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वन-उपवन की शहर वापसी

जंगल को निर्ममता के साथ उजाड़ कर शहर बसाने की होड़ दुनिया में खत्म नहीं हुई है। पर इस होड़ के बीच एक हरित पहल यह भी शुरू हुई है कि वन और भवन का विरोधाभासी रिश्ता एक ऐसे साझे के रूप में विकसित हो जिसमें शहरों की ऊंची इमारतों से दूरबीन लगाकर बची-खुची हरित पट्टी न देखनी पड़े बल्कि शहरी अट्टालिकाएं खुद वन के वैकल्पिक स्वरूप के रूप में विकसित हों।

Environmentसांकेतिक फोटो।

प्रेम प्रकाश

विकास की समझ और दरकार हर दौर में रही है। वैसे सही यह भी है कि समय के साथ विकास के मानक बदलते भी रहे हैं। बीते तीन दशकों में समाज और विकास की दिशा वैसे तो एक सीध में रही है, पर इस दौरान दोनों के बीच भिड़ंत की भी स्थितियां आती रही हैं। आज तो हालत यह है कि विकास को सीधे-सीधे मनुष्य विरोधी न करार दे दिया जाए, इसके लिए विकास के साथ समावेशी जैसे आशय जोड़ने जरूरी हो गए हैं।

बावजूद इसके स्थिति संभल नहीं रही है। नतीजतन, शहरीकरण की होड़ और हरियाली के घटते रकबे के बीच नए सिरे से संतुलन बैठाने की कोशिश हो रही है। इसी कोशिश का नतीजा है कि जंगल की कीमत पर शहर के बजाय जंगल और शहरी निर्माण या बसावट के बीच नया और खूबसूरत रिश्ता विकसित करने की पहल शुरू हुई है। यह पहल दुनिया के कई बड़े शहरों को कंक्रीट के जंगल से निकालकर हरित मानचित्र का हिस्सा बना रही है। अच्छी बात यह कि इस पहल में अब भारत भी शरीक है।

चेतावनी और समाधान

महानगरों के ऊंचे भवनों को ऊंचे वन-उपवन की शक्ल देने की इस पहल को ‘वर्टिकल फॉरेस्ट’ के रूप में लुभावनी शिनाख्त मिली है। दुनिया के कई हिस्सों में तेजी से लोकप्रिय हो रही यह पहल एक ऐसा सामयिक कदम है, जिसे अपनाने में ज्यादा परेशानी नहीं है। खासतौर पर तब जब हमारे सामने यह स्थिति लगातार साफ होती जा रही है कि अगर हम समय रहते नहीं चेते तो हमारे पास न तो सांस लेने के लिए साफ हवा होगी और न पीने के लिए शुद्ध पानी। इस बारे में स्थिति की गंभीरता का अहसास कराते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) पहले ही अवगत करा चुका है कि दुनिया के हर दस में से नौ लोग निहायत जहरीली हवा में सांस ले रहे हैं।

इस आकलनके मुताबिक, ‘हर साल घर के बाहर और घरेलू वायु प्रदूषण के कारण दुनिया भर में 70 लाख लोगों की मौत होती है। अकेले बाहरी प्रदूषण से 2016 में मरने वाले लोगों की संख्या 42 लाख के करीब थी, जबकि घरेलू वायु प्रदूषणों से होने वाली मौतों की संख्या 38 लाख है।’ इस बात को अलग से कहने-समझने की जरूरत नहीं कि ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले शहरों में यह स्थिति ज्यादा भयावह है। लिहाजा, दबाव उन शहरों पर ज्यादा है जिन्होंने वन क्षेत्रों में पहले तो तेजी से घुसपैठ की और अब आलम यह है कि उन्हें सांस लेने के लिए इनकी शरण में जाना पड़ रहा है।

