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प्रतिभा शुक्ल की रिपोर्ट: लापरवाही और उपेक्षा का शिकार सफदरजंग का रेडियो थेरेपी विभाग

सफदरजंग अस्पताल का रेडियो थेरेपी विभाग सालों से लापरवाही और उपेक्षा का शिकार है। इस विभाग को लेकर समय रहते उचित कदम उठाए जाते तो मरीजों का इलाज अधर में नहीं लटकता।

Author नई दिल्ली | July 24, 2016 3:48 AM
पिछले साल नवंबर में विभाग पर आंशिक बंदी लागू करने का मामला संसद में उठने पर सरकार ने कहा था कि सुरक्षा मानकों पर खरा नहीं उतरने पर भी यहां केवल नए मरीजों को भर्ती पर रोक लगती है।

सफदरजंग अस्पताल का रेडियो थेरेपी विभाग सालों से लापरवाही और उपेक्षा का शिकार है। इस विभाग को लेकर समय रहते उचित कदम उठाए जाते तो मरीजों का इलाज अधर में नहीं लटकता। पिछले साल नवंबर में विभाग पर आंशिक बंदी लागू करने का मामला संसद में उठने पर सरकार ने कहा था कि सुरक्षा मानकों पर खरा नहीं उतरने पर भी यहां केवल नए मरीजों को भर्ती पर रोक लगती है, इलाज करा रहे मरीजों की थेरेपी तब भी नहीं रोकी जाती, लेकिन इस बार इलाज पूरी तरह बंद कर दिया गया। कई साल से विभाग के चार रेडिएशन सेफ्टी आॅफिसर (आरएसओ) के पद भरे नहीं जा सके, जिसके कारण वे पद खारिज हो गए। हालांकि चिकित्सा अधीक्षक, विभाग के अध्यक्ष व डॉक्टर इसके जल्दी शुरू होने की उम्मीद जता रहे हैं।

इस विभाग में राजनीति, आपसी लड़ाई व नाकामियों का बोलबाला है। नतीजा विभाग के सील होने के रूप में सामने है। सैकड़ों मरीजों की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। सरकार अगर समय रहते चेत जाती तो मरीजों को इलाज अधूरा छोड़ इधर-उधर भटकना नहीं पड़ता। अस्पताल में दस संकाय सदस्यों के बावजूद रेडियो थेरेपी विभाग लंबे समय से सही से काम नहीं कर पा रहा है। यहां रेडियो थेरेपी की तीन मशीनें थीं जो कि लंबे समय से खराब थीं लिहाजा एक से ही किसी तरह काम चलाया जा रहा था। करीब दो साल पहले मशीनों की मरम्मत हुई थी, लेकिन वह भी हाल के दिनों में काम करने की सूरत में नहीं थीं। इसके अलावा विभाग में विकिरण मापक उपकरण व विकिरण निगरानी उपकरण सहित तमाम जरूरी उपकरणों की कमी है।

विभाग को चलाने में फिजिसिस्ट की भी अहम भूमिका है। आरएसओ की भूमिका भी यही निभाते हैं। आरएसओ के चार पद आबंटित किए गए थे, लेकिन भर्ती केवल एक पद पर हुई थी। जो मौजूदा आरएसओ है भी, उन पर सही से काम न करने का आरोप है। इनके खिलाफ मंत्रालय तक में शिकायत पहुंची है, जबकि आरएसओ ने पूर्व विभागाध्यक्ष के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई है। बाकी तीन पद सालों से खाली पड़े थे। आरएसओ की संख्या कम होने की वजह से ही पिछले साल नवंबर में परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (एईआरबी) ने थेरेपी पर रोक लगाई थी। इस मामले में संसद में सवाल उठने पर सरकार ने लिखित जवाब में कहा था कि एईआरबी की ओर से मंजूर आरएसओ नहीं होने की वजह से विभाग को बंद कर दिया गया था, लेकिन सरकार ने इन पदों को मंजूर कर दिया है। इसके बाद 11 दिसंबर 2015 को विभाग फिर से चालू कर दिया गया, लेकिन संपदा विभाग ने यह कह कर फाइल लौटा दी है कि तीन साल तक भर्ती न होने की वजह से ये तीनों पद खारिज हो चुके हैं।

सरकार ने संसद में यह भी कहा कि जब कभी एईआरबी सुरक्षा शर्तों में कमी की वजह से इस तरह की रोक लगाता है तो नए मरीज भर्ती करने पर रोक लगाता है, जबकि पुराने मरीजों की थेरेपी जारी रहती है। इलाज के लिहाज से यह जरूरी होता है क्योंकि इनके रेडिएशन की मात्रा वगैरह तैयार की जा चुकी होती है। इस बार विभाग सील करने में सरकार के उस बयान की भी अनदेखी की गई है।

अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ एके राय ने कहा कि हमने तदर्थ भर्ती की प्रकिया शुरू की है। नई मशीनें भी आने वाली हैं। विभागाध्यक्ष जे. कौर ने कहा कि हमने आरएसओ के चार पदों की भर्ती अपने स्तर पर पूरी कर ली है और अंतिम मंजूरी के लिए फाइल मंत्रालय के पास भेज दी गई है। इसके अलावा दो मशीनों क ी खरीद के लिए मंजूरी मिल चुकी है। जल्द ही विभाग शुरू हो सकता है, लेकिन यह कब तक होगा यह बताने की स्थिति में हम नही हैं। जबकि सूत्रों की माने तो उपकरणों व मशीन की खरीद की निविदा जारी तो कर दी गई है, लेकिन उसके लिए समुचित प्रक्रिया नहीं अपनाई गई है।

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