एलर्जी राइनाइटिस और अस्थमा ऐसी सांस से जुड़ी बीमारियां हैं जो दुनियाभर में लाखों लोगों को प्रभावित कर रही हैं। ये बीमारियां खराब लाइफस्टाइल,बढ़ता प्रदूषण, धूल-मिट्टी, पराग कण,फंगस और एलर्जेंस के संपर्क की वजह से पनपती हैं। एलर्जिक राइनाइटिस में मरीज में जो लक्षण दिखते हैं उसमें बार-बार छींक आना, नाक में खुजली, नाक बहना और बंद होना शामिल है। ये बीमारी कमजोर इम्यूनिटी का परिणाम है। जबकि अस्थमा में सांस लेने में तकलीफ, सीने में जकड़न, खांसी और घरघराहट की शिकायत रहती है। ये दोनों बीमारियां न सिर्फ शारीरिक असहजता पैदा करती हैं, बल्कि नींद, कामकाज और रोजमर्रा की जिंदगी पर भी असर डालती हैं।
पुर्तगाल में की गई एक रिसर्च के मुताबिक ये दोनों बीमारियां नाक में मौजूद अलग-अलग प्रकार के फंगस से जुड़ी हो सकती हैं। ये रिसर्च इन बीमारियों का इलाज करने के लिए नए रास्ते खोल सकती है।
यूनिवर्सिटी ऑफ पोर्टो के डॉ. लुइस डेलगाडो के नेतृत्व में की गई ये रिसर्च Frontiers in Microbiology जर्नल में प्रकाशित हुई है। इस रिसर्च को करने के लिए 214 लोगों की नाक में मौजूद फंगल कम्युनिटी का विश्लेषण किया गया था, जिनमें 155 लोग थे जिन्हें एलर्जिक राइनाइटिस और अस्थमा दोनों था। जबकि 47 लोग ऐसे थे जिन्हें सिर्फ एलर्जिक राइनाइटिस था, 12 लोग जिन्हें सिर्फ अस्थमा था। इस रिसर्च में 125 ऐसे लोग भी शामिल थे जो पूरी तरह हेल्दी थे, जिन्हें कंट्रोल ग्रुप के तौर पर शामिल किया गया था।
रिसर्च में नाक के स्वैब सैंपल की टेस्ट रिपोर्ट
नाक के स्वैब सैंपल की जांच में शोधकर्ताओं ने पाया एलर्जिक राइनाइटिस से पीड़ित लोगों की नाक में हेल्दी लोगों की तुलना में फंगल प्रजातियों की विविधता ज्यादा पाई गई। शोधकर्ताओं ने पाया जिन मरीजों को एलर्जिक राइनाइटिस और अस्थमा दोनों थे, उनमें फंगस आपस में ज्यादा जुड़े हुए पाए गए। इससे संकेत मिलता है कि फंगस नाक के इम्यून माहौल को प्रभावित कर सकता हैं। आपको बता दें कि रिसर्च में DNA और RNA के निर्माण से जुड़ी तीन मेटाबोलिक प्रक्रियाएं श्वसन रोगों से पीड़ित लोगों में ज्यादा सक्रिय पाई गईं, जो भविष्य में नए इलाज के विकल्प खोल सकती हैं।
नाक का माइक्रोबायोम आखिर होता क्या है?
सीके बिरला हॉस्पिटल की ENT विभाग की लीड कंसल्टेंट डॉ. दीप्ति सिन्हा के मुताबिक नाक हमारे शरीर में जाने वाली हवा का पहला रास्ता है, जहां फंगस, बैक्टीरिया और वायरस जैसे कई सूक्ष्म जीवों का एक पूरा इकोसिस्टम मौजूद रहता है। नाक में मौजूद कोई माइक्रो ऑर्गेनिज्म बीमारी पैदा करेंगे या नहीं ये व्यक्ति की इम्युनिटी, उसकी सेहत और उस जीव की प्रकृति पर निर्भर करता है।
एक्सपर्ट ने बताया नाक का माइक्रोबायोम जगह, साफ-सफाई और एलर्जेंस के संपर्क के आधार पर अलग-अलग हो सकता है। इसलिए पुर्तगाल की ये रिसर्च पूरी दुनिया पर लागू हो यह जरूरी नहीं। जब नाक के माइक्रोबायोम में असंतुलन पैदा होता है, जिसे डिस्बायोसिस कहा जाता है, तो एलर्जी और श्वसन संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।
हालांकि ये रिसर्च एलर्जिक राइनाइटिस और अस्थमा को समझने की दिशा में एक अहम कदम है, लेकिन डॉ. सिन्हा का कहना है कि ये फंगल कम्युनिटी सीधे तौर पर इन बीमारियों को बढ़ाती हैं या नहीं, ये जानने के लिए अभी और रिसर्च की जरूरत है। जैसे-जैसे नाक के माइक्रोबायोम को लेकर हमारी समझ बढ़ रही है, वैसे-वैसे ये साफ होता जा रहा है कि नाक में माइक्रोबियल बैलेंस बनाए रखना एलर्जिक राइनाइटिस और अस्थमा जैसी बीमारियों को कंट्रोल करने और उनसे बचाव में अहम भूमिका निभा सकता हैं। जैसे हमारी आंत में अच्छे और खराब बैक्टीरिया का संतुलन पाचन, इम्यूनिटी और सूजन को कंट्रोल करता है, वैसे ही नाक का माइक्रोबायोम सांस की नलियों की सेहत और इम्यून रिस्पॉन्स को प्रभावित करता है।
निष्कर्ष:
रिसर्च से संकेत मिलता है कि एलर्जिक राइनाइटिस और अस्थमा का संबंध नाक में मौजूद फंगल माइक्रोबायोम के असंतुलन से हो सकता है। नाक में माइक्रोबियल बैलेंस बनाए रखना इन बीमारियों के लक्षणों को कंट्रोल करने और उनसे बचाव में अहम भूमिका निभा सकता है। भविष्य में इस दिशा में होने वाली रिसर्च नए इलाज के रास्ते खोल सकती है।
डिस्कलेमर:
इस लेख में साझा की गई जानकारी केवल सामान्य जागरूकता और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है। इसे पेशेवर चिकित्सा सलाह, निदान या उपचार के विकल्प के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। अपनी डाइट, एक्सरसाइज या दवाओं में कोई भी बदलाव करने से पहले हमेशा अपने डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लें। किसी भी स्वास्थ्य आपात स्थिति के मामले में तुरंत नजदीकी अस्पताल से संपर्क करें।
