दिल्ली के एक कॉलेज कैंपस में शुरू हुई कीर्ति और अनुज की कहानी, दोस्ती से प्यार तक पहुंची, और फिर एक दशक लंबा साथ भी निभा गई। दोनों एक-दूसरे के सबसे भरोसेमंद साथी हैं, खुशियां, परेशानियां, करियर के फैसले सब कुछ साझा करते हैं। मल्टीनेशनल कंपनियों में सफल करियर, स्थिर जिंदगी और मजबूत रिश्ता… सब कुछ होने के बावजूद उनकी कहानी वहीं ठहरी हुई है, जहां से शुरू हुई थी।

आमतौर पर रिश्ते वक्त के साथ अगले पड़ाव यानी शादी की ओर बढ़ते हैं। लेकिन कीर्ति और अनुज ने इस अगले कदम की कभी जरूरत ही महसूस नहीं की। सवाल यह है कि जब रिश्ता मजबूत है, समझदारी है और साथ भी है, तो आखिर क्यों आज की पीढ़ी के कुछ लोग शादी के बंधन से दूर रहकर ‘सोलो’ या ‘अनकन्वेंशनल’ रिश्तों में ही सुकून तलाश रहे हैं?

कीर्ति और अनुज का मामला कोई अपवाद नहीं है। फोर्टिस अस्पताल, शालीमार बाग, दिल्ली में सीनियर साइकियाट्रिस्ट डॉ. विशाल छाबड़ा बताते हैं यह बदलाव एक गहरी सामाजिक और मानसिक शिफ्ट का संकेत है। डॉ. विशाल के अनुसार सोलो लिविंग कोई अचानक आया ट्रेंड नहीं है, बल्कि समाज में समय-समय पर ऐसे बदलाव आते रहते हैं। आज के दौर में यह ट्रेंड खासतौर पर बड़े शहरों और मेट्रो सिटीज में ज्यादा देखने को मिल रहा है, जहां लोग ज्यादा करियर-ओरिएंटेड हो गए हैं।

National Family Health Survey क्या कहता है? 

NFHS-5 (National Family Health Survey) और जनगणना के रुझानों के मुताबिक भारत में पिछले एक दशक में ‘एकल सदस्य वाले घरों’ (Single-person households) में वृद्धि हुई है। खासतौर पर दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में 30-45 साल की उम्र के लोगों में अविवाहित रहने या अकेले रहने का प्रतिशत 15% से 22% तक बढ़ा है। UN की रिपोर्ट Progress of the World’s Women संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, भारत में Single Women की संख्या में 2001 से 2015 के बीच 39% की भारी बढ़ोतरी देखी गई।

एरिक क्लिनबर्ग की रिसर्च Going Solo

प्रसिद्ध समाजशास्त्री एरिक क्लिनबर्ग ने अपनी रिसर्च में बताया है कि सोलो लिविंग का बढ़ना स्वतंत्रता की चाह का परिणाम है। उनके अनुसार आज के युवा अकेले रहने को असफलता नहीं बल्कि एक लग्जरी और व्यक्तिगत सफलता के रूप में देखते हैं।

शादी क्यों लगने लगती है बोझ?

अक्सर कहा जाता है कि शादी का लड्डू जो खाए वो पछताए जो न खाए वो भी पछताए… ये कहावत अब पुरानी हो चुकी है। अब का दौर तो नो लड्डू, ओनली लाइफ’ का है। भारत में एक ऐसा बड़ा वर्ग तैयार हो रहा है, जो शादी की रस्मों और जिम्मेदारियों से ज्यादा ‘सोलो लिविंग’ के सुकून को चुन रहा है। युवाओं के लिए अब अकेला रहना अकेलापन नहीं, बल्कि एक लग्जरी और स्टेटस सिंबल है। आखिर क्यों आज का युवा रिश्तों में बंधने से कतरा रहा है और क्यों उसे शादी एक ‘कॉन्ट्रैक्ट’ जैसी लगने लगी है?

