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स्वाद, सेहत और हमारी रसोई

हाल ही में मशहूर अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी ने पोषण-विशेषज्ञ ल्यूक कोटिन्हो के साथ मिलकर एक किताब लिखी है-द ग्रेट इंडियन डाइट।

हाल ही में मशहूर अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी ने पोषण-विशेषज्ञ ल्यूक कोटिन्हो के साथ मिलकर एक किताब लिखी है-द ग्रेट इंडियन डाइट। उनका कहना है कि भारतीय यानी हमारे देसी खाने में मौजूद दालें, सब्जियां, दही, चावल, रोटी आदि का कोई मुकाबला नहीं है। नारियल को छोड़कर जैतून के तेल में खाना पकाना कोई अक्लमंदी नहीं है। शिल्पा ने यह भी बताया कि वह अपने बेटे विआन को अधिक से अधिक भारतीय खाना खिलाना ही पसंद करती हैं। पीने के लिए भी किसी शीतल पेय की जगह वह उसे नीबू- पानी ही देती हैं। उनका कहना है कि जब वह छोटा था, तो उसे हर रोज अदरक का एक टुकड़ा चबाने को देती थीं। उससे वादा किया जाता था कि अगर वह अदरक खा लेगा, तो गुड़ भी खाने को मिलेगा। उसने दो साल की उम्र तक कभी चाकलेट नहीं खाई। बच्चा अकसर वही खाता है जो आप खाते हैं।

शिल्पा की बात सुनकर अच्छा भी लगा और आश्चर्य भी हुआ। भारत में आखिर बहुत से अभिनेता-अभिनेत्रियों के जरिए ही जंक फूड को लोकप्रिय किया गया। तरह-तरह के शीतल पेय, पिज्जा, बर्गर, नूडल्स, चाकलेट, ऊर्जा देने वाले पेय आदि को इन्हीं लोगों के द्वारा प्रचार माध्यमों और मीडिया के जरिए घर-घर पहुंचाया गया। इनके विज्ञापनों से अखबार भी पट गए और ये खाद्य पदार्थ, जिनका कभी नाम भी नहीं सुना गया था, घर-घर जा पहुंचे। कहीं इन उत्पादों के विज्ञापन न मिलें और राजस्व का नुकसान न हो ,इसके लिए अगर खानपान की इन बदलती आदतों से नुकसान की बात कही भी गई तो बेहद धीरे सुर में। और आज हालात यह है कि ये चीजें कस्बे और गांवों तक में गहरी पैठ बना चुकी हैं।

शरबत पीना गए जमाने की बात तो है ही उसे सोशल स्टेट्स के अनुकूल भी नहीं माना जाता। स्थानीय खाद्य पदार्थ अब ढूंढे नहीं मिलते। बल्कि लोग इन्हें बनाना भी भूल चुके हैं। हां यही चीजें अब रूप बदलकर पांच सितारा होटलों तक जा पहुंची हैं। सेहत के लिए वे ही इनका भरपूर सेवन कर रहे हैं, जिन्होंने गरीबों को नए खानपान की चीजों को खाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने ही इसे खाने से समाज में अच्छा स्थान पाने और सोसायटी के उच्च लोगों में पैठ बनाने का साधन बताया। यह बात अलग है कि आम आदमी और गरीब की सेहत की कीमत पर इन सितारों ने अरबों और करोड़ों कमाए हैं। हां,अपने बच्चों और परिवार के लिए इनके अलग नियम लागू हैं। शिल्पा का कथन इसी बात का उदाहरण है।

आज सरकारें कहती हैं कि स्कूलों की कैंटीनों में जंक फूड न बेचा जाए। लेकिन यह प्रतिज्ञा सिर्फ बातों तक ही सीमित रहती है। बच्चे इनके अलावा कुछ और खाना भी नहीं चाहते हैं। इसमें उनका कोई कसूर भी नहीं। रात-दिन उन्हें यही तो बताया गया है कि वे अपने साथियों के बीच तभी जगह बना सकते हैं, जब इनको खाएं। पहले पूरी, पकवान, तली हुई चीजें कभी-कभार किसी मेहमान के आने पर या त्योहार-वार ही खाई जाती थीं, लेकिन अब वे खुले बाजार में भारी मात्रा में उपलब्ध हैं।