बंगलुरु बना मिसाल

कुछ महीने पहले इस खबर के साथ मीडिया में कई लेख आए कि बंगलुरु में भारत का पहला ‘वर्टिकल फॉरेस्ट अपार्टमेंट’ बन चुका है। इसके साथ ही जो बहस चली उसने अपने देश में अत्याधुनिक स्थापत्य की सोच के आगे बदलाव का तकाजा खड़ा कर दिया। अलबत्ता, भवन निर्माण की जो शैली दशकों से प्रचलित है और इसके बारे में जो समझ भवन निर्माताओं, अभियंताओं और आम लोगों में दृढ़ता के साथ बनी हुई है, उसमें रातोंरात किसी बड़े फर्क की उम्मीद रखना सही नहीं होगा। हां, यह जरूर है कि यह हरे-भरे शहर की तरफ एक कदम जरूर है। संतोष की बात यह भी है कि यह मिसाल अब तेजी से इकहरी से दोहरी-तिहरी होने की राह पर भी है।

ऊंटी अट्टालिकाओं का जंगल तैयार करने की विकसित प्रणाली को आगे बढ़ाने में जिन महानगरों के नाम काफी ऊपर हैं, उनमें इटली का विख्यात महानगर मिलान शामिल है। मिलान में शहरी पुनर्विकास परियोजना के हिस्से के तौर हरित पहल शुरू हुई है। ‘वर्टिकल फॉरेस्ट’ को इतालवी भाषा में ‘बॉस्को वर्टिकाले’ कहा जाता है। इसके तहत वहां सबसे पहले एक रिहायशी टावर का जोड़ा तैयार किया गया, जिसमें 900 पेड़ और दस हजार से ऊपर पौधे या झाड़ियां हैं। आप गूगल पर जाएंगे तो ‘वर्टिकल फॉरेस्ट’ के नाम पर सबसे ज्यादा तस्वीरें आपको मिलान की ही मिलेंगी।

शहरी वनीकरण की राह

कह सकते हैं कि सूझबूझ से भरी यह पहल शहरी वनीकरण का एक ऐसा तरीका है, जिसके पीछे की समझ और चिंता यह है कि हरियाली और मनुष्य का रिश्ता न तो आकस्मिक होना चाहिए और न ही आपवादिक। आप इस जीवनशैली के साथ लंबे समय तक काम नहीं चला सकते कि दिन के ज्यादातर घंटे कंक्रीट के जंगल में रहें और कुछ घंटे के लिए शहर के एक कोने में बनी हरित पट्टी की सैर के लिए निकल जाएं। शहरी जीवन के आजकल और जंगली जीवन के हरित मंगल को साथ जोड़ने की दरकार सामयिक तो है ही वैज्ञानिक भी है।

यही वजह है कि मिलान से शुरू हुआ प्रयोग दुनिया के कई हिस्सों में तेजी से पहुंच रहा है। आज नानजिंग, सिंगापुर और सिडनी जैसे शहरों में हरियाली को ऊंची इमारतों के साथ झूलते, विकसित होेते देखना एक ऐसा अनुभव है, जिसमें हमारे भविष्य की कई चिंताओं का उत्तर छिपा है। खासतौर पर प्रदूषण में कमी और जैव-विविधता में विस्तार के रुझान को आगे बढ़ाने में इससे बड़ी मदद मिलने की उम्मीद है।

उधर मिलान, इधर मुंबई

मिलान में भवन निर्माण की हरित शैली के प्रचलन में आने के बाद से शहर की वायु गुणवत्ता में सुधार, जैव विविधता में बढ़ोतरी और बढ़ते तापमान के असर में अहम कमी के कई प्रमाण मिले हैं। इसी तरह चीन के नानजिंग में हर साल 25 टन कार्बन डाइआॅक्साइड को सोखने और हर दिन 60 किलोग्राम आॅक्सीजन के उत्पादन के मकसद से नानजिंग ग्रीन टावर का निर्माण किया जा रहा है। यही नहीं, आगे भी वहां इस तरह की कई परियोजनाएं शुरू होने वाली हैं।

महानगरों में भवनों के निर्माण के साथ हरित दरकार को जोड़ना जरूरी तो है पर यह इतना आसान भी नहीं है।
मसलन, भारत में मुंबई का उदाहरण लें। यहां भवन निर्माण के मामले में 1972 से 2011 के बीच व्यापक बदलाव हुए हैं। बढ़ती आबादी के साथ रिहायशी, संस्थागत, शैक्षणिक और औद्योगिक इमारतों के खड़े-फैले विस्तार की वजह से मुंबई 234 वर्ग किलोमीटर से 1,056 वर्ग किलोमीटर में फैल गई। इस कारण मुंबई के उपनगरीय इलाके भी विकसित होने लगे लेकिन कुल मिलाकर पर्यावरण दूषित होने लगी।

