महाराष्ट्र के बारामती की रहने वाली प्राजक्ता (बदला हुआ नाम) एक गृहिणी थीं जिन्होंने 38 साल की उम्र में पहली बार अपने हाथ में हल्का कंपन महसूस किया जिसे काफी समय तक उन्होंने नजरअंदाज कर दिया था। लेकिन यह कंपन धीरे-धीरे बढ़ता गया और उनकी जिंदगी बदलने लगी। प्राजक्ता ने बातचीत में बताया शुरुआत उनके बाएं हाथ से हुई। शुरुआत में उन्हें ये सिर्फ थकान लगी, लेकिन धीरे-धीरे शरीर में अकड़न आने लगी और काम करने की रफ्तार धीमी हो गई तो वो परेशान होने लगीं। आज प्राजक्ता की उम्र 49 साल हैं और वो पिछले दस सालों से पार्किंसन डिजीज से जूझ रही हैं।
ग्लेनीगल्स हॉस्पिटल में पार्किंसन एवं डीप ब्रेन स्टिमुलेशन प्रोग्राम में न्यूरोलॉजी में डायरेक्टर और हेड, डॉ. पंकज अग्रवाल ने बताया पार्किंगसन एक ऐसी प्रोग्रेसिव न्यूरोलॉजिकल बीमारी है जो शरीर के साथ-साथ व्यक्ति की पहचान और रिश्तों को भी प्रभावित करती है। आइए डॉक्टर से जानते हैं कि ये क्या परेशानी है और इसके बॉडी में कौन-कौन से लक्षण दिखते हैं और इससे कैसे बचाव किया जा सकता है।
डिस्क्लेमर : यह जानकारी केवल जागरूकता और सामान्य मार्गदर्शन के उद्देश्य से दी गई है। इसे किसी भी तरह से डॉक्टर की सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
क्या है पार्किंसन रोग?
पार्किंसन तब होता है जब दिमाग में डोपामाइन बनाने वाली लगभग आधी नर्व सेल्स खत्म या क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। इसके शुरुआती लक्षणों में हाथ कांपना, जकड़न और मूवमेंट धीमा होना शामिल है। आमतौर पर यह बीमारी 60 साल के बाद होती है, लेकिन प्राजक्ता का मामला अलग था। उन्हें 30 के दशक में ही यह बीमारी हो गई, जिसे डॉक्टर यंग-ऑनसेट पार्किंसन कहते हैं।
शुरुआती इलाज और ‘हनीमून फेज’
डायग्नोसिस के बाद शुरुआती सालों में दवाओं से काफी राहत मिली। डॉक्टर इस समय को हनीमून फेज कहते हैं, जब मरीज लगभग सामान्य जीवन जी सकता है। लेकिन समय के साथ दवाओं का असर कम होने लगता है। प्राजक्ता के साथ भी ऐसा ही हुआ। कभी उसका शरीर अचानक फ्रीज हो जाता, तो कभी दवाओं के साइड इफेक्ट से अनियंत्रित हरकतें (डिस्काइनेसिया) होने लगता था।
जब सर्जरी बनी सहारा
जब दवाएं असर करना बंद करने लगीं, तब डॉक्टरों ने डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (DBS) सर्जरी कराने की सलाह दी। यह एक एडवांस प्रक्रिया है, जिसमें दिमाग के खास हिस्सों में इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं और उन्हें एक डिवाइस से जोड़ा जाता है, जो पेसमेकर की तरह काम करता है। यह बीमारी को खत्म नहीं करता, लेकिन लक्षणों को काफी हद तक कंट्रोल कर सकता है। भारत में इस सर्जरी का खर्च करीब 12 से 20 लाख रुपये तक हो सकता है।
सर्जरी के बाद जिंदगी में हुए ये बदलाव
सर्जरी के कुछ हफ्तों बाद ही प्राजक्ता ने सुधार महसूस किया। उनके हाथों का कंपन और जकड़न कम हो गई और उनकी दवाओं का डोज भी कम हो गया। अब वो नियमित फॉलो-अप और प्रोग्रामिंग के जरिए अपने इलाज को मैनेज कर रही हैं।
कैसे मैनेज करें पार्किंसन?
- पार्किंसन को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन सही देखभाल से इसे काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है। पार्किंसन के इलाज में दवाएं अहम हैं,इसकी आम दवा Levodopa है, जो दिमाग में डोपामिन की कमी को पूरा करने में मदद करती है। डॉक्टर की सलाह के मुताबिक दवा का समय पर सही डोज़ लेना जरूरी है।
- नियमित एक्सरसाइज जैसे रोज़ाना वॉक, योग या स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज पार्किंसन मैनेजमेंट का अहम हिस्सा है। बॉडी एक्टिविटी शरीर को बैलेंस और लचीलापन बनाए रखने में मदद करती है।
- हेल्दी डाइट का सेवन पार्किंसन का इलाज करने में असरदार साबित होता है। हाई-फाइबर डाइट जैसे फल, सब्जियां, साबुत अनाज का सेवन कब्ज से बचाव करता है और पार्किंसन का इलाज करता है। डाइट में प्रोटीन से भरपूर फूड्स को शामिल करें। पर्याप्त पानी पिएं इस बीमारी से बचाव होगा।
- पार्किंसन में नींद से जुड़ी समस्याएं आम हैं। इस परेशानी से बचाव करने के लिए अच्छी नींद लेना भी जरूरी है। सोने-जागने का समय तय करें, सोने से पहले स्क्रीन टाइम कम करें।
- लंबे समय तक बीमारी रहने से तनाव और डिप्रेशन हो सकता है, इसलिए तनाव को कंट्रोल करने के लिए आप मेडिटेशन, काउंसलिंग या सपोर्ट ग्रुप की मदद ले सकते हैं।
- एडवांस ट्रीटमेंट भी करा सकते हैं। जब दवाएं असर कम करने लगें तो आप Deep Brain Stimulation (DBS) जैसी सर्जरी विकल्प को चुन सकते हैं। यह दिमाग में इलेक्ट्रिकल सिग्नल के जरिए लक्षणों को कंट्रोल करती है। हर मरीज के लिए जरूरी नहीं, डॉक्टर सलाह के अनुसार सर्जरी का निर्णय लिया जाता है।
डिस्क्लेमर : यह जानकारी केवल जागरूकता और सामान्य मार्गदर्शन के उद्देश्य से दी गई है। इसे किसी भी तरह से डॉक्टर की सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। पार्किंसन या किसी भी अन्य बीमारी के लिए दवाएं, थेरेपी या सर्जरी से जुड़ा कोई भी निर्णय लेने से पहले योग्य न्यूरोलॉजिस्ट या विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें। बिना चिकित्सकीय सलाह के दवा शुरू या बंद न करें।
