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बच्चे के दांत देखकर भी जान सकते हैं उनकी सेहत का हाल, रिसर्च ने किया दावा

एक रिसर्च से पता चला है कि बच्चों के दांतों से भविष्य में, उन्हें डायबिटीज और दिल संबंधी समस्या के होने या न होने का पता किया जा सकता है।

प्रतिकात्मक तस्वीर।

आमतौर पर छठे महीने में बच्चे को दांत निकलना शुरू हो जाते हैं। दांत निकलने की प्रक्रिया पर अगर गौर करें तो सबसे पहले बच्चों को पहले नीचे के दो दांत फिर ऊपर ऐसे ही धीरे-धीरे सारे दांत आ जाते हैं। जब दांत निकलना शुरू होते हैं तो बच्चे को बहुत तकलीफ होती है। वह चिड़चिड़े हो जाते हैं और जिद्द करने लगते हैं। इसके अलावा कमजोर, उलटी-दस्त, पेट दर्द, कब्ज, मसूढ़ों में खुजली, सूजन और दर्द जैसी परेशानियां हो सकती हैं। लेकिन क्या दांत निकलने से बच्चों में डायबिटीज और हार्ट प्रॉब्लम जैसी खतरनाक बीमारियों के बारे में भी पता किया जा सकता है, आइए जानते हैं।

दरअसल, एक रिसर्च से पता चला है कि बच्चों के दांतों से भविष्य में, उन्हें डायबिटीज और दिल संबंधी समस्या के होने या न होने का पता किया जा सकता है। इंग्लैंड के ब्रैडफोर्ड स्कूल ऑफ आर्कियोलॉजिकल और फोरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी के डॉ जूलिया बीमोंट और उनकी टीम की रिसर्च में 10वीं और 19वीं शताब्दी में पैदा हुए एंग्लो सैक्सन बच्चों के कंकाल का टेस्ट किया गया था जिसमें दांतों की हड्डियों में कार्बन और नाइट्रोजन आइसोटोप की मात्रा काफी अधिक पाई गई। कार्बन और नाइट्रोजन आइसोटोप के जरिए भविष्य में होने वाली बीमारियों के बारे में पता किया जा सकता है। इसके जरिए पता किया जा सकता है कि बच्चों को भविष्य में किस तरह की बीमारियां घेर सकती हैं, जिनमें डायबिटीज और दिल से संबंधित बीमारियां भी शामिल हैं। लेकिन धीरे-धीरे हड्डियों में कार्बन और नाइट्रोजन आइसोटोप मात्रा बेहद कम हुई है।

बता दें कि शरीर में कार्बन और नाइट्रोजन आइसोटोप की मात्रा डाइट पर निर्भर है। भूखा रहने की वजह से शरीर में कार्बन और नाइट्रोजन आइसोटोप हो सकती है। जिससे बच्चों में आगे चलकर डायबिटीज और हार्ट प्रॉब्लम के लक्षण के बारे में बता पाना मुश्किल होता है। डॉ जूलिया बीमोंट के मुताबिक, हम सभी जानते हैं कि प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं की डाइट का खास ख्याल रखना जरूरी होता है। ताकि जन्म देते समय में मां और शिशु को किसी परेशानी का सामना न करने पड़े। लेकिन 19वी शताब्दी में भूखमरी की वजह से मां और काफी बच्चों की मौतें हुई थीं जिनकी में हड्डियों में कार्बन और नाइट्रोजन आइसोटोप की मात्रा काफी कम थी।

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