देखते-देखते बेहद हरियाली वाले इलाके ऊंची इमारतों में तब्दील हो गए। मुंबई में जमीन के इस्तेमाल को लेकर हुए कई अध्ययन इस बारे में आगाह कर रहे हैं कि शहर के हरियाली वाले इलाके खतरनाक स्तर तक कम हो चुके हैं। मुंबई के कुल के क्षेत्रफल में हरियाली वाले इलाके का अनुपात 1988 के 46.7 फीसद से घटकर 2018 में 26.67 फीसद हो गया है।

साफ है कि अगर नीतिगत स्तर पर इस बारे में जल्द नहीं सोचा गया तो हम एक ऐसे खतरे की जद में होंगे जिसमें शहर की पूरी आबादी एक निहायत ही दमघोंटू हालात में जीने रहने को मजबूर होगी। फिर स्वास्थ्य की कितनी तरह की परेशानी हमारी जिंदगी का हिस्सा होगी, इसका अंदाजा भी लगाना मुश्किल है। यह भी कि मुंबई की स्थिति आपवादिक नहीं है। देश की राजधानी से लेकर दर्जनो ऐेसे छोटे-बड़े शहर हैं, जहां खासतौर पर वायु गुणवत्ता साल के ज्यादातर दिनों में चेतावनी के स्तर से काफी ऊपर रहती है।

समय की दरकार

जाहिर है कि यह एक निर्णायक समय है जब भारत सहित दुनियाभर की सरकारों को शहरीकरण के बढ़े जोर के बीच शहरी बसावट और भवन निर्माण शैली को नियामकीय तरीके से नियंत्रित करना चाहिए। इस बारे में लोगों को भी यह समझना होगा कि हाल के कुछ दशकों में ऊंची और ढेरों इमारतों के बनने से प्राकृतिक क्षेत्र में कमी का नतीजा शहरों में सतह के तापमान में बढ़ोतरी के रूप में सामने आया है।

‘ग्लोबल वार्मिंग’ के तौर पर चिह्नित इस समस्या पर समय रहते काबू नहीं पाया गया तो बढ़ते तापमान का असर जैव विविधता पर खतरनाक तरीके से पड़ेगा और इस खतरनाक असर से हम भी बाहर नहीं होंगे। ‘वर्टिकल फारेस्ट’ इस लिहाज से एक अच्छा और समाधानकारी विकल्प है। इससे शहरों में बेतहाशा कार्बन डाइआॅक्साइड के उत्सर्जन को सोखने में मदद मिलेगी।

यही नहीं, इससे प्रकृति के साथ जुड़ने की सीख नए सिरे से लोगों के व्यवहार में शामिल होंगे, जिससे हरियाली और जैव विविधता को बचाने के प्रति लोग ज्यादा जिम्मेदार, ज्यादा संवेदनशील रुख अपनाएंगे। यह भी कि जंगल को प्राकृतिक रूप से विकसित होने में कई साल लगते हैं लेकिन पूरी तरह बर्बाद होने में कुछ ही महीने। पेड़ों के कटने से हवा, पानी और मिट्टी की गुणवत्ता पर असर पड़ता है।

किसी इलाके में भवन निर्माण को स्वीकृति के साथ आधारभूत संरचना के निर्माण के लिए पेड़ों को काटना और इस नुकसान की भरपाई के लिए उतने ही पेड़ों को दूसरी जगह लगाना पर्यावरण के लिहाज से ऐसा उपाय नहीं है, जिसे हम सही या वैज्ञानिक मानें। अब तो मुंबई समेत कई शहरों में इस तरह के कई आंदोलन भी शुरू हो गए हैं, जिसमें लोग सरकार से मांग कर रहे हैं कि उन्हें उन सुविधाओं की जरूरत नहीं जो वन कटाई की कीमत पर उन्हें हासिल हो।

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