आज की पीढ़ी शादी को बंधन की तरह क्यों देखने लगी है?

जब कोई व्यक्ति अपने करियर पर बहुत ज्यादा फोकस करता है, तो शादी उसे एक जिम्मेदारी या बाधा (hurdle) जैसी लग सकती है। शादी के बाद जिम्मेदारियां बढ़ती हैं, जिससे व्यक्ति का फोकस बदल सकता है। यही कारण है कि कई युवा शादी को टालते हैं या उससे बचना चाहते हैं।

क्यों बढ़ रहा है सोलो लिविंग का ट्रेंड?

सोलो लिविंग का ट्रेंड मेट्रो और वेस्टर्न कल्चर का प्रभाव है। यह ट्रेंड मुख्य रूप से बड़े शहरों और पश्चिमी देशों से प्रभावित है। अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में सोलो लिविंग पहले से ही आम है, और अब भारतीय शहरी युवाओं में भी यह सोच तेजी से फैल रही है। डॉ. विशाल छाबड़ा के अनुसार मेट्रो सिटीज में बढ़ता करियर-ओरिएंटेशन शादी को एक ‘बाधा’ (Hurdle) के रूप में दिखा रहा है। आज का युवा अपनी शर्तों पर जीना चाहता है, जहां किसी और के लिए ‘एडजस्ट’ करने की गुंजाइश कम होती जा रही है।

सोलो लिविंग के पीछे के साइकोलॉजिकल कारण

डॉ. छाबड़ा के अनुसार, इसके पीछे एक नहीं बल्कि कई कारण हो सकते हैं जैसे

  1. पारिवारिक अनुभव (Family Trauma):अगर किसी ने अपने घर में खराब शादी, झगड़े या तलाक देखा है, तो वह शादी से डर सकता है। ऐसे अनुभव व्यक्ति के मन में शादी को लेकर नकारात्मक छवि बना देते हैं।
  2. करियर और महत्वाकांक्षा: कुछ लोग इतने महत्वाकांक्षी होते हैं कि वे पूरी तरह अपने करियर में डूब जाते हैं। जब तक उन्हें शादी के बारे में सोचने का समय मिलता है, तब तक या तो सही पार्टनर नहीं मिलता या वे अकेले रहने के आदी हो चुके होते हैं।
  3. आर्थिक स्थिरता की चाह:आज के युवा पहले आर्थिक रूप से मजबूत होना चाहते हैं जैसे अच्छी कमाई, अपना घर, स्थिर जीवन, उसके बाद ही शादी के बारे में सोचते हैं।
  4. अकेले रहने की आदत:जो लोग लंबे समय तक अकेले रहते हैं, उन्हें अपनी स्वतंत्रता की आदत हो जाती है। इसके बाद किसी और के साथ एडजस्ट करना मुश्किल लगने लगता है।
  5. पिछले रिश्तों का खराब अनुभव:अगर किसी की शादी या रिलेशनशिप पहले खराब रही हो, तो वह दोबारा उस अनुभव से गुजरना नहीं चाहता।
  6. पारिवारिक जिम्मेदारियां:कई लोग परिवार की जिम्मेदारियों जैसे बीमार माता-पिता की देखभाल में इतने व्यस्त रहते हैं कि शादी पीछे छूट जाती है।

सोलो लिविंग का साइकोलॉजिकल एंगल

सोलो लिविंग के लिए एक नहीं बल्कि कई फैक्टर जिम्मेदार है। सोलो लिविंग का निर्णय किसी एक वजह से नहीं होता। इसमें कई फैक्टर्स शामिल होते हैं जैसे

  • पर्सनैलिटी (independent nature)
  • पिछले अनुभव (trauma)
  • दोस्त और सामाजिक सर्कल
  • करियर और लाइफस्टाइल
  • बदलती सामाजिक संरचना

जॉइंट फैमिली से न्यूक्लियर फैमिली में शिफ्ट होना कैसे है जिम्मेदार?

