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कैंसर के इलाज में सहायक मॉलीक्यूल की खोज का दावा

मध्य प्रदेश के एक शासकीय तकनीकी विश्वविद्यालय राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (आरजीपीवी) के कुलपति प्रो. पीयूष त्रिवेदी और फार्मेसी विभाग के पीएचडी छात्र डॉ सी कार्तिकेयन ने करीब 10 साल के अनुसंधान के बाद दुष्प्रभाव रहित ‘कैंसर रोधी मॉलीक्यूल’ के अविष्कार का दावा किया है..

Author भोपाल | December 7, 2015 9:55 PM
Low Fat, Low Fat Diet, Fat Diet, Breast Cancer, Breast Cancer, Breast Cancer facts, healthचित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है। (रॉयटर्स फोटो)

मध्य प्रदेश के एक शासकीय तकनीकी विश्वविद्यालय राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (आरजीपीवी) के कुलपति प्रो. पीयूष त्रिवेदी और फार्मेसी विभाग के पीएचडी छात्र डॉ सी कार्तिकेयन ने करीब 10 साल के अनुसंधान के बाद दुष्प्रभाव रहित ‘कैंसर रोधी मॉलीक्यूल’ के अविष्कार का दावा किया है। दोनों वैज्ञानिकों का कहना है कि यह खतरनाक बीमारी कैंसर के इलाज की दिशा में एक महत्वपूर्ण खोज साबित होगा।

प्रो त्रिवेदी और डॉ कार्तिकेयन ने सोमवार को यहां संवाददाताओं के समक्ष अपने नए अविष्कार की घोषणा करते हुए बताया कि इस कैंसर रोधी मॉलीक्यूल को सीटीआर-17 और सीटीआर-20 नाम दिया गया है। इसके यूएस पेंटेट के लिए प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। उन्होंने बताया कि हर भारतीय के घर में पाई जाने वाली रोगाणु रोधक हल्दी से प्रेरित होकर इस नए कैंसर रोधी मॉलीक्यूल को ईजाद किया गया है। उन्होंने कहा कि प्री-क्लिीनिकल परीक्षणों में इसे दुष्प्रभाव रहित पाया गया है। सभी तरह के कैंसर के इलाज में इसके चमत्कारिक नतीजे हासिल हुए हैं।

फार्मासिस्ट प्रो त्रिवेदी ने नए मॉलीक्यूल को कैंसर की प्रचलित दवाओं से इसलिए नवीन और अलग बताया कि कैंसर की कीमोथेरेपी आदि में दी जाने वाले दवाओं से मानव शरीर पर कई तरह के दुष्प्रभाव होते हैं जबकि यह मॉलीक्यूल सीधे शरीर की कैंसर कोशिकाओं पर ही असर करता है। इसका शरीर की अन्य अहम कोशिकाओं पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता। उन्होंने बताया कि यह खोज हमारी और हमारे सहयोगी एडवांस मेडिकल रिसर्च इन्सटिट्यूट, कनाडा के डॉ होयुन ली की 10 साल से की जा रही रिसर्च का परिणाम है। इस खोज के लिए अमेरिकी पेटेंन्ट भी फाइल किया गया है। इस मालीक्यूल को क्लिनिकल ट्रायल में ले जाया जा रहा है।

प्रो त्रिवेदी ने कहा कि इस शोधकार्य में सीटीआर-17 और सीटीआर-20 नामक दो मालीक्यूल कैंसर रोधी प्रतिक्रिया दिखाते हैं, जो कि मुख्यत: कैंसर कोषिकाओं में ट्यूबिलिन नामक प्रोटीन की क्रिया को रोकता है। ट्यूबिलिन एक प्रकार का प्रोटीन है और कैंसर कोशिकाओं में सेल डिवीजन को बढ़ाने में मुख्य कारक है। कैंसर की रोकथाम के लिए ट्यूबिलिन के दूसरे भी कई रोधक उपलब्ध हैं, जिनसे कई प्रकार के दुष्प्रभाव होते हैं और दूसरी दवाइयों के लिए कैंसर कोशिकाओं में प्रतिरोधकता निर्मित करते हैं। उन्होंने कहा कि इस मॉलीक्यूल के साथ ही 22 अन्य मालीक्यूल भी प्री-क्लिीनिकल ट्रायल में जा रहे हैं। इनके प्रारंभिक नतीजे बेहद उत्साहजनक हैं। उन्हें उम्मीद है कि भविष्य में यह कैंसर मरीजों के लिए बेहद उपयोगी होंगे।

आरजीपीवी के कुलपति ने कहा कि यह विश्वविद्यालय देश का पहला ऐसा विश्वविद्यालय होगा जिसमें इस तरह का अनुसंधान किया गया है जो कि खतरनाक बीमारी कैंसर से लड़ने में लोगों को सहायक होगा।
डॉ कार्तिकेयन ने बताया कि सीटीआर-17 और सीटीआर-20 का प्री-क्लिीनिकल परीक्षण कनाडा में किया गया है। अब इसका क्लिीनिकल परीक्षण भी कनाडा में ही किया जाएगा। उन्होंने कहा, ‘इस शोध के दौरान चूहों पर किए गए परीक्षण में यह भी पता चला है कि जिन चूहों में कैंसर था उनमें सीटीआर-17 और सीटीआर-20 देने के बाद कैंसर का आकार कम हुआ और चूहों का जीवनकाल भी बढ़ा। वह लंबे समय तक बिना किसी दुष्प्रभाव के यह कैंसर कोशिकाओं को समाप्त करने में असरकारक रहा है। प्रो त्रिवेदी ने अपने अनुसंधान के आधार पर दावा किया कि कैंसर की दूसरी दवाई जैसे पॉक्लीटेक्सल के साथ देने पर यह उन दोनों के प्रभाव को काफी बढ़ाता है। इस शोध कार्य के परिणाम के आधार पर यह उम्मीद की जा रही है। सीटीआर-17 और सीटीआर-20 मालीक्यूल मानव क्लिनिकल परीक्षण में भी इसी असर को बरकरार रखेंगे। कैंसर के इलाज की दिशा में यह खोज इसलिए भी अहम हो जाती है क्योंकि कैंसर पूरे विश्व की सबसे जानलेवा बीमारियों में से एक है। दुनिया में करीब 82 लाख मौतें हर साल कैंसर से होती हैं।

वर्ल्ड कैंसर रिपोर्ट के मुताबिक केवल भारत में ही इस बीमारी के हर साल करीब 10 लाख नए मरीज जुड़ते हैं। इनमें से करीब सात लाख लोगों की मौत इस बीमारी के चलते हो जाती है। उन्होंने बताया कि कैंसर रिसर्च में क्लिीनिकल परीक्षण तक जाने वाला संभवत: यह देश का पहला मालीक्यूल है। कैंसर रोधी मालीक्यूल की खोज के क्षेत्र में यह एक महत्वपूर्ण योगदान साबित होगा। इस खोज से आरजीपीवी विश्व में कैंसर पर रिसर्च कर रहे विश्वविद्यालयों में अग्रणी पंक्ति में शामिल हो जाएगा।

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