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एनपीपीए ने लगाई मुहर- स्‍टेंट्स पर मरीजों से वसूला जा रहा 1000 फीसदी तक मुनाफा

एक घरेलू कंपनी के लिए ड्रग एल्यूटिंग स्टेंट (डीईएस) की निर्माण लागत करीब 8 हजार रुपये पड़ती है।

इस चित्र का इस्तेमाल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है।

अब यह चीज आधिकारिक तौर पर साबित हो चुकी है कि दिल में लगने वाला स्टेंट मैन्युफैक्चरर से मरीज तक पहुंचते-पहुंचते 10 गुना महंगा हो जाता है। सोमवार को जारी हुए नैशनल फार्मास्युटिकल प्राइजिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) ने विभिन्न चरणों पर स्टेंट से कमाई करने वाले प्लेयर्स के आंकड़ों के बारे में बताया। आंकड़ों में कहा गया कि सभी प्लेयर्स में अस्पताल 650 के प्रॉफिट मार्जिन के साथ सबसे ऊपर हैं। टाइम्स अॉफ इंडिया ने आंकड़ों के हवाले से बताया कि एनपीपीए ने हर चरण पर मार्जिन का पता लगाया है और यह दिखाता है कि स्टेंट पर मार्जिन 270 प्रतिशत से 1000 प्रतिशत तक जाता है। इसकी कीमतों में सबसे ज्यादा उछाल अस्पतालों के चरण पर होता है। सभी अस्पताल ज्यादा मार्जिन लेकर नहीं चलते। वरना इसका मार्जिन 11 प्रतिशत से 654 प्रतिशत तक होता है।

एक घरेलू कंपनी के लिए ड्रग एल्यूटिंग स्टेंट (डीईएस) की निर्माण लागत करीब 8 हजार रुपये पड़ती है और एक इम्पोर्टेड डीईएस की कीमत 5 हजार रुपये होती है। डीईएस में भारत में इस्तेमाल होने वाले करीब 95 प्रतिशत स्टेंट आते है।
आंकड़ों में यह भी संकेत मिलता है कि इम्पोर्टर्स और मैन्युफैक्चरर्स सबसे कम प्रॉफिट मार्जिन लेकर चलते हैं, जबकि डिस्ट्रिब्यूटर और हॉस्पिटल का मार्जिन 13 प्रतिशत से 200 प्रतिशत तक जाता है। यह बात की जगजाहिर है कि कई कंपनियां अपने डिस्ट्रिब्यूटरों के सहारे
बाजार को चलाती हैं।

ज्यादातर कंपनियां मार्केटिंग के नैतिक मूल्यों पर चलने का दावा करती हैं। जबकि गलत तरीके अपनाकर डॉक्टरों को रिश्वत और अस्पतालों को भारी कटौती कर सामान देना डीलर और डिस्ट्रिब्यूटरों का काम होता है। इसलिए डीलर्स को 13 से 196 प्रतिशत का जो मार्जिन पड़ता है, उसमें इसकी कीमत भी जुड़ी होती है। वहीं इम्पोर्टेड स्टेंट में ट्रांसफर प्राइजिंग का मुद्दा होता है।

अगर इम्पोर्ट भी वही कंपनी करती है तो वह जहां भी अपना प्रॉफिट दिखाना चाहती है उसी के मुताबिक कीमतें तय कर सकती है। वहीं पहले कीमतों पर लगाम को लेकर आवाज उठाने वाली हॉस्पिटल असोसिएशनों ने भी सुर बदल लिया है। उनका कहना है कि वह कीमतों पर लगाम के विरोध में नहीं हैं। उन्हें स्टेंट टेक्नॉलजी में हो रहे इनोवेशन और उनकी क्वॉलिटी को लेकर चिंता है। वहीं स्टेंट के जो बिल अस्पतालों को दिए जाते हैं वह अकसर नकली होते हैं। अस्पतालों को बेहद कम कीमतों में स्टेंट दिए जाते हैं और डिस्ट्रिब्यूटर उन्हें ज्यादा कीमत वाला बिल देते हैं ताकि वह आगे मरीजों को दिखा सकें।

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