Internet Gaming Disorder: अमन 17 साल का है और फर्स्ट ईयर का स्टूडेंट है। कॉलेज के पहले साल में ही उसके पेरेंट्स ने उसे आईफोन 16 लेकर दिया है, जिस पर वह दिनभर व्यस्त रहता है। उसका मोबाइल सिर्फ फोटो लेने, वीडियो और रील्स देखने के लिए ही इस्तेमाल नहीं होता, बल्कि वह कई तरह के गेम्स भी खेलता है। अमन को पिछले कुछ महीनों से मोबाइल से इतना लगाव हो गया है कि वह सुबह उठते ही सबसे पहले हाथ में मोबाइल लेता है, तब बाथरूम जाता है। कॉलेज जाने से लेकर आने तक उसका फोकस मोबाइल पर होता है। रात को सोने से पहले देर रात तक मोबाइल पर गेम खेलता है। फैमिली के मना करने के बावजूद वह लगा रहता है। कई बार वह अपने पेरेंट्स से वादा करता है कि दिन में सिर्फ 1 घंटा खेलेगा, लेकिन फिर भी खुद पर कंट्रोल नहीं कर पाता। अमन की यह गेम खेलने की आदत अब एक लत का रूप ले चुकी है। साइकियाट्रिस्ट्स इस स्थिति को Internet Gaming Disorder कहते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी इसे ‘Internet Gaming Disorder’ के रूप में पहचान चुका है। लेकिन Gen Z में गेमिंग का यह जुनून क्यों बढ़ता जा रहा है, इसके शुरुआती संकेत क्या हैं और समय रहते इस लत को कैसे पहचाना जाए? आइए, मनोचिकित्सकों और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से समझते हैं पूरी बात!

इंटरनेट गेमिंग डिसऑर्डर क्या है?

फोर्टिस हेल्थकेयर में अदायु माइंडफुलनेस हॉस्पिटल में सलाहकार मनोचिकित्सक डॉ. नेहा अग्रवाल ने जनसत्ता से बातचीत में बताया इंटरनेट गेमिंग डिसऑर्डर एक तरह का बिहेवियरल एडिक्शनहै। विशेषज्ञ के मुताबिक इसमें व्यक्ति गेम खेलने को लेकर इतना प्री-ऑक्यूपाइड हो जाता है कि उसका ध्यान बार-बार गेम की तरफ जाता रहता है। गेम खेलने से उसे अच्छा महसूस होता है और जीतने या बेहतर स्कोर करने की इच्छा उसे लगातार गेमिंग की ओर खींचती रहती है। यह स्थिति कुछ हद तक अन्य एडिक्शन की तरह हो सकती है, जहां व्यक्ति यह जानते हुए भी व्यवहार जारी रखता है कि यह उसके लिए नुकसानदायक है।

डॉक्टर नेहा ने बताया सिर्फ ज्यादा समय तक गेम खेलना इंटरनेट गेमिंग डिसऑर्डर नहीं कहलाता। अगर बच्चा अपनी गेमिंग को कंट्रोल कर सकता है, उदाहरण के लिए आधे घंटे खेलने के बाद खुद गेम बंद कर देता है और पढ़ाई, खाना, सोना या दूसरी गतिविधियों को सामान्य रूप से करता है, तो इसे डिसऑर्डर नहीं माना जाता। समस्या तब बनती है जब बच्चा गेमिंग पर अपना कंट्रोल खोने लगे और गेम उसकी रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालने लगे।

गेमिंग डिसऑर्डर में कंट्रोल क्यों खत्म होने लगता है?

डॉक्टर नेहा ने बताया गेमिंग डिसऑर्डर की स्थिति में व्यक्ति गेम न खेलने पर बेचैनी, चिड़चिड़ापन या चिंता महसूस कर सकता है। उसका मन दूसरी गतिविधियों में नहीं लगता और वह लगातार गेम के बारे में सोचता रहता है। उदाहरण के तौर पर देखें तो स्कूल में टीचर पढ़ा रही हों, लेकिन बच्चे का ध्यान पढ़ाई की बजाय इस बात पर हो कि वह दोबारा गेम कब खेलेगा।

गेमिंग में टॉलरेंस बढ़ना भी संकेत

अगर कोई बच्चा पहले आधे या एक घंटे गेम खेलकर संतुष्ट हो जाता था, लेकिन धीरे-धीरे उसे उतना ही अच्छा महसूस करने के लिए ज्यादा समय तक गेम खेलना पड़े, तो इसे टॉलरेंस बढ़ना कहा जा सकता है। यानी पहले जितना समय गेमिंग के लिए पर्याप्त था, अब उतने समय से संतुष्टि नहीं मिलती और गेमिंग का समय बढ़ता जाता है।