एक बात यह भी है कि पहले परिवार के हर सदस्य के लिए घर की औरतें रात-दिन खटती थीं, अब वे बाहर निकली हैं। नौकरी करती हैं। पुराने समय की औरतों की तरह हर पल रसोई में नहीं लगी रह सकतीं। बने बनाए खाने को परिवार के लोग बाजार से खरीदकर खाएं, उनकी मजबूरी भी है। इसीलिए अगर स्कूलों में आने वाले बच्चों के टिफिन देखे जाएं तो आजकल अधिकांश में घर का खाना न होकर, बाहर की कोई चीज होती है या वे कैंटीन से खाते हैं, जहां भारी मात्रा में जंक फूड उपलब्ध है।
और तो और जंक फूड के परम विरोधी बाबा रामदेव ने मैगी के बाजार से गायब होने को एक सुनहरे अवसर के रूप में देखा और अपनी कंपनी की मैगी लांच कर दी। यही नहीं बाबा कहते हैं कि वह अन्न नहीं खाते। उन्होंने अपनी मैगी को लोकप्रिय बनाने के लिए उसे खाकर भी दिखाया।

कुछ दिन पहले अपने देश में मैगी पर रोक लगा दी गई, बाद में उसे सेहत के लिए ठीक बताया गया। और वह बाजार में आने वाली थी। एक दिन यह लेखिका एक दुकान में खड़ी थी। वहां दुकानदार ने एक आदमी के पूछने पर बताया कि कल से मैगी मिलने लगेगी, तो वहां खड़ी एक किशोरी ने कहा-थैंक गाड। बुरे प्रचार से भी कोई ब्रांड कितना लोकप्रिय हो सकता है कि जिस दिन मैगी बाजार में आई, चार घंटे में ही सारी बिक गई। खबरें तो यह भी थीं कि युवा इसे चोर बाजार से खरीदकर खा रहे थे।
आजकल बड़ी संख्या में बच्चे और युवा जरूरत से बहुत अधिक कैलोरी खा रहे हैं और बचपन और युवा अवस्था में ही मधुमेह, उच्च रक्तचाप, गठिया यहां तक कि हृदय रोग जैसी बड़ी उम्र में होने वाली और ताउम्र रहने वाली बीमारियों का शिकार हो रहे हैं।
आज से पचास साल पहले ज्वार, बाजरा, मक्का, चना, जई, जौ आदि मोटे अनाज गरीब का खाना माने जाते थे। गेहूं तक गरीब की पहुंच नहीं थी।

लेकिन देश में ऐसी गेहूं क्रांति हुई कि किसानों ने इन्हें उगाना ही बंद कर दिया। गरीब और अमीर सब गेहूं खाने लगे। लेकिन अब बताया जा रहा है कि गेहूं के मुकाबले इन अनाजों को खाना सेहत के लिए कितना अच्छा है। लेकिन अब ये अनाज गरीब की थाली और पहुंच से बहुत दूर हो चुके हैं। अब वही जई ओट्स के रूप में चमकते पैकेटों में बेहद महंगे दामों पर उपलब्ध है और विदेशों से भी आती है। वजन घटाने के लिए सेहत सलाहकार इसे अनेक रूप में खाने की सलाह देते हैं। मेलों में बाजरे और मक्के की एक रोटी डेढ़-डेढ़ सौ रुपए की मिलती है। गुड़ की चाय पीना फैशनेबुल माना जाता है। कुल्हड़ में चाय आज किसी ढाबे या रेलवे स्टेशन पर नहीं मिलती मगर कई होटलों में कुल्हड़ की मनमानी कीमत वसूलकर परोसी जा सकती है।

कुल मिलाकर यह कि मार जब भी पड़ती है तब गरीब को। उसी के हिस्से का स्वाद और सेहत उद्योग और अमीर अपने हित के लिए छीन लेते हैं और उसे पता भी नहीं चलता। सच तो यह है कि न जाने कब से हमारी रसोई में मिलने वाले मसालों, शाक-भाजियों, दालों का उपयोग हमारी दादी नानियां तरह-तरह की बीमारियां ठीक करने में करती रही हैं। यही नहीं, किस सब्जी को पकाने के लिए कौन सा मसाला और तेल, चाहिए यह उन्हें परंपरा से मालूम रहता आया है। अरबी को अजवायन में ही बनाना है, और उड़द को मेंथी से, हर सब्जी में हल्दी डालनी है, रायते में हींग, जीरा और काला नमक जरूरी है, हरी सब्जियां जरूर खाई जाएं, यह कोई बुढ़िया पुराण नहीं था, बल्कि सालों की खोज का परिणाम था, जिसे तपस्या कहा जाता था।

