जतिन (बदला हुआ नाम ) की उम्र 50 साल है और कुछ दिनों पहले अचानक उनको डायरिया हो गया और आस-पास के डॉक्टरों से दो से तीन दिन इलाज कराया लेकिन मोशन कंट्रोल नहीं हुए। जतिन की फैमिली परेशान हो गई और उन्हें आनन-फानन में दिल्ली के एक प्राइवेट अस्पताल में दिखाया। डॉक्टरों ने दवाई लिखी साथ ही टेस्ट की एक लम्बी फहरिस्त भी कार्ड पर लिख दी। जतिन ने दवा ली और एक दिन से दो दिन सेहत में सुधार होने का इंतजार किया। दो दिन उनकी सेहत में कोई सुधार नहीं हुआ, अब बीमारी डायरिया से बढ़कर स्टूल में खून आने तक पहुंच गई थी। परिवार के लोग डर के अगले दिन जतिन को अस्पताल ले गए जहां डॉक्टरों ने उन्हें भर्ती कर लिया और उनकी एंडोस्कोपी, कोलोन्सकोपी, ब्लड टेस्ट, यूरिन टेस्ट,स्टूल टेस्ट, ब्लड क्लॉटिंग टेस्ट, कुल मिलाकर 17 जांचें कराई गई।
जतिन के परिवार ने सारी जांचें करा ली अंत में पता चला कि उन्हें अल्सरेटिव कोलाइटिस है। डॉक्टरों ने बीमारी को डायग्नोस कर लिया उसके बाद भी अस्पताल में सीटी स्कैन करने के लिए मरीज को कहा, परिवार ने अफोर्ड ना करने की बात रखकर सीटी स्कैन कराने से इंकार कर दिया और मरीज अगले दिन अस्पताल से डिस्चार्ज हो गया। अच्छी बात ये हैं कि फिल्हाल जतिन ठीक है और अभी उनकी दवा चल रही है। अब सवाल ये उठता है कि आखिर एक पेट की बीमारी के लिए क्या सीटी स्कैन और PET Scan कराना मेडिकल डिमांड है ? सेहत को लेकर सतर्कता है या फिर ओवर-टेस्टिंग का धंधा जोरों पर है।
पेट की एक आम बीमारी और 17 जांचें: क्या कहते हैं डॉक्टर
जतिन को डायरिया हुआ और जांच में अल्सरेटिव कोलाइटिस डायग्नोज हुआ और साथ में डॉक्टर ने पूरी बॉडी का सीटी स्कैन कराने को भी कहा जिसे परिवार ने कराने से मना कर दिया इस मामले को जनसत्ता ने मारेंगो एशिया हॉस्पिटल में गैस्ट्रोएंटरोलॉजी में वरिष्ठ सलाहकार एवं विभागाध्यक्ष डॉ. अमित मित्तल से साझा किया तो उन्होंने बताया इस मामले में सिर्फ डायरिया नहीं था, बल्कि मरीज के मल (स्टूल) में खून आने लगा था। ऐसी स्थिति में साधारण संक्रमण मानकर केवल एंटीबायोटिक देना पर्याप्त नहीं होता। एंडोस्कोपी और कोलोनोस्कोपी जैसी जांचें इसलिए जरूरी हो सकती हैं ताकि बीमारी की सही वजह का पता चल सके। अगर मरीज को अल्सरेटिव कोलाइटिस है और समय पर इसकी पहचान नहीं होती, तो लंबे समय में यह गंभीर जटिलताओं, यहां तक कि कुछ मामलों में कैंसर के जोखिम को भी बढ़ा सकता है।
अल्सरेटिव कोलाइटिस क्या है?
अल्सरेटिव कोलाइटिस (Ulcerative Colitis) एक क्रोनिक इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज (Inflammatory Bowel Disease-IBD) है, जिसमें बड़ी आंत (कोलन) और मलाशय (रेक्टम) की अंदरूनी परत में लगातार सूजन और घाव (अल्सर) बन जाते हैं। इस वजह से मरीज को बार-बार दस्त, मल के साथ खून आना, पेट में दर्द और शौच के दौरान असहजता जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। कई मामलों में यह बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती है, जबकि कुछ लोगों में इसके लक्षण अचानक भी उभर सकते हैं। समय पर इलाज न मिलने पर शरीर में कमजोरी, वजन घटना और पोषक तत्वों की कमी जैसी दिक्कतें भी हो सकती हैं।
अल्सरेटिव कोलाइटिस की पुष्टि के लिए कौन-सी जांच जरूरी?
गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट के मुताबिक, मरीज में अल्सरेटिव कोलाइटिस की पुष्टि करने के लिए कोलोनोस्कोपी, एंडोस्कोपी और बायोप्सी उचित जांच हैं। इन्हीं जांचों से बीमारी का सही निदान होता है और उसके आधार पर इलाज शुरू किया जाता है। इसलिए इस मामले में इन जांचों को अनावश्यक नहीं कहा जा सकता।
क्या हर अल्सरेटिव कोलाइटिस मरीज को CT या PET Scan की जरूरत होती है?
डॉक्टर अमित ने बताया क्योंकि अल्सरेटिव कोलाइटिस का निदान हो चुका है, तो सामान्य परिस्थितियों में PET Scan की जरूरत नहीं होती। हालांकि अगर डॉक्टर को ट्यूमर, किसी दूसरी बीमारी या ब्लीडिंग के किसी अन्य कारण का संदेह हो, तब PET Scan या CT Scan कराने की सलाह दी जा सकती है। यानी यह मरीज की स्थिति पर निर्भर करता है। विशेषज्ञ ने बताया कि अगर शरीर में ट्यूमर होने का संदेह हो, तो कई बार पूरे शरीर का PET Scan कराया जाता है। इसका उद्देश्य एक ही बार में पूरे शरीर की जांच करना होता है। इससे अलग-अलग अंगों के लिए बार-बार CT Scan कराने की जरूरत नहीं पड़ती।
पिछले 10 वर्षों में हेल्थ चेकअप का ट्रेंड क्यों बढ़ा?
डॉक्टरों की मानें तो पिछले कुछ वर्षों में लोगों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता भी बढ़ी है और हेल्थ चेकअप का कारोबार भी तेजी से बढ़ा है। दोनों बातें साथ-साथ चल रही हैं। अब कई लोग बिना किसी बीमारी के भी नियमित हेल्थ चेकअप कराने लगे हैं, वहीं अस्पतालों और लैब्स ने भी कई नए पैकेज बाजार में उतार दिए हैं। डॉक्टर के अनुसार, 40 वर्ष की उम्र के बाद साल में एक बार कुछ बेसिक जांचें कराना पर्याप्त माना जाता है लेकिन आज कल लैब में ऐसे ऐसे टेस्ट कराएं जाते हैं जिनका सेहत से कोई लेना देना नहीं है।
ICMR क्या कहता है?
ICMR ने Good Clinical Laboratory Practices (GCLP) 2021 जारी की हैं, जिनका उद्देश्य लैब जांचों की गुणवत्ता, सटीकता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना है। वहीं National Essential Diagnostics List (NEDL) के माध्यम से यह भी बताया गया है कि देश के विभिन्न स्तरों की स्वास्थ्य सेवाओं पर कौन-कौन सी आवश्यक डायग्नोस्टिक जांच उपलब्ध होनी चाहिए। आपको बता दें कि ICMR ने ऐसी कोई गाइडलाइन जारी नहीं की है जिसमें सभी लोगों के लिए नियमित “फुल बॉडी चेकअप” या बड़ी संख्या में टेस्ट कराने की सिफारिश की गई हो। हर जांच मरीज के लक्षण, मेडिकल हिस्ट्री, जोखिम कारकों और डॉक्टर के क्लीनिकल आकलन के आधार पर लिखी जानी चाहिए।
हेल्थ को लेकर जागरूक है तो 40 के बाद ये जांच हैं जरूरी
CBC (Complete Blood Count)
लिवर फंक्शन टेस्ट (LFT)
किडनी फंक्शन टेस्ट (KFT)
ब्लड शुगर
थायराइड टेस्ट
लिपिड प्रोफाइल (कोलेस्ट्रॉल)
इसके अलावा समय-समय पर अल्ट्रासाउंड एब्डोमेन और चेस्ट एक्स-रे कराया जा सकता है। इकोकार्डियोग्राफी एक बार कराई जा सकती है, लेकिन इसे बार-बार कराने की जरूरत नहीं होती।
कौन-से हेल्थ पैकेज अक्सर अनावश्यक हो सकते हैं?
