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स्वयं सहायता का लैंगिक पाठ

अब जबकि कोविड-19 का संकट भय से आगे सुरक्षित टीके तक पहुंच गया है तो इस दौरान के अनुभवों पर कई ऐसे अध्ययन सामने आ रहे हैं, जो हमारी सामाजिकता को नए सिरे से परिभाषित कर रही हैं।

corona virusकोरोना काल में पूर्णबंदी के दौरान महिलाओं को हुई अधिक परेशानी। फाइल फोटो।

अब जबकि कोविड-19 का संकट भय से आगे सुरक्षित टीके तक पहुंच गया है तो इस दौरान के अनुभवों पर कई ऐसे अध्ययन सामने आ रहे हैं, जो हमारी सामाजिकता को नए सिरे से परिभाषित कर रही हैं। सामाजिकता की इस नई शिनाख्त में सबसे अहम है इससे जुड़ा लैंगिक पहलू। यह बात चिंता बढ़ाने वाली है कि इस संकट के दौरान महिलाओं ने पुरुषों के मुकाबले ज्यादा संकट झेला है।

यूनिवर्सिटी आॅफ मैनचेस्टर के ‘ग्लोबल डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट’ की प्रोफेसर बीना अग्रवाल ने शोध के माध्यम से पाया है कि भारत में महिलाओं को पूर्णबंदी के दौरान पुरुषों की तुलना में नौकरियों का अधिक नुकसान उठाना पड़ा है, पूर्णबंदी के बाद कामकाज में लौटने की दर भी उनकी कम रही है। यह शोध अध्ययन ‘वर्ल्ड डेवलपमेंट’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

इस शोध का सबसे अहम पक्ष यह है कि यह आजीविका की सुरक्षा के लिहाज से ग्रामीण भारत के प्रति पूर्वग्रह को बड़ी चुनौती देता है। इस शोध अध्ययन से पता चलता है कि ग्रामीण महिलाओं की आजीविका का मामला उस स्थिति में कम लड़खड़ाया, जहां वो समूह आधारित उद्यम का हिस्सा रहीं। विशेष रूप से केरल में यह साफ दिखता है, जहां राज्य सरकार ने बचत और कर्ज के लिए महिलाओं के समूहों को बढ़ावा दिया और इन समूहों के सदस्यों ने संयुक्त उद्यम, विशेष रूप से समूह खेती को अपनाया।

केरल के 30 हजार महिला समूहों में से अधिकतर जो सामूहिक रूप से कोविड के पहले से ही खेती कर रहे थे, उन्होंने महिलाओं को बड़े आर्थिक नुकसान से बचाया। इस कठिन दौर में उनके पास कटाई के लिए समूह श्रम था ही, कई ने अपनी उपज भी महिलाओं द्वारा संचालित सामुदायिक रसोई में बेची।

इसके विपरीत, कई अकेले काम करने वाले पुरुष किसानों को श्रम या खरीदारों की कमी के कारण भारी नुकसान हुआ। साफ है कि एक ऐसे दौर में जब समाज और संवेदना दोनों विभक्ति की राह पर हैं, देश की ग्रामीण महिलाओं ने एकजुटता की विवेकसम्मत राह अपनाई है। यह बड़ी कामयाबी के साथ सबके लिए एक बड़ी सीख भी है।

अग्रवाल ने बताया कि भारत में 60 लाख स्वयं सहायता समूहों के बीच समूह उद्यमों के विस्तार की बहुत बड़ी संभावना है। महामारी के दौरान, इन स्वयं सहायता समूहों की लगभग 66 हजार महिला सदस्यों ने लाखों मास्क, हैंड सैनिटाइजर और सुरक्षात्मक उपकरणों का उत्पादन करके खुद को बचाया। ग्रामीण क्षेत्रों में, समूह खेती इन समूहों के लिए स्थायी आजीविका जिस तरह सुनिश्चित करती है, वह अपने आप में एक मिसाल है।

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