तपस्या का मतलब जंगल के किसी एकांत में आंखें मूंदकर और हाथ जोड़कर बैठे रहना नहीं था, जैसा कि चित्रों में दिखाया जाता है। हां, लोग अपनी खोज करने के लिए जंगल या एकांत की तलाश करते थे, जिससे कि बिना किसी विघ्न के काम कर सकें। और यह प्राप्त किया ज्ञान आज की तरह पेटेंट भी नहीं कराना पड़ता था। यह घर-घर जा पहुंचता था। और लोग उसका लाभ उठाते थे। इस ज्ञान को बिना किसी भारी-भरकम फीस के एक पीढ़ी, दूसरी पीढ़ी को सौंपती जाती थी। घर की औरतों को इस तरह के ज्ञान में महारत हासिल थी और आज भी है। इन्हें पता था कि कब क्या खाना है, बुखार और बीमारी में क्या देना है, इसके लिए उन्हें पल-पल डॉक्टर के पास दौड़ने की जरूरत नहीं रहती थी। रात में दही नहीं खाना है, दूध के साथ मूली नहीं खानी है, रात में हलका खाना ठीक है। आखिर आज सेहत विशेषज्ञ भी तो रात में कम खाने और जल्दी खाने की सलाह देते हैं, क्योंकि सूरज ढलने के बाद हमारे शरीर की चयापचय (मेटाबालिक सिस्टम) प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है। सोते समय शरीर ज्यादा ऊर्जा या कैलोरी का उपयोग नहीं कर पाता है।

तेल के उपयोग

बचपन में बालों की लंबाई बढ़ाने के लिए सिर में सरसों का तेल लगाया जाता था। वह भी नहाने के बाद। त्वचा का रूखापन दूर करना हो, कान में खुजली हो,दर्द हो, नाक में खुश्की हो, शरीर की मालिश करनी हो, सब बातों के लिए सरसों का तेल उपयोग में लाया जाता था। खाना पकाने और तलने में तो इसका उपयोग था ही। इसमें चिकनाई की मात्रा कम मानी जाती थी, जो होती भी है। सर्दी में भी यह जमता भी नहीं है। अचार डालने में इसका उपयोग था। इस तेल से बने अचार खराब नहीं होते थे। यह एक तरीके सुरक्षित प्रिजरवेटिव था।

हड्डी की मजबूती के लिए भी इसके बेहतरीन उपयोग थे। नवजात की शिशु की मालिश इस तेल में अजवायन या लहसुन जलाकर की जाती थी। उसके कान में इस डाला जाता था। इसी तेल से काजल बनाया जाता था। दीपावली के दिन इसी तेल के दीये जलते थे। यही नहीं, इस तेल में हल्दी भूनकर नमक मिलाकर पुलटिस बनाई जाती थी। इसे रात में बांधकर सोने के बाद, एक-दो दिन में पुराने से पुराना फोड़ा ठीक हो जाता था। आज शोध इस तेल के फायदे बता रहे हैं। मगर हमारी रसोई में रहने वाली औरतें इसे पारंपरिक रूप से जानती रही हैं।

भारत में जिस इलाके में जो तेल मिलता है जैसे कि नारियल, तिल, मूंगफली, बादाम , अलसी आदि के तेल। उसके इतने उपयोग हैं कि गिनती मुश्किल है। इसे हजारों साल के अनुभव से सीखा गया है। अगर सारे इलाज रसोई कर लेगी तो दुनियाभर में फैली दवा कंपनियों का, डॉक्टरों का, महंगे अस्पतालों का क्या होगा। पहले जो चीजें मामूली समझी जाती थीं और छोटे-मोटे घरेलू इलाज से ठीक हो जाती थीं, अब तो उनके लिए भी डॉक्टर के पास दौड़ने की सलाह दी जाती है। लोग दौड़ते भी हैं। मजबूरी है। ठीक होना है। पारंपरिक ज्ञान को एक तो पिछड़ेपन के खाते में बरसों पहले डाल दिया गया, दूसरे लोग उसे भूलते भी जा रहे हैं।

इसके अलावा प्रसाधन उद्योग कैसे चलता? किस तरह उसका दुनिया भर में अरबों-खरबों का व्यापार फैलता, अगर सब काम घर में पाए जाने वाले कम कीमत के तेल से ही हो जाएं? इसीलिए विज्ञापनों के माध्यम से तेल को हंसी का पात्र बना दिया गया। अगर आप के बालों में तेल है, शैंपू से नहीं धोए, आपके चेहरे पर किसी महंगी क्रीम की जगह तेल लगा है तो आप न केवल हंसने बल्कि घृणा के योग्य हैं। आपकी तैलीय त्वचा मानों संसार में सबसे बड़ा अपराध हो। तेल माने आपकी कोई हैसियत ही नहीं है।

बेचारा घी

आयुर्वेद में घी को अमृत समान माना गया है। शरीर के लिए इसके बेहतरीन उपयोग बताए गए हैं। लेकिन पिछले साठ-सत्तर बर्ष में घी को एक तरह से मनुष्य के लिए सबसे बड़ा खलनायक साबित कर दिया गया है। सारे डॉक्टर, अस्पताल लोगों को रोगों से बचने के लिए घी न खाकर रिफाइंड तेल खाने की सलाह देते रहे हैं, जबकि भारतीय खान-पान में घी हमेशा से मौजूद रहा है। हां, ज्यादा खाना हानिकारक हो सकता है। तो ज्यादा खाना तो किसी भी चीज का हानिकारक है, चाहे वह कितनी ही स्वादिष्ट और सेहत के लिए अच्छी क्यों न हो। पिछले दिनों एक शोध की खबर छपी थी कि घी हृदय रोगियों के लिए भी खतरनाक नहीं है। मगर इस पर कहीं अधिक चर्चा देखने-सुनने को नहीं मिली क्योंकि अरसे से घी को हमारे सही खानपान के लिए बुरा बताया जाता रहा है।

