.5 प्रदूषक तत्व का स्तर वातावरण में 2013 से 2018 के बीच 42 फीसदी घट गया। वहीं सल्फर डाईआॅक्साइड के स्तर में इस दौरान 68 फीसद की कमी आई।

चीन ने ये सारे कदम देश के प्रमुख शहरों में 2020 तक वायु प्रदूषण 60 फीसद तक कम करने का लक्ष्य तय करते हुए उठाया। नीतिगत सख्ती और प्रतिबद्धता के कारण चीन अपने लक्ष्य को पाने में काफी हद तक सफल भी रहा। पर्यावरण और प्रदूषण के अध्ययन से जुड़ी कई बड़ी एजंसियों के मुताबिक चीन के बेजिंग और अन्य शहरों में प्रदूषण में करीब 50 फीसदी तक की कमी आई है। अब इन शहरों में नीला आसमान दिखने लगा है।

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