प्रेग्नेंसी के दौरान शरीर में हल्के-फुल्के बदलाव या हल्की सूजन आना सामान्य माना जाता है, लेकिन अगर यह सूजन अचानक आपके चेहरे, हाथों और पैरों पर दिखने लगे, तो इसे अनदेखा करना खतरनाक हो सकता है। डॉक्टरों के मुताबिक, यह साधारण सूजन न होकर ‘प्री-एक्लेम्पसिया’ (Preeclampsia) का संकेत हो सकती है, जो गर्भावस्था में हाई ब्लड प्रेशर से जुड़ी एक गंभीर स्थिति है।
Birla Fertility and IVF सेंटर में स्पेशलिस्ट और सेंटर हेड डॉक्टर मुस्कान छाबरा ने जनसत्ता को बताया प्रेग्नेंसी में छोटी सी भी लापरवाही बड़ी परेशानी का कारण बन सकती है। अक्सर प्रेग्नेंसी के आखिरी महीनों में महिलाओं के हाथ-पैरों पर सूजन बढ़ने लगती है जो कुछ ज्यादा परेशानी की बात नहीं है लेकिन कुछ महिलाओं को ये परेशानी शुरुआती महीनों में ही होने लगती है। प्रेग्नेंसी के दौरान चेहरे से लेकर हाथ-पैरों और उंगलियों में बढ़ती सूजन नॉर्मल नहीं बल्कि प्री-क्लैम्प्सिया के हो सकते हैं लक्षण। आइए गायनेकोलॉजिस्ट से समझते हैं कि प्रेग्नेंसी में चेहरे और हाथ-पैर की सूजन कब चिंता का विषय बनती है, इसके मुख्य लक्षण क्या हैं और इससे बचाव के लिए किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है।
प्री-क्लैम्प्सिया क्या है?
प्री-क्लैम्प्सिया गर्भावस्था से जुड़ी एक गंभीर स्थिति है, जिसमें महिला का ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। इस स्थिति में सिस्टोलिक 140 mmHg या इससे अधिक और डायस्टोलिक 90 mmHg या इससे अधिक हो जाता है। यह सामान्य हाई ब्लड प्रेशर से अलग होता है, क्योंकि इसका संबंध गर्भावस्था के दौरान होने वाले हार्मोनल बदलावों, प्लेसेंटा और मां-बच्चे के बीच होने वाले ब्लड फ्लो से माना जाता है। यह समस्या आमतौर पर गर्भावस्था के दूसरे हिस्से में सामने आती है और अगर समय पर पहचान व इलाज न मिले तो मां और बच्चे दोनों के लिए गंभीर जटिलताएं पैदा कर सकती है।
सामान्य हाई बीपी और प्री-क्लैम्प्सिया में अंतर
अगर किसी महिला को गर्भवती होने से पहले से ही हाई ब्लड प्रेशर है या गर्भावस्था के शुरुआती चरण में, यानी 20 सप्ताह से पहले ही हाई बीपी पाया जाता है, तो इसे क्रोनिक हाइपरटेंशन की श्रेणी में रखा जा सकता है। वहीं, गर्भावस्था के दौरान बाद के चरणों में होने वाला हाई ब्लड प्रेशर प्रेग्नेंसी-इंड्यूस्ड हाइपरटेंशन या कुछ मामलों में प्री-क्लैम्प्सिया से जुड़ा हो सकता है। इसलिए गर्भावस्था से पहले की मेडिकल हिस्ट्री भी महत्वपूर्ण होती है।
गर्भावस्था में कब हो सकता है प्री-क्लैम्प्सिया?
डॉक्टर मुस्कान के मुताबिक, प्री-क्लैम्प्सिया आमतौर पर गर्भावस्था के दूसरे हिस्से में देखा जाता है। खासकर दूसरे और तीसरे ट्राइमेस्टर में इसके लक्षण सामने आ सकते हैं। यही वजह है कि गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच जरूरी होती है, ताकि ब्लड प्रेशर में होने वाले असामान्य बदलावों को समय रहते पहचाना जा सके।
प्री-क्लैम्प्सिया के शुरुआती लक्षण क्या हैं?
शुरुआत में हाथ-पैरों में सूजन, शरीर में पानी जमा होना और तेजी से वजन बढ़ना इसके संकेत हो सकते हैं। कई बार अंगूठी या चूड़ियां अचानक टाइट महसूस होने लगती हैं। ब्लड प्रेशर बढ़ना भी एक महत्वपूर्ण संकेत है। इसके अलावा यूरिन में प्रोटीन पाया जाना किडनी पर असर का संकेत हो सकता है। हालांकि, हर महिला में स्पष्ट लक्षण दिखाई दें, यह जरूरी नहीं है।
तेज सिरदर्द और धुंधला दिखाई देना कब खतरे का संकेत है?