बेचारे घी की मुसीबत यह है कि वह घर-घर में तैयार होता है। उसे बेचने के लिए भारी-भरकम तनख्वाह वाले मार्कंटिंग एक्सपर्ट नहीं रखे जाते। जो किसी नुकसानदायक चीज को भी फायदे के सुनहरे पन्नी में लपेटकर बेच सकते हैं। न ही कोई उद्योग उसे बनाता है, जिससे कि उसका रात-दिन विज्ञापन कर सके। उसे बेचकर भारी मुनाफा कमा सके। आज वही बिकता है जो दिखता है, और जिसे बेचने की तरह-तरह की जुगत भिड़ाई जाती हैं। मशहूर भोजन विशेषज्ञ ईशी खोसला तो लगातार घी के पक्ष में
लेख लिखकर अभियान चलाती रही है। चिकित्सा में भी घी का बहुत उपयोग है। सर्दी खांसी से लेकर जोड़ों के दर्द तक मगर अब उसकी कोई सुध लेने वाला नहीं है।

परिष्कृत तेल और कैलोरी

परिष्कृत (रिफाइंड) तेल के बारे में कई बड़े स्वास्थ्य केंद्र अपने यहां पोस्टर

लगा रखे हैं, जिनमें लिखा है कि इन तेलों के बारे में यह गलतफहमी न पालें कि ये शून्य कैलोरी के होते हैं। और इनमें तलना, खाना पकाना सेहत के लिए अच्छा है। बल्कि इनमें से बहुतों में निन्यानबे प्रतिशत तक कैलोरी होती है, जबकि आजकल इन तेलों को सेहत के लिए किसी अमृत की तरह जरूरी बताकर बेचा जाता है। इन्हें खाने से जिन रोगों को ठीक होने की बात कही जाती है, उनके लिए कौन से चिकित्सीय परीक्षण किए गए, पता नहीं। इनके विज्ञापनों में की गई अतिशयोक्तियों पर क्यों किसी खाद्य एवं औषधि प्रशासन का ध्यान नहीं जाता।

जैविक खेती

पहले किसानों से कहा गया कि वह अपने खेतों मे अधिक से अधिक कीटनाशक का प्रयोग करे। जो कीटनाशक पश्चिम में सालों पहले बंद कर दिए गए थे, भारत में उन्हें बड़े पैमाने पर भेज दिया गया। और आज जैविक खेती पर जोर दिया जा रहा है। जैविक खेती का मतलब कीटनाशकों का प्रयोग न हो। मगर इसकी पहुंच भी सिर्फ उन्हीं तक हैं, जो पैसेवाले हैं, क्योंकि जैविक खेती के उत्पाद इतने महंगे हैं कि उन्हें खरीदना आम बात के वश की बात नहीं है।

कुछ पारंपरिक ज्ञान

०हल्दी कैंसररोधी है इसीलिए हमारे यहां खाने में इसका खूब उपयोग है। हल्दी, आंवला, लहसुन, अदरक ये सभी बेहद लाभदायक हैं।
०सवेरे गुड़ के साथ मट्ठा पीना चाय से बेहतर है।
०दक्षिण भारत में किसान चावल के मांड़ को खेत पर जाने से पहले ताकत के लिए पीते रहे हैं। इसे कंजी कहा जाता है। वहां डॉक्टर अतिसार में भी इसे पीने की सलाह आज भी देते हैं।
०नारियल पानी और नीबू-पानी काला नमक और चीनी, ओआरएस घोल की तरह ही काम करते हैं। ०

उबटन:

तरह-तरह के रसायनों से भरे प्रसाधनों की भरमार हो गई है। लड़कियां इनका भारी मात्रा में उपयोग भी करती हैं। आज उबटन गए जमाने की बातें हो गई हैं। मगर पश्चिम में ऐसे ब्यूटी क्लीनिक खुल रहे हैं जो दही, शहद, बेसन, हल्दी चंदन आदि का उपयोग करते हैं। और यह काफी महंगे हैं।
हमें यह जरूर सोचना चाहिए कि अपने घर के स्वाद और सेहत से परे कहीं हम किसी कंपनी के चमक-दमक भरे विज्ञापनों को देखकर तो उसके आकर्षण में नहीं जा फंसे हैं। ०
स्वाद, सेहत और हमारी रसोई

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