दिल्ली के वसंतकुंज में एक मॉडर्न अपार्टमेंट की बालकनी में एक कपल बैठा है। दोनों एक-दूसरे के बेहद करीब हैं, लेकिन फिर भी दूर अपने-अपने मोबाइल में खोए हुए। उनके बीच कोई दिखने वाली दीवार नहीं है, फिर भी एक अदृश्य दूरी साफ महसूस होती है। दूर से देखने पर वे एक सामान्य पति-पत्नी जैसे ही लगते हैं। अगली सुबह वॉक के दौरान मेरी मुलाकात उसी महिला से हुई। चेहरा जाना-पहचाना था वही, जिसे मैं अक्सर अपनी बालकनी से देखती थी। हल्की-फुल्की बातचीत के बाद मैंने सहजता से उसके पति और बच्चों के बारे में पूछ लिया।
मेरे सवाल पर वो थोड़ा हिचकी, फिर धीमे से बोली “वो मेरे पति नहीं हैं… लेकिन पति जैसे ही हैं। हम लिव-इन में रहते हैं… और हमारे कोई बच्चे नहीं हैं। उसके इस जवाब में एक हल्की झिझक थी जैसे शब्दों से ज्यादा उसकी खामोशी बोल रही हो। अब सवाल यह उठता है कि जब यह रिश्ता अपनी मर्जी से, बिना किसी सामाजिक या पारिवारिक दबाव के बना है, तो फिर इस झिझक की वजह क्या है?
लीव इन रिलेशन पर कानूनी पहल
भारत में होने वाली अगली जनगणना में लिव-इन कपल्स के लिए अलग कॉलम बनने की खबर है। भारत में ऐसे जोड़े जो लिव इन रिश्ते में रह रहे हैं और अपने रिश्ते को स्थिर मानते हैं, उन्हें 2027 में होने वाली जनगणना में शादीशुदा जोड़े के तौर पर रजिस्टर किया जाएगा। जो रिश्ते परिवार और समाज की नजर से छुपकर बनते हैं कानून उन्हें मान्यता देना चाहता हैं। फ्रीडम के साथ निभने वाले इस रिश्ते को भी कानून एक नजरिया देना चाहता है।
लिव-इन रिलेशन में क्यों बढ़ रही हैं एंग्जायटी?
कानूनी मान्यता के बावजूद लिव इन रिलेशन में रहने वाले कुछ लोगों में एंजायटी बढ़ रही है। फोर्टिस हेल्थकेयर में अदायु माइंडफुलनेस हॉस्पिटल में सलाहकार मनोचिकित्सक डॉ. नेहा अग्रवाल ने बताया इस रिश्ते में एंजायटी का का कारण इमोशनल सिक्योरिटी की कमी है। शहरों में लिव-इन रिलेशनशिप का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है। लिव-इन रिलेशनशिप में अक्सर अनिश्चितता (uncertainty) ज्यादा होती है। शादी की तरह इसमें स्पष्ट कमिटमेंट नहीं होता, जिससे लोगों में असुरक्षा और एंग्जायटी बढ़ सकती है। एक्सपर्ट ने बताया कमिटमेंट की कमी इस रिश्ते में एंजाइटी का मुख्य कारण है। जब रिश्ते का भविष्य स्पष्ट नहीं होता, तो व्यक्ति ओवरथिंक करने लगता है और मानसिक तनाव बढ़ता है।
Journal of Marriage and Family में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक लिव-इन में रहने वाले जोड़ों में ‘रिलेशनशिप इन स्टेबिलिटी अधिक होती है। जबकि शादी में एक कानूनी और सामाजिक बंधन होता है। लिव-इन में खुद की इच्छा सबसे ऊपर होती है। पार्टनर कभी भी छोड़कर जा सकता है, ये विचार मस्तिष्क के ‘अमिग्डाला’ यानी डर के केंद्र को सक्रिय रखता है, जिससे क्रोनिक स्ट्रेस बढ़ता है। डेनवर यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक डॉ. स्कॉट स्टेनली ने ‘स्लाइडिंग’ का सिद्धांत दिया है। कई लोग सोच-समझकर कमिटमेंट करने के बजाय सुविधा के लिए साथ रहने लगते हैं, तो समय बीतने के साथ अपेक्षाएं (Expectations) बढ़ने लगती हैं। एक पार्टनर शादी चाहता है और दूसरा नहीं, ये कमिटमेंट गैप गंभीर मानसिक तनाव और झगड़ों का कारण बनता है।
मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक लिव-इन में एंग्जायटी बढ़ने के 5 कारण
- कमिटमेंट का अभाव रिश्ते में तनाव को बढ़ाता है। शादी में एक सामाजिक और पारिवारिक दबाव होता है जो सुरक्षा का अहसास देता है लेकिन लिव-इन में कभी भी छोड़ देने की अनकही संभावना पार्टनर के मन में लगातार डर पैदा करती है।