गेमिंग डिसऑर्डर के प्रमुख लक्षण

इस समस्या में व्यक्ति लगातार गेमिंग के बारे में सोच सकता है। गेम न खेल पाने पर उदासी, चिड़चिड़ापन, गुस्सा या बेचैनी हो सकती है। उसे लग सकता है कि वह गेमिंग पर नियंत्रण नहीं रख पा रहा है और चाहने के बावजूद गेम छोड़ नहीं सकता। धीरे-धीरे वह अपनी दूसरी हॉबी, सामाजिक गतिविधियां और जरूरी काम भी छोड़ने लग सकता है।

गेम रोकने पर बच्चा क्यों होता है आक्राम

अगर माता-पिता गेम खेलने से रोकते हैं और बच्चा बहुत ज्यादा गुस्सा या चिड़चिड़ापन दिखाता है, तो यह भी एक चेतावनी संकेत हो सकता है। कुछ बच्चे चीजें फेंक सकते हैं, बहस कर सकते हैं, खाना खाने से मना कर सकते हैं या किसी तरह भावनात्मक दबाव बनाकर दोबारा गेम खेलने की कोशिश कर सकते हैं। यह व्यवहार इस बात का संकेत हो सकता है कि बच्चा गेमिंग को नियंत्रित करने में कठिनाई महसूस कर रहा है।

गेम खेलने का बच्चे की डाइट और लाइफस्टाइल पर असर

वादा करने के बाद भी बच्चा गेमिंग रखता है जारी

कई बार बच्चा खुद वादा करता है कि वह अब गेम नहीं खेलेगा या कम खेलेगा, लेकिन थोड़े समय बाद दोबारा उसी व्यवहार को दोहराने लगता है। अगर बच्चा बार-बार कोशिश करने के बावजूद अपनी गेमिंग की आदत को कंट्रोल नहीं कर पा रहा है, तो यह एडिक्टिव बिहेवियर का संकेत हो सकता है।

नींद पर पड़ता है असर

गेमिंग का समय बढ़ने से नींद का पैटर्न प्रभावित हो सकता है। स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताने और देर रात तक गेम खेलने से व्यक्ति की नींद आने में परेशानी हो सकती है। नींद बार-बार टूट सकती है या बच्चा देर से सोकर देर से उठ सकता है। इससे उसका सामान्य स्लीप साइकिल बिगड़ सकता है और दिन में थकान या बेचैनी महसूस हो सकती है।

भूख और खाने की आदत भी हो सकती है प्रभावित

गेमिंग में बहुत ज्यादा व्यस्त रहने पर बच्चा समय पर खाना भूल सकता है या भूख पर ध्यान नहीं दे पाता। कुछ बच्चे गेम खेलते हुए खाना खाते रहते हैं और उन्हें इस बात का भी सही एहसास नहीं रहता कि उन्होंने कितना और कब खाना खाया। इस तरह गेमिंग का असर खाने और सोने जैसी बुनियादी दिनचर्या पर भी पड़ सकता है।

पढ़ाई और स्कूल पर असर

जब गेमिंग बच्चे के लिए बाकी जरूरी गतिविधियों से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाए, तो उसकी पढ़ाई प्रभावित हो सकती है। वह होमवर्क को नजरअंदाज कर सकता है, स्कूल जाने से बच सकता है या रात में पर्याप्त नींद न लेने के कारण सुबह उठने में परेशानी हो सकती है। धीरे-धीरे उसकी शैक्षणिक और सामाजिक गतिविधियों पर असर पड़ने लगता है। जो युवा पढ़ाई के साथ नौकरी कर रहे हैं या ऑफिस जाते हैं, वे भी लंबे समय तक गेमिंग में व्यस्त रहने के कारण अपने काम और जिम्मेदारियों को नजरअंदाज कर सकते हैं। जब गेमिंग की वजह से उनकी सोशियो-ऑक्यूपेशनल फंक्शनिंग प्रभावित होने लगे, तब यह गंभीर चिंता का विषय बन जाता है।

एंग्जायटी और डिप्रेशन जैसे लक्षण

गेमिंग डिसऑर्डर वाले व्यक्ति में चिंता और भावनात्मक दूरी देखने को मिल सकती है। वह परिवार के लोगों से कम बातचीत कर सकता है और दूसरों से कटा-कटा महसूस कर सकता है। कुछ मामलों में उदासी, चिड़चिड़ापन और एंग्जायटी जैसी समस्याएं भी दिखाई दे सकती हैं।

गेमिंग कब बनती है गंभीर समस्या?

