हमारे देश में तकरीबन ढाई करोड़ से ज्यादा लोग इंफर्टिलिटी से जूझ रहे हैं जिसमें महिलाएं और पुरुष दोनों शामिल हैं। अगर दंपत्ति की बात करें तो हर 6 में से एक कपल्स इंफर्टिलिटी से जूझ रहा है। इंफर्टिलिटी मतलब जब कपल्स बच्चा पैदा करने में असमर्थ होते हैं, ऐसे लोग मां-बाप का सुख हासिल करने के लिए आईवीएक का सहारा लेते हैं। VF यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन है जिसमें महिला के एग्स को पुरुष के स्पर्म से लैब में मिलाया जाता है। भ्रूण (embryo) को फिर महिला के गर्भाशय में ट्रांसफर किया जाता है। इस तकनीक से जन्मे बच्चों को टेस्ट्यूब बेबी कहा जाता है।

भारत में इंफर्टिलिटी से परेशान लोग माता पिता का सुख हासिल करने के लिए  IVF का सहारा लेते हैं, लेकिन जब इस तकनीक के बारे में नेट पर जानकारी हासिल करते हैं तो उनके दिमाग में कई तरह के सवाल पैदा होने लगते हैं जो उन्हें इस तकनीक से बच्चा पैदा करने में भ्रम पैदा करते हैं। IVF तकनीक को लेकर लोगों में कुछ मिथ्स है जिन्हें समझना बेहद जरूरी है। आइए IVF एक्सपर्ट से जानते हैं कि IVF तकनीक को लेकर लोगों में कौन-कौन से मिथ और फैक्ट हैं?  

मिथ:क्या IVF तकनीक से पैदा हुआ बच्चा बीमार होता है?

इलेंटिस हेल्थ केयर दिल्ली में IVF डिपार्टमेंट के चेयरमेन डॉक्टर मनन गुप्ता ने बताया ये कहना कि IVF से होने वाले बच्चे कमजोर और बीमार होते हैं ये पूरी तरह से मिथ है। IVF से पैदा हुए बच्चे बिल्कुल सामान्य और तंदुरुस्त होते हैं और उनकी ग्रोथ भी सामान्य बच्चों की तरह ही होती है।

मिथ: IVF में सिर्फ लड़का पैदा होता है क्या ये सच है ?

मैक्स हेल्थ केयर में  Infertility & IVF  डायरेक्टर श्वेता गुप्ता ने बताया कि IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) आज सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया जैसे UK और USA में भी इस्तेमाल किया जाता है। IVF तब किया जाता है जब किसी मरीज को इनफर्टिलिटी की समस्या होती है। यानी जब प्राकृतिक तरीके से गर्भधारण नहीं हो पाता, तब IVF एक इलाज के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। IVF कोई रूटीन या हर किसी के लिए किया जाने वाला इलाज नहीं है। इसे तभी किया जाता है जब इसकी जरूरत होती है। IVF प्रक्रिया में पहले एम्ब्रियो (भ्रूण) तैयार किया जाता है, फिर उसकी क्वालिटी (grading) देखी जाती है, जो सबसे अच्छा और स्वस्थ एम्ब्रियो होता है, उसे चुना जाता है। उसी एम्ब्रियो को महिला के गर्भाशय में डाला जाता है। इसके दो हफ्ते बाद प्रेगनेंसी टेस्ट किया जाता है, जिससे पता चलता है कि IVF सफल हुआ या नहीं। भारत में सेक्स सेलेक्शन करना कानूनन प्रतिबंधित है। IVF से लड़का पैदा हो गया या लड़की ये टेस्ट के बाद ही पता चलता है। ये धारणा गलत है कि आईवीएफ से लड़का ही होता है।

मिथ: IVF कराने से कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।

IVF कराने से महिलाओं में कैंसर का खतरा बढ़ जाता है इसके लिए कुछ परिस्थितियां जिम्मेदार हो सकती हैं जैसें अगर कोई महिला बार-बार IVF साइकिल करवाती है, तो ओवेरियन या ब्रेस्ट कैंसर का जोखिम थोड़ा बढ़ सकता है। इसलिए बार-बार IVF कराने से बचने की सलाह दी जाती है।

मिथ: IVF प्रेगनेंसी हमेशा हाई-रिस्क होती है

IVF तकनीक से जन्मे बच्चों की डिलीवरी भी नॉर्मल तरीके से होती है।  कई मामलों में महिला की उम्र ज्यादा होती है या उन्हें दूसरी समस्याएं होती हैं इसलिए उन्हें ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है।

मिथ: IVF सिर्फ अमीर लोगों के लिए है

IVF ट्रीटमेंट सिर्फ अमीर लोगों के लिए हैं ये कहना बिल्कुल गलत हैं, क्योंकि आजकल ज्यादातर हॉस्पिटल में अफॉर्डेबल पैकेज मौजूद है, EMI की सुविधा है और कई सरकारी योजनाएं भी हैं जिसका लाभ सभी वर्ग के लोग उठा सकते हैं।

मिथ: IVF एक बार फेल हो जाए तो दोबारा सफल नहीं होता

ये कहना बिल्कुल गलत है कि अगर एक बार आईवीएफ फेल हो जाए तो दोबारा नहीं होता। सफल परिणाम पाने के लिए डॉक्टर की सलाह से आईवीएक को कई बार ट्राई किया जा सकता है।

डिस्क्लेमर: यह लेख केवल चिकित्सा तकनीक (IVF) से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने के उद्देश्य से लिखा गया है। जंसत्ता किसी भी प्रकार के अवैध लिंग परीक्षण या चयन का समर्थन नहीं करता है। किसी भी चिकित्सा उपचार के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श लें।