पहले लोग संयुक्त परिवार में रहते थे, जहां शादी का दबाव ज्यादा होता था। अब न्यूक्लियर फैमिली और आर्थिक स्वतंत्रता ने लोगों को अकेले रहने का विकल्प दे दिया है। खासतौर पर महिलाओं के लिए यह बड़ा बदलाव है। अब वे आर्थिक रूप से सक्षम हैं और अकेले रहने का निर्णय ले सकती हैं।

क्या सोलो लिविंग हमेशा सही है?

डॉ. छाबड़ा के अनुसार, इंसान एक सोशल एनिमल है। शुरुआत में अकेले रहना अच्छा लग सकता है, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ समस्याएं सामने आ सकती हैं। साइकोलॉजिकल प्वाइंट को समझे तो अकेले रहने की आदत लोगों को लम्बे समय तक बांधकर नहीं रख सकती।  40–50 की उम्र में अकेलापन बढ़ने लगता है।  इस उम्र में दोस्त अपने परिवार और बच्चों में व्यस्त हो जाते हैं, तब अकेले रहने वाले लोगों को खालीपन महसूस हो सकता है। इमोशनल सपोर्ट की कमी महसूस होती है

मानसिक स्वास्थ्य पर सोलो रिलेशन का असर

  • अगर भावनात्मक जरूरतों को नजरअंदाज किया जाए तो
  • अकेलापन (loneliness)
  • एंग्जायटी और डिप्रेशन
  • नशे की ओर झुकाव बढ़ता है।

सोलो रिलेशन में है तो कैसे लाएं खुद को ट्रैक पर

  • डॉ. छाबड़ा सलाह देते हैं कि अगर कोई व्यक्ति अकेले रह रहा है, तो उसे सामाजिक गतिविधियों में शामिल होना चाहिए।
  • कम्युनिटी से जुड़ा रहना चाहिए।
  • दोस्तों और परिवार से संपर्क बनाए रखना चाहिए।
  • अकेले रहना ठीक है, लेकिन पूरी तरह सामाजिक रूप से कट जाना सही नहीं है।

सोलो रिलेशन का समाज पर असर?

पश्चिमी देशों में सोलो रिलेशन का चलन तेजी से बढ़ा है लेकिन यही चलन भारत में भी बढ़ने लगा है। इस रिश्ते का असर समाज को प्रभावित कर सकता है। देश की आबादी कम हो सकती है और सामाजिक संरचना कमजोर हो सकती है। भारत को इस ट्रेंड से सीख लेकर संतुलन बनाना होगा।

निष्कर्ष

सोलो लिविंग एक तेजी से उभरता ट्रेंड है, लेकिन यह सभी के लिए सही नहीं है। यह आजादी और आत्मनिर्भरता देता है, लेकिन लंबे समय में भावनात्मक संतुलन और सामाजिक जुड़ाव भी उतना ही जरूरी है। पैसा और स्वतंत्रता सब कुछ नहीं, इमोशनल कनेक्शन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

डिस्क्लेमर : इस लेख में साझा की गई जानकारी केवल सामान्य जागरूकता और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है। यह किसी भी पेशेवर चिकित्सा सलाह, मनोवैज्ञानिक निदान (Psychological Diagnosis) या उपचार का विकल्प नहीं है। रिश्तों, मानसिक स्वास्थ्य या जीवनशैली से जुड़े किसी भी बड़े फैसले पर पहुंचने से पहले हमेशा किसी प्रमाणित काउंसलर, मनोवैज्ञानिक या संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श जरूर लें। लेख में दिए गए विचार विशेषज्ञ की राय और सामान्य सामाजिक रुझानों पर आधारित हैं, जनसत्ता इसे पूर्णतः सटीक होने का दावा नहीं करता है।