माता-पिता को तब सतर्क होना चाहिए जब बच्चे का गेमिंग टाइम लगातार बढ़ने लगे और समझाने के बावजूद वह गेमिंग कम न कर पाए। अगर बच्चा स्कूल, पढ़ाई, होमवर्क, नींद, खाना या दूसरी जरूरी गतिविधियों को नजरअंदाज करने लगे, तो इसे सामान्य गेमिंग मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खासतौर पर जब माता-पिता और बच्चा दोनों महसूस करने लगें कि वह गेमिंग छोड़ नहीं पा रहा है, तब विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी हो सकता है।

बच्चे में भावनात्मक बदलावों पर भी ध्यान दें

कई बार बच्चा तनाव, चिंता, उदासी, किसी दोस्त से झगड़े, ब्रेकअप या कम नंबर आने जैसी भावनात्मक परेशानियों से बचने के लिए गेमिंग का सहारा लेने लगता है। इसलिए केवल गेमिंग का समय कम करवाना ही पर्याप्त नहीं है। माता-पिता को यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि बच्चा गेमिंग में इतना ज्यादा क्यों जा रहा है और उसके पीछे कोई भावनात्मक समस्या तो नहीं है।

इंटरनेट गेमिंग डिसऑर्डर का इलाज

इस समस्या के इलाज में बिहेवियर थेरेपी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। विशेषज्ञ के अनुसार कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी यानी CBT की मदद से व्यक्ति अपनी आदतों और विचारों को बदलने पर काम कर सकता है। गेमिंग के लिए स्पष्ट और सख्त समय सीमा तय करना और धीरे-धीरे दूसरी सकारात्मक गतिविधियों की ओर ध्यान बढ़ाना भी उपचार का हिस्सा हो सकता है।

कुछ मामलों में दवाओं की भी जरूरत

अगर गेमिंग के पीछे कंपल्सिव बिहेवियर या दूसरी मानसिक समस्याएं मौजूद हों, तो डॉक्टर स्थिति के अनुसार दवाओं की मदद भी ले सकते हैं। हालांकि दवा की जरूरत हर व्यक्ति में नहीं होती और इसका फैसला मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ मरीज की स्थिति का आकलन करने के बाद करते हैं।

परिवार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण

गेमिंग डिसऑर्डर की रोकथाम में परिवार की भूमिका अहम है। माता-पिता को बच्चों की दिनचर्या और उनकी ऑनलाइन गतिविधियों के प्रति जागरूक रहना चाहिए। बच्चे को केवल गेम खेलने से रोकने के बजाय उसके साथ नियमित बातचीत करना जरूरी है। विशेषज्ञ ने सुझाव दिया कि माता-पिता रोजाना कुछ समय बच्चों के साथ उनकी दिनचर्या और भावनाओं के बारे में बातचीत करने के लिए जरूर निकालें।

बच्चों को फिजिकल एक्टिविटी के लिए प्रोत्साहित करें

बच्चों के लिए पढ़ाई के साथ खेल-कूद और शारीरिक गतिविधियां भी जरूरी हैं। इसलिए उन्हें केवल स्क्रीन और गेमिंग तक सीमित न रखें। आउटडोर गेम्स, एक्सरसाइज, हॉबी और परिवार के साथ समय बिताने जैसी गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करना गेमिंग पर निर्भरता को कम करने में मदद कर सकता है।

छुट्टियों में भी रखें गेमिंग पर नजर

छुट्टियां या परीक्षा खत्म होने के बाद बच्चे का ज्यादा गेम खेलना सामान्य लग सकता है, लेकिन माता-पिता को यह ध्यान रखना चाहिए कि यह आदत धीरे-धीरे एडिक्शन में न बदल जाए। अगर गेमिंग का समय लगातार बढ़ रहा है और बच्चा बाकी गतिविधियों को छोड़ रहा है, तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए।

कब डॉक्टर से संपर्क करें?

अगर बच्चा गेमिंग कम करने या छोड़ने में असमर्थ हो, बार-बार कोशिश के बावजूद अपनी आदत नियंत्रित न कर पाए, गेम न खेलने पर बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा या आक्रामक हो जाए और उसकी पढ़ाई, स्कूल, नींद, खान-पान, रिश्तों या रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगें, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। ऐसी स्थिति को केवल डांट या समझाने से ठीक करने की कोशिश करने के बजाय उचित मूल्यांकन और जरूरत पड़ने पर प्रोफेशनल ट्रीटमेंट लेना बेहतर है।

डिस्क्लेमर: यह सामग्री केवल सामान्य जागरूकता और शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए है। यह किसी पेशेवर चिकित्सा सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है। यदि आपका बच्चा आक्रामक व्यवहार, गंभीर अवसाद या गेमिंग की लत का सामना कर रहा है, तो चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट से परामर्श लें।