तेज सिरदर्द, आंखों के सामने धुंधलापन या चक्कर आना गंभीर स्थिति के संकेत हो सकते हैं, खासकर जब ब्लड प्रेशर बहुत ज्यादा और अनियंत्रित हो जाए। गंभीर मामलों में दौरे यानी सीजर्स भी पड़ सकते हैं। ऐसी स्थिति मेडिकल इमरजेंसी हो सकती है और महिला को तत्काल इलाज की जरूरत होती है।
प्री-क्लैम्प्सिया की जांच कैसे होती है?
प्री-क्लैम्प्सिया की जांच के दौरान ब्लड प्रेशर की नियमित निगरानी के साथ यूरिन में प्रोटीन की जांच की जाती है। जरूरत पड़ने पर 24 घंटे के यूरिन में प्रोटीन की मात्रा भी जांची जा सकती है। इसके अलावा डॉक्टर लिवर फंक्शन टेस्ट और किडनी फंक्शन टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं। ब्लड प्रेशर की नियमित चार्टिंग भी की जाती है, ताकि उसमें होने वाले बदलावों पर नजर रखी जा सके।
हर गर्भवती महिला को क्यों सतर्क रहना चाहिए?
प्री-क्लैम्प्सिया किसी भी गर्भवती महिला को हो सकता है। इसलिए केवल हाई रिस्क प्रेग्नेंसी वाली महिलाओं को ही नहीं, बल्कि हर गर्भवती महिला को नियमित जांच करानी चाहिए। हर एंटीनेटल विजिट पर वजन और ब्लड प्रेशर की जांच महत्वपूर्ण है। नियमित विजिट मिस करने पर शरीर में हो रहे असामान्य बदलावों का समय पर पता नहीं चल पाता।
प्री-क्लैम्प्सिया से बचाव के लिए क्या करें?
गर्भावस्था की शुरुआत में ही डॉक्टर से एंटीनेटल बुकिंग कराना जरूरी है। शुरुआती जांच, ब्लड टेस्ट और अल्ट्रासाउंड से महिला और भ्रूण की स्थिति का आकलन किया जा सकता है। इसके बाद डॉक्टर द्वारा बताए गए सभी फॉलो-अप और टेस्ट समय पर कराने चाहिए। अगर ब्लड प्रेशर बढ़ रहा हो तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार डाइट में नमक की मात्रा पर ध्यान देना चाहिए और अचार, पापड़ व ऊपर से अतिरिक्त नमक डालने जैसी आदतों को सीमित करना चाहिए।
हाई रिस्क महिलाओं के लिए स्क्रीनिंग क्यों जरूरी है?
कुछ महिलाओं में प्री-क्लैम्प्सिया का खतरा अन्य महिलाओं की तुलना में ज्यादा हो सकता है। डॉक्टर के अनुसार कुछ स्क्रीनिंग टेस्ट, जैसे डुअल मार्कर के साथ की जाने वाली प्री-क्लैम्प्सिया स्क्रीनिंग, डॉक्टर को जोखिम का आकलन करने में मदद कर सकती है। जिन महिलाओं को पिछली गर्भावस्था में प्री-क्लैम्प्सिया या प्रेग्नेंसी-इंड्यूस्ड हाइपरटेंशन की समस्या रही हो, उनमें अगली गर्भावस्था में भी जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए पिछली प्रेग्नेंसी की पूरी मेडिकल हिस्ट्री डॉक्टर को बताना जरूरी है।
प्री-क्लैम्प्सिया का बच्चे पर क्या असर पड़ता है?
प्री-क्लैम्प्सिया में बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर प्लेसेंटा के जरिए बच्चे तक पहुंचने वाले ब्लड फ्लो को प्रभावित कर सकता है। इससे बच्चे को पर्याप्त पोषण और ऑक्सीजन मिलने में कमी हो सकती है और उसकी ग्रोथ प्रभावित हो सकती है। गंभीर और लंबे समय तक अनियंत्रित मामलों में बच्चे की ग्रोथ रिस्ट्रिक्शन जैसी समस्या हो सकती है। बहुत गंभीर स्थिति में गर्भ में बच्चे की जान को भी खतरा हो सकता है।
कब तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?
अगर गर्भवती महिला का ब्लड प्रेशर बढ़ रहा है और इसके साथ तेज सिरदर्द, आंखों से धुंधला दिखाई देना, चक्कर, अचानक ज्यादा सूजन या दौरे जैसे लक्षण दिखाई दें, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में तुरंत मेडिकल जांच और इलाज की जरूरत हो सकती है। प्री-क्लैम्प्सिया में समय पर पहचान और उचित चिकित्सा मां और बच्चे दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से है। गर्भावस्था के दौरान हाई ब्लड प्रेशर, प्री-क्लैम्प्सिया या इससे जुड़े किसी भी लक्षण को नजरअंदाज न करें। किसी भी जांच, दवा या उपचार के लिए अपने स्त्री रोग विशेषज्ञ की सलाह लें।
