Just until pregnancy Women's Health, Period not just related to sanitary pads - हमारे गांव : सिर्फ गर्भावस्था तक सिमटा महिला स्वास्थ्य, पीरियड का संबंध सिर्फ सेनेटरी पैड से नहीं - Jansatta
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हमारे गांव : सिर्फ गर्भावस्था तक सिमटा महिला स्वास्थ्य, पीरियड का संबंध सिर्फ सेनेटरी पैड से नहीं

मासिक धर्म पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के स्वास्थ्य, विकास और स्वच्छता से जुड़ा ऐसा विषय है जिस पर शर्म करना और चुप रहना हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है। स्वाति सिंह अपने कॉलेज के समय से ही इन मुद्दों पर सक्रिय हो चुकी थीं। उत्तर प्रदेश में वाराणसी के पास 30 गांवों में मासिक स्वास्थ्य पर काम करने के लिए ‘मुहीम’ नाम की संस्था बना कर ‘पीरियड अलर्ट’ के लिए काम करने लगीं।

Author February 15, 2018 4:34 AM
पुरुष प्रधान समाज में आज भी स्त्री की स्थिति संतोषजनक नहीं है। स्त्री को सशक्त करने की दिशा में राजनीति में तैंतीस प्रतिशत ही सही, जगह मिलनी चाहिए। (File Photo)

स्वाति सिंह

ग्रामीण क्षेत्रों में लंबे समय से मासिक धर्म स्वास्थ्य को लेकर काम करने वालीं स्वाति सिंह कहती है कि ‘महिला स्वास्थ्य’ आज भी हमारी किताब से लेकर हमारी सोच-जुबां इस विषय पर सिर्फ गर्भवती महिला तक सीमित है। इससे इतर अगर बात होती भी है तो महिलाओं से जुड़ी बीमारियों के बारे में लेकिन ‘पीरियड’ जैसे मुद्दे आज भी हमारी किताब और जुबां से नदारद हैं। बाजार में सेनेटरी पैड और उनके खरीदार तो मौजूद हैं लेकिन सवाल यह है कि इस विषय पर खुलकर बात करने वाले और इस खुली बात को सुनने वाले कितने हैं?

स्वाति कहती हैं कि पीरियड के मुद्दे को हमेशा से ही हमारे समाज में शर्म का विषय माना जाता रहा है। अब इसे संयोग कहें या दुर्भाग्य कि जब समाज की किसी समस्या पर कोई फिल्म बन जाती है तो उसे लेकर तात्कालिक हंगामा दिखता है। ऐसा ही कुछ हुआ फिल्म ‘पैडमैन’ के भी साथ। चूंकी फिल्म एक नए विषय पर थी, इसलिए प्रमोशन का तरीका भी कुछ नया रहा। सोशल मीडिया के जरिए पैड के सेल्फी पोस्ट करने की तकनीक को अपनाया गया, जिसमें फिल्म जगत से लेकर आमजन ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। लेकिन ऐसा करने से क्या वाकई सेनेटरी पैड की उपलब्धता की समस्या हल हो सकती है? या फिर जिन लोगों ने पैड के साथ फोटो पोस्ट की क्या वे इस विषय पर अपने घर-समाज में बात करने लगे? इन सभी पहलुओं पर गौर करना जरूरी है। स्वाति कहती हैं कि अगर अपने साल भर से अधिक ग्रामीण इलाकों में इस विषय पर लगातार काम करने के अनुभव के आधार पर कहूं तो इस फिल्म ने भले से ‘पीरियड’ और ‘सेनेटरी पैड’ शब्द को फैशन में ला दिया हो, लेकिन इसका समस्या समाधान से सरोकार जरा भी नहीं। इसने इस समस्या का समाधान सेनेटरी पैड के इस्तेमाल को बना दिया है और इसी तर्ज पर दबे स्वर में सेनेटरी पैड से टैक्स हटवाने, फ्री पैड डिस्ट्रीब्यूशन और वेंडिंग मशीन लगवाने जैसी भी बात की, जो इस विषय को एकबार फिर एक नए दायरे में समेटने जैसा है। एक तरफ तो इस प्राकृतिक प्रक्रिया को समस्या बना दिया और उसका समाधान पैड बता दिया, जिसे खत्म कर इससे जुड़े अन्य जरूरी पहलुओं को समझना बेहद जरूरी है।

