दिल्ली में रहने वाले 38 वर्षीय अयांश एक कॉर्पोरेट कंपनी में जॉब करते हैं। कुछ साल पहले वह एक गंभीर सड़क हादसे का शिकार हुए थे। उस हादसे में उन्होंने अपनी करीबी दोस्त को खो दिया। हादसे के बाद से अयांश की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। रात होते ही उन्हें वही एक्सीडेंट बार-बार याद आता है। तेज ब्रेक की आवाज सुनते ही उनका दिल जोर से धड़कने लगता है। उन्हें डरावने सपने आते हैं, जिसमें वही हादसा दोहराया जाता है।

अयांश ने धीरे-धीरे गाड़ी में बैठना बंद कर दिया, बाहर निकलने से बचने लगे और लोगों से दूरी बनाने लगे। परिवार को समझ नहीं आया कि वह ऐसा क्यों कर रहे हैं। डॉक्टर से जांच कराने पर पता चला कि अयांश Post-Traumatic Stress Disorder (PTSD) से जूझ रहे हैं। ये एक ऐसी मानसिक स्थिति है जिसमें दिमाग उस दर्दनाक घटना से बाहर नहीं निकल पाता। अतीत की बुरी यादों में बार-बार उलझे रहना या बीती घटनाओं को लगातार दोहराना सिर्फ एक आदत नहीं, बल्कि हमारे मस्तिष्क की जटिल प्रतिक्रिया का हिस्सा हो सकता है।

जब कोई व्यक्ति PTSD या गहरे मानसिक सदमे से गुजर रहा होता है, तो दिमाग का अलार्म सिस्टम जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो जाता है। इस स्थिति में दिमाग का एमिग्डाला (Amygdala) खतरे को बार-बार महसूस करता है, जबकि हिप्पोकैम्पस (Hippocampus) और प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (Prefrontal Cortex) उस याद को नियंत्रित करने में पूरी तरह सक्षम नहीं हो पाते। ऐसी स्थिति में व्यक्ति खुद को एक तरह के मानसिक सुरक्षा घेरे में फंसा हुआ महसूस करता है और जीवन में आगे बढ़ने में कठिनाई होती है। यादों से जुड़े इस दिमागी सिस्टम को विस्तृत तरीके से जानते हैं।

दिमागी सिस्टम जो पुराने दुख से बाहर नहीं आने देता?

एमिग्डाला (Amygdala) दिमाग का अलार्म सिस्टम है जो दिमाग के अंदर बादाम के आकार का एक छोटा सा हिस्सा है, जिसका काम खतरों को पहचानना है। जब आपको कोई सदमा (Trauma) लगता है, तो एमिग्डाला ‘हाइपर-एक्टिव’ हो जाता है। यह हर वक्त खतरे का सिग्नल भेजता रहता है, भले ही आप सुरक्षित हों। इसकी वजह से आप हर समय घबराहट (Anxiety) महसूस करते हैं और आपका शरीर ‘फाइट या फ्लाइट मोड में रहता है। यह आपको वर्तमान का आनंद लेने से रोकता है क्योंकि इसे लगता है कि बीता हुआ बुरा वक्त फिर से लौट सकता है।

हिप्पोकैम्पस (Hippocampus) यादों का ‘लाइब्रेरी मैनेजर है जिसका काम यादों को समय के अनुसार व्यवस्थित करना और उन्हें गुजरे हुए कल के फोल्डर में डालना है।

भारी तनाव या PTSD की स्थिति में हिप्पोकैम्पस सिकुड़ सकता है या ठीक से काम करना बंद कर देता है। इसकी वजह से हमारा दिमाग ये अंतर नहीं कर पाता कि कौन सी घटना बीत चुकी है और कौन सी अभी हो रही है।

इसकी वजह से पुरानी बातें ऐसी महसूस होती हैं जैसे वो इसी वक्त आपके साथ घटी हो। इसे फ्लैश बैक कहते हैं जिसकी वजह से हम पुराने मातम से उबर नहीं पाते हैं।

प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (Prefrontal Cortex) दिमाग का वो हिस्सा है जो माथे के बिल्कुल ठीक पीछे होता है। इसे लॉजिकल बॉस भी कहा जाता है जिसका काम तर्क करना, योजना बनाना और भावनाओं को नियंत्रित करना है।

जब एमिग्डाला बहुत शोर मचाता है, तो प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स की आवाज दब जाती है। यानी आपके दिमाग का ‘लॉजिकल हिस्सा’ काम करना बंद कर देता है।

आप जानते हैं कि पुरानी यादों को भूलना बेहतर है लेकिन आप अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाते। आपकी निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो जाती है और आप खुद को असहाय महसूस करने लगते हैं।

PTSD पर मनोचिकित्सक क्या कहते हैं?
 
फोर्टिस हेल्थकेयर में अदायु माइंडफुलनेस हॉस्पिटल में सलाहकार मनोचिकित्सक डॉ. नेहा अग्रवाल ने बताया PTSD एक ऐसा ट्रामा होता है जिसे व्यक्ति ने खुद झेला हो, अपनी आंखों से देखा हो या किसी करीबी के साथ होते देखा हो। इस घटना के बाद भी लंबे समय तक उसका असर दिमाग और व्यवहार पर बना रहता है।

PTSD पीड़ित व्यक्ति को क्या महसूस होता है ?