विशेषज्ञ के अनुसार, आजकल कई लैब्स ऐसे पैकेज बेच रही हैं जिनमें आर्सेनिक, मरकरी, कॉपर लेवल, कई तरह के विटामिन टेस्ट और फुल बॉडी स्कैन जैसी जांचें शामिल होती हैं। हर व्यक्ति को इन जांचों की जरूरत नहीं होती। ऐसे टेस्ट कई बार छोटे-छोटे बदलाव दिखा देते हैं, जो बीमारी नहीं होते, लेकिन मरीज को मानसिक रूप से परेशान कर सकते हैं।
क्या ओवर-टेस्टिंग से नुकसान भी हो सकता है?
डॉक्टर अमित ने बताया जरूरत से ज्यादा जांचें कराने से सबसे बड़ा नुकसान मरीज की जेब और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। रिपोर्ट में कोई मामूली बदलाव आने पर मरीज घबरा जाता है, जबकि कई बार उसका कोई चिकित्सीय महत्व नहीं होता। इससे एंग्जायटी बढ़ सकती है और व्यक्ति खुद को गंभीर बीमार मानने लगता है।
आजकल विटामिन की जांच का चलन जोरों पर हैं, क्या हर विटामिन की जांच कराना जरूरी है?
विशेषज्ञ के मुताबिक, आजकल विटामिन B12, विटामिन D और कई अन्य विटामिन की जांचें बिना जरूरत के भी लिखी जा रही हैं। यदि पहले एक बार जांच हो चुकी है और कोई विशेष लक्षण नहीं हैं, तो इन्हें बार-बार कराने की आवश्यकता नहीं होती।
हेल्थ अवेयरनेस का सही तरीका क्या है?
डॉक्टर का मानना है कि केवल टेस्ट कराते रहना ही स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होना नहीं है। यदि कोई व्यक्ति वास्तव में अपनी सेहत का ध्यान रखना चाहता है, तो उसे समय पर वैक्सीनेशन, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त पानी पीना, धूम्रपान और शराब से दूरी तथा अच्छी जीवनशैली पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
वैक्सीन पर कम और टेस्ट पर ज्यादा ध्यान क्यों?
विशेषज्ञ ने कहा कि लोग फ्लू, न्यूमोकोकल और शिंगल्स जैसी जरूरी वैक्सीन पर कम ध्यान देते हैं, जबकि महंगे हेल्थ पैकेज और बार-बार टेस्ट कराने में ज्यादा रुचि दिखाते हैं। उनका मानना है कि बीमारी होने के बाद जांच कराने से बेहतर है कि पहले से बचाव के उपाय अपनाए जाएं।
इंटरनेट और AI से बीमारी का पता लगाना कितना सही?
डॉक्टर ने कहा कि आजकल कई लोग इंटरनेट या AI टूल्स पर अपने लक्षण देखकर खुद ही गंभीर बीमारी का अंदेशा लगाने लगते हैं। इससे अनावश्यक डर और चिंता बढ़ सकती है। किसी भी रिपोर्ट या लक्षण की सही व्याख्या केवल योग्य डॉक्टर ही कर सकता है, इसलिए ऑनलाइन जानकारी को अंतिम सच मानने के बजाय विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।
डायग्नोस्टिक टेस्ट और स्क्रीनिंग के लिए आधिकारिक गाइडलाइंस जानना जरूरी
भारत में डायग्नोस्टिक टेस्ट, स्क्रीनिंग और विभिन्न बीमारियों के निदान एवं प्रबंधन से जुड़ी गाइडलाइंस इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR), स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) और संबंधित मेडिकल स्पेशियलिटी की प्रोफेशनल संस्थाएं समय-समय पर जारी करती हैं। ICMR की आधिकारिक वेबसाइट पर विभिन्न बीमारियों, क्लीनिकल लेबोरेटरी प्रैक्टिस (Good Clinical Laboratory Practices-GCLP), डायग्नोस्टिक प्रोटोकॉल और स्क्रीनिंग से जुड़ी कई गाइडलाइंस उपलब्ध हैं।
डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य जागरूकता और ICMR/वैश्विक गाइडलाइंस के अध्ययन पर आधारित है। किसी भी बीमारी में कौन सा टेस्ट जरूरी है और कौन सा नहीं, इसका अंतिम निर्णय हमेशा अपने प्रमाणित डॉक्टर की सलाह पर ही लें।