- सोशल आइसोलेशन भी इस रिश्ते में तनाव को बढ़ाता है। आज भी कई शहरों में लिव-इन कपल्स को समाज या मकान मालिकों से छिपकर रहना पड़ता है। यह ‘दोहरी जिंदगी’ जीने का दबाव मानसिक तनाव बढ़ाता है। समाज और परिवार का दबाव बहुत महत्वपूर्ण फैक्टर है, जिससे लोगों को रिश्ते को लेकर झिझक और तनाव महसूस होता है।
- भविष्य की अनिश्चितता तनाव को बढ़ा रही है। हम कहां जा रहे हैं? इस सवाल का जवाब न होना एंग्जायटी का सबसे बड़ा कारण है। जब तक रिश्ता शादी या लॉग टर्म कमिटमेंट की ओर नहीं बढ़ता तब तक मन अशांत रहता है।
- घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ जैसे आपको बिना किसी स्पष्ट भूमिका के घर चलाना पड़ता है जो अक्सर तनाव का कारण बनता है। आर्थिक बंटवारे और घर के कामों को लेकर होने वाले छोटे क्लैश रिलेशनशिप बर्नआउट पैदा करते हैं।
- हालांकि कानून Maintenance का अधिकार देता है,यह Domestic Violence Act, 2005 के तहत आता है और इसके लिए कुछ शर्तें जैसे लंबे समय तक साथ रहना जरूरी हैं। लेकिन इसे साबित करना और अदालती प्रक्रिया से गुजरना एक बड़ा मानसिक तनाव है। कानूनी मान्यता से कुछ हद तक सुरक्षा जरूर मिलती है, लेकिन इमोशनल सिक्योरिटी केवल कानून से नहीं आती। इसके लिए रिश्ते में भरोसा, समझ और मजबूत कम्युनिकेशन जरूरी है। क्योंकि शादी में परिवार संकट के समय साथ खड़ा होता है, जो लिव-इन में अक्सर गायब रहता है।
लिव इन के रिश्ते में इमोशनल सिक्योरिटी क्यों जरूरी है?
- अगर रिश्ते में इमोशनल सिक्योरिटी नहीं होगी, तो व्यक्ति हमेशा असुरक्षित महसूस करेगा। यह असुरक्षा ही एंग्जायटी का मुख्य कारण बनती है।
- जब पार्टनर एक-दूसरे के प्रति भावनात्मक रूप से सुरक्षित महसूस करते हैं, तो रिश्ता कब खत्म हो जाएगा जैसे डर कम होने लगते हैं।
- इमोशनल सिक्योरिटी होने पर बार-बार शक, तुलना या ओवरथिंकिंग की आदत कम होती है जिससे दिमागी सुकून मिलता है।
- लिव-इन में कानूनी बंधन कम होता है, इसलिए भरोसा ही कमिटमेंट की जगह लेता है। यही रिश्ता मजबूत बनाता है।
- जब इंसान रिश्ते को महफूज समझता है तो वो अपनी हर भावना का खुलकर बयां करता है और गलतफहमियां कम होती है।
- इमोशनल सिक्योरिटी रिश्ते को स्थिर बनाती है, जिससे छोटी-छोटी बातों पर टूटने की संभावना कम होती है।
- यह स्ट्रेस, एंग्जायटी और डिप्रेशन के जोखिम को कम करने में मदद करती है और रिलेशनशिप में संतुलन बनाए रखती है।
लिव इन के रिश्ते में एंजाइटी को कैसे करें कंट्रोल
- आप एक ऐसे बेबाक रिश्ते में रहते हैं जिसमें आपने समाज और परिवार की पाबंदियों की ज़ंजीरों को तोड़ा है। आप चाहते हैं कि आपका रिश्ता तमाम उम्र प्यार और मोहब्बत के साथ टिका रहे तो आप अपने रिश्ते पर पार्टनर से खुलकर बातचीत करें। बातचीत रिश्तों के बीच की तकरार का हल है।
- अपनी एक्सपेक्टेशंस और फ्यूचर प्लान पहले से पार्टनर के साथ स्पष्ट करें, ताकि आपका रिश्ता लम्बे समय तक टिका रहे।
- एक-दूसरे के साथ ईमानदारी रखें
- जरूरत पड़े तो रिलेशनशिप काउंसलिंग लें। काउंसलिंग से कपल्स को अपनी समस्याओं को समझने और सुलझाने में मदद मिलती है। एक unbiased एक्सपर्ट के साथ बात करने से रिलेशनशिप बेहतर हो सकता है।
रिलेशनशिप में सबसे जरूरी क्या है?
रिलेशनशिप में सबसे जरूरी रिश्ते की क्वालिटी है।चाहे वह शादी हो या लिव-इन। मजबूत कम्युनिकेशन और भरोसा ही किसी भी रिश्ते को टिकाऊ बनाता हैं।
डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य जानकारी और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है। यदि आप या आपका पार्टनर गंभीर मानसिक तनाव या एंग्जायटी से गुजर रहे हैं, तो तुरंत किसी प्रमाणित प्रोफेशनल काउंसलर या डॉक्टर से संपर्क करें।
