जानलेवा इबोला वायरस (Ebola Virus) के खिलाफ वैश्विक जंग में एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि सामने आई है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा विकसित और पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) द्वारा तैयार की गई नई इबोला वैक्सीन (ChAdOx1 BDBV) का इंसानों पर पहला क्लिनिकल परीक्षण शुरू हो गया है। इस ट्रायल के लिए सीरम इंस्टीट्यूट ने वैक्सीन की 6.2 लाख से अधिक डोज तैयार की हैं, जिनमें से 4,000 जांच खुराक (Investigational Doses) फेज-1 ट्रायल के लिए उपलब्ध कराई गई हैं।
इबोला के बुंडिबुग्यो (Bundibugyo) स्ट्रेन को निशाना बनाने वाली इस वैक्सीन का पहला मानव परीक्षण ऑक्सफोर्ड (यूके) में 18 से 55 वर्ष के 50 स्वस्थ स्वयंसेवकों पर किया जाएगा। यदि यह परीक्षण सफल रहता है, तो भविष्य में इस खतरनाक वायरस से बचाव के लिए एक प्रभावी वैक्सीन विकसित करने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। अफ्रीका में जारी इबोला वायरस के प्रकोप के बीच ये एक बड़ी वैज्ञानिक सफलता मानी जा रही है। खास बात यह है कि यह उपलब्धि इबोला प्रकोप घोषित होने के केवल 57 दिनों के अंदर हासिल की गई है।
50 स्वस्थ वयस्कों पर होगा पहला ट्रायल
महामारी की तैयारी के लिए काम करने वाले संगठन Coalition for Epidemic Preparedness Innovations (CEPI) के सहयोग से यह ट्रायल ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड में किया जाएगा। इस ट्रायल में 18 से 55 साल के सिर्फ 50 स्वस्थ स्वयंसेवकों को शामिल किया जाएगा। इस रिसर्च का उद्देश्य यह जानना है कि वैक्सीन कितना सुरक्षित है और क्या यह शरीर में वायरस के खिलाफ मजबूत इम्यून रिस्पांस विकसित करता है। स्वयंसेवकों की भर्ती शुरू हो चुकी है और नियामक मंजूरी मिलने के बाद अगले कुछ हफ्तों में टीकाकरण शुरू किया जाएगा।
क्यों खास है ये वैक्सीन
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा इबोला प्रकोप को पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी घोषित किए जाने के केवल 57 दिनों के अंदर किसी वैक्सीन का मानव परीक्षण तक पहुंचना हाल के वर्षों में उभरती संक्रामक बीमारियों के खिलाफ सबसे तेज वैक्सीन विकास कार्यक्रमों में से एक माना जा रहा है। यदि यह वैक्सीन सफल रहती है, तो भविष्य में बुंडिबुग्यो इबोला वायरस के प्रकोप को कंट्रोल करने में बड़ी भूमिका निभा सकती है।
सीरम इंस्टीट्यूट ने रिकॉर्ड समय में तैयार किए 6.2 लाख डोज
भारत के सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) ने इस वैक्सीन के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पुणे स्थित कंपनी ने महज दो सप्ताह में इस वैक्सीन की 6.2 लाख (620,000) से अधिक डोज तैयार कर स्टॉक कर ली हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर इमरजेंसी में इसका इस्तेमाल किया जा सके। इसके अलावा फेज-1 ट्रायल के लिए 4,000 डोज भी उपलब्ध कराई गई हैं। सीरम इंस्टीट्यूट के सीईओ अदार पूनावाला ने बताया कि किसी भी महामारी के दौरान तेजी, तैयारी और वैश्विक सहयोग बेहद जरूरी होता है। उन्होंने कहा कि इस प्रयास में CEPI, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और अन्य साझेदारों के साथ जुड़कर कंपनी को गर्व है।
वैक्सीन बनाने में ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका कोविड वैक्सीन वाली तकनीक का हुआ इस्तेमाल
यह वैक्सीन ऑक्सफोर्ड वैक्सीन ग्रुप और पैंडेमिक साइंसेज इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने विकसित की है। इसमें वही Chimpanzee Adenovirus (ChAdOx) Viral Vector Platform तकनीक इस्तेमाल की गई है, जिस पर ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की कोविड-19 वैक्सीन बनाई गई थी। माना जाता है कि इस तकनीक से बनी कोविड वैक्सीन ने दुनिया भर में लाखों लोगों की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई थी।
इबोला के बढ़ते मामलों के बीच बढ़ी उम्मीद
ऑक्सफोर्ड वैक्सीन ग्रुप की प्रमुख वैज्ञानिक प्रोफेसर टेरेसा लैम्बे ने कहा कि बुंडिबुग्यो इबोला वायरस का मौजूदा प्रकोप प्रभावित समुदायों के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है। ऐसे में प्रभावी वैक्सीन और उपचार की तत्काल जरूरत है। वहीं CEPI की प्रिपेयर्डनेस एंड रिस्पॉन्स डायरेक्टर डॉ. निकोल लुरी ने कहा कि मौजूदा प्रकोप इबोला के इतिहास का तीसरा सबसे बड़ा प्रकोप बन चुका है और मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। उनका कहना है कि यह वैक्सीन सुरक्षित और प्रभावी साबित होती है तो इससे हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती है।
युगांडा में भी होंगे क्लीनिकल ट्रायल
CEPI, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और सीरम इंस्टीट्यूट ने प्रकोप घोषित होने के महज दो सप्ताह बाद 8.6 मिलियन डॉलर की साझेदारी शुरू की थी, ताकि वैक्सीन को तेजी से मानव परीक्षण तक पहुंचाया जा सके। नियामकीय मंजूरी मिलने के बाद युगांडा में भी इस वैक्सीन के अतिरिक्त क्लीनिकल ट्रायल शुरू करने की तैयारी की जा रही है।
आपको बता दें कि इबोला वायरस (Ebola Virus) एक बेहद खतरनाक और जानलेवा वायरस है, जो संक्रमित व्यक्ति या जानवर के खून और शारीरिक तरल पदार्थों के संपर्क से फैलता है। इससे तेज बुखार, कमजोरी, उल्टी, दस्त और गंभीर मामलों में शरीर के अंदर और बाहर रक्तस्राव हो सकता है। समय पर इलाज न मिलने पर यह जानलेवा साबित हो सकता है। इबोला के अधिकतर प्रकोप अफ्रीकी देशों में देखे गए हैं।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी और वैज्ञानिक अनुसंधान के अपडेट साझा करने के उद्देश्य से लिखा गया है। वर्तमान में यह इबोला वैक्सीन (ChAdO x1 BDBV) अपने पहले चरण के क्लिनिकल ट्रायल (Phase-1 Human Trial) के दौर में है और यह अभी आम जनता के उपयोग या व्यावसायिक बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं है। किसी भी बीमारी के उपचार, वैक्सीन या स्वास्थ्य संबंधी निर्णय के लिए हमेशा प्रमाणित चिकित्सा विशेषज्ञों या विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) जैसे आधिकारिक स्वास्थ्य निकायों के निर्देशों का ही पालन करें।