पीटीएसडी से पीड़ित व्यक्ति को बार-बार उस ट्रॉमा से जुड़े ख्याल आते हैं। अचानक फ्लैशबैक होते हैं, जैसे वही घटना दोबारा हो रही हो। इससे कंसंट्रेशन और मानसिक स्थिति दोनों प्रभावित होती हैं। इस स्थिति में लोग कुछ चीजों से बचने लगते हैं उनमें अवॉइडेंस बिहेवियर आने लगता है। व्यक्ति उन जगहों, लोगों या स्थितियों से बचने लगता है जो उसे उस ट्रॉमा की याद दिलाती हैं। इससे उसे थोड़ी राहत मिलती है, लेकिन लंबे समय में वह सामाजिक रूप से अलग-थलग पड़ सकता है।

 PTSD में बॉडी और ब्रेन में कौन कौन से लक्षण दिखते हैं ?

 पीटीएसडी को हाइपर अराउजल कहते हैं। व्यक्ति छोटी-छोटी आवाजों से चौंक जाता है, उसे नींद नहीं आती या बार-बार नींद टूटती है। वह हर समय सतर्क और डरा हुआ महसूस करता है। इस स्थिति को इमोशनल नम्बिंग कहा जाता है। इसमें व्यक्ति को कुछ महसूस ही नहीं होता। वह परिवार, दोस्तों और अपनी पसंदीदा चीजों से भी कटा-कटा रहने लगता है और खुद को डिस्कनेक्ट महसूस करता है।

PTSD का असर रोजमर्रा की जिंदगी पर कैसे पड़ता है?

इस मानसिक रोग में व्यक्ति की डेली लाइफ बुरी तरह प्रभावित होती है। वह काम, पढ़ाई या सामान्य दिनचर्या में ठीक से फोकस नहीं कर पाता। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास कम होने लगता है और जीवन की गुणवत्ता गिरने लगती है।

PTSD का असर व्यक्ति के मूड और सोच पर कैसे पड़ता है?

PTSD से पीड़ित व्यक्ति का मूड लगातार नेगेटिव रहने लगता है। वह खुद को दोष देने लगता है, गिल्ट महसूस करता है और उसमें उदासी बनी रहती है। वो इमोशनल स्ट्रेस में रहता है।

PTSD का इलाज क्या है?

PTSD का इलाज दवाइयों और साइकोथेरेपी (काउंसलिंग) के जरिए किया जाता है। खासतौर पर ‘ट्रॉमा-इनफॉर्म्ड साइकोलॉजिस्ट’ या काउंसलर इस स्थिति में मदद करते हैं। कई मामलों में दोनों (मेडिकेशन + थेरेपी) की जरूरत होती है। अगर लक्षण मरीज की नौकरी,पढ़ाई या रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगें तो तुरंत किसी मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट से सलाह लेनी चाहिए और इन तरीकों से इलाज कराना चाहिए।

  • साइकोथेरेपी (CBT, ट्रॉमा थेरेपी)
  • जरूरत पड़ने पर दवाइयां
  • मेडिटेशन और ब्रीदिंग एक्सरसाइज
  • ट्रिगर को धीरे-धीरे फेस करना
  • फैमिली सपोर्ट
  • इलाज का मुख्य उद्देश्य मरीज की ‘क्वालिटी ऑफ लाइफ’ को बेहतर बनाना होता है। हालांकि, अगर ट्रामा पुराना है तो इलाज थोड़ा लंबा चल सकता है।
  • परिवार और समाज की जागरूकता बहुत जरूरी है। कई बार कुछ ट्रामा को समाज गंभीरता से नहीं लेता, लेकिन वह व्यक्ति के लिए बहुत बड़ा सदमा हो सकता है। ऐसे में सपोर्ट, समझ और सही समय पर मदद मिलना बेहद जरूरी होता है।

समाज और परिवार की इसमें क्या भूमिका होती है?

मानसिक घाव दिखाई नहीं देते, लेकिन उनका दर्द बेहद गहरा और लंबे समय तक रहने वाला हो सकता है। अगर पुरानी यादें डर और तकलीफ से जुड़ी हैं, तो उन्हें बार-बार जीने के बजाय धीरे-धीरे स्वीकार कर आगे बढ़ना ही बेहतर होता है। अयांश की कहानी आपको हमने बताई लेकिन ये बताना भी जरूरी है कि अब अयांश धीरे-धीरे थेरेपी और परिवार की सपोर्ट से अपनी जिंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं। भले ही जख्म गहरे हों, लेकिन सही मदद और समझ के साथ उनसे बाहर निकालना मुमकिन है।

डिस्क्लेमर:

यह लेख मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता बढ़ाने के लिए है। यह लेख किसी तरह के उपचार या चिकित्सा के लिए सुझाव नहीं देता। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी किसी समस्या के लिए किसी प्रमाणिक मनोचिकित्सक (Psychiatrist) की सलाह लें। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी किसी भी समस्या के लिए आप राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन ‘किरण’ (KIRAN) – 1800-599-0019 पर सम्पर्क कर सकते हैं।