ग्रामीण क्षेत्र से दूर है सेनेटरी पैड

स्वाति कहती हैं कि अभी तक हमलोगों ने आठ सौ से अधिक महिलाओं और किशोरियों के साथ सेनेटरी पैड के इस्तेमाल पर सर्वेक्षण किया गया, जिसमें यही पाया है कि ज्यादातर महिलाएं सूती कपड़े का इस्तेमाल करती हैं न की सेनेटरी पैड का। साथ ही, जो महिलाएं सेनेटरी पैड खरीद सकती हैं, उनके साथ समस्या इस बात की है कि उन्हें यही नहीं पता कि इसका इस्तेमाल कैसे करना है। ऐसे में हमें यह समझना होगा कि आज भी हमारा देश गांवों में बसता है। जो लगातार गरीबी और अशिक्षा से जूझता वर्ग है। ऐसे में, इस प्रक्रिया के प्रबंधन के लिए हमें उन उपायों को चुनना होगा जिसके लिए महिलाएं किसी और पर निर्भर न रहें। सरल शब्दों में कहूं तो जिन लोगों के पास दो जून की रोटी के लिए पैसा नहीं, वे सेनेटरी पैड कैसे खरीद पाएंगीं? इसके लिए जरूरी है कि हम उन्हें खुद से सेनेटरी पैड बनाने और इसके निस्तारण के लिए तैयार करें, जो उनके स्वास्थ्य और प्रकृति दोनों के लिए हानिकारक न हो।

पीरियड का संबंध सिर्फ सेनेटरी पैड से नहीं

यह मुद्दा सिर्फ ‘दाग’ और ‘दर्द’ तक सीमित नहीं है क्योंकि महिला के मां बनने से लेकर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का पता माहवारी से लगाया जा सकता है और कई बार यह ढेरों खतरनाक बीमारियों का कारण भी बनती है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस विषय पर काम के लिए पहला कदम पीरियड से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने के लिए उठाना चाहिए, क्योंकि वास्तविकता यह है कि हमारे समाज में महिलाओं को पीरियड संबंधित जानकारियों से ज्यादा इससे जुड़ी भ्रांतियों का ज्ञान होता है और जिनका पालन भी वो उम्र भर करती है, जो न केवल उनके शरीर को बल्कि उनके जीवन को प्रभावित करता है।

स्वस्थ चर्चा है जरूरी

स्वाति कहती हैं कि इसके साथ ही, इस विषय पर स्वस्थ चर्चा का माहौल बनाना भी बेहद जरूरी है। जब हम मां पर गर्व करते हैं तो माहवारी पर क्यों नहीं? आज भी मध्यमवर्गीय परिवार में अधिकतर लड़कियां पहली बार पीरियड शुरू होने पर डर जाती हैं, क्योंकि उन्हें इसके बारे में कुछ भी बताया ही नहीं जाता। पीरियड शुरू होने के बाद उन्हें सेनेटरी पैड या सूती कपड़ा देकर, इस दौरान उन्हें खानपान और साफ-सफाई में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए बताने के बजाय, इस दौरान उन्हें कौन से काम नहीं करने हैं इसके बारे में बेहद विस्तार से बताया जाता है, जिसे खत्म करना बेहद जरूरी है।

छह साल की बच्ची ने कहा, पीरियड से डरूंगी नहीं

स्वाति कहती हैं कि एक बार आदर्श ग्राम नागेपुर में हमलोगों ने पीरियड पर ग्रामीण किशोरियों के साथ कला-प्रतियोगिता का आयोजन किया। जिसमें 6 साल से लेकर 25 साल तक की किशोरियों ने हिस्सा लिया। वहां छह साल की एक बच्ची ने (जिसे ढंग से लिखना भी नहीं आता था) दूसरी लड़की की मदद से पीरियड पर एक चित्र बनाया, जिसमें उसने एक पैड का चित्र बनाकर उस पर लिखवाया ‘जब मेरा पीरियड आएगा तो मैं डरूंगी नहीं’। उसकी यह बात एकदम दिल को छू जाने वाली थी।

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