अक्सर हम घर की शांति और सुगंध के लिए नियमित रूप से अगरबत्ती जलाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसका धुआं आपकी सेहत के लिए स्लो प्वाइजन साबित हो सकता है? हाल ही में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक व्यक्ति साल भर से लगातार सिरदर्द और चक्कर आने की समस्या से जूझ रहा था और इसकी मुख्य वजह घर में जलने वाली अगरबत्ती निकली। आर्टेमिस हॉस्पिटल, गुरुग्राम में न्यूरो सर्जरी विभाग के चेयरपर्सन और साइबरनाइफ सेंटर के सह-प्रमुख डॉ. गुप्ता के अनुसार, अगरबत्ती के धुएं में मौजूद महीन कण न केवल फेफड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि हमारे मस्तिष्क (Brain) की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर असर डाल सकते हैं। एक्सपर्ट ने बताया चौंकाने वाला मामला।
डिस्क्लेमर : यह जानकारी केवल सामान्य जागरूकता और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए दी गई है। इसे किसी भी तरह से पेशेवर चिकित्सा सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
साल भर से सिर दर्द और थकान से पीड़ित महिला
डॉक्टर ने बताया एक 42 वर्षीय महिला उनके पास लगातार सिरदर्द, थकान और बीच-बीच में चक्कर आने की शिकायत लेकर आई, परेशानी पिछले एक साल में धीरे-धीरे बढ़ती गई । उसने कानों में कभी-कभी घंटी बजने और खासकर शाम के समय तेज़ सांस लेने के एपिसोड होने की भी बात बताई। डॉक्टरी जांच में कुछ खास पता नहीं चला और डॉक्टरों ने लक्षणों को तनाव या लाइफस्टाइल से जोड़ दिया। डॉक्टर ने इस परेशानी को समझते हुए जब घर के आस-पास के वातावरण के बारे में पूछा तो पता लगा कि महिला कम वेंटिलेशन वाले कमरे में रोज़ अगरबत्ती के धुएं के संपर्क में रहती है।
अगरबत्ती कैसे न्यूरोलॉजिकल परेशानियों को बढ़ाती है?
जब अगरबत्ती जलाई जाती है, तो यह हवा में कई तरह के पदार्थ छोड़ती है, जिनमें सूक्ष्म कण , वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs), कार्बन मोनोऑक्साइड, पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (PAHs) और कुछ मामलों में सैलिसिलेट जैसे रसायन शामिल होते हैं, जिनका उपयोग खुशबू और बाइंडर के रूप में किया जाता है। इसी आखिरी रसायन ने मरीज में समस्या पैदा की, जिसे हम क्रॉनिक सैलिसिलेट इंटॉक्सिकेशन कहते हैं। एक्सपर्ट ने बताया आम तौर पर सुरक्षित मानी जाने वाली चीज़ों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से शरीर पर धीरे-धीरे विषाक्त प्रभाव पड़ सकता है। यह इस बात पर जोर देता है कि जिन मरीजों में लंबे समय तक बिना कारण वाले लक्षण हों, उनके पर्यावरणीय कारणों पर भी ध्यान देना जरूरी है।
अगरबत्ती से होने वाली विषाक्तता क्या है?
क्रॉनिक सैलिसिलेट इंटॉक्सिकेशन एक ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति लंबे समय तक कम मात्रा में सैलिसिलेट के संपर्क में रहता है। यह संपर्क दवाओं जैसे एस्पिरिन या घरेलू उत्पादों जैसे कई तरह की अगरबत्तियां के जरिए हो सकता है। इसका असर नर्वस सिस्टम पर पड़ता है। रिसर्च के मुताबिक सैलिसिलेट न्यूरोट्रांसमीटर को प्रभावित कर सकता हैं, जो मस्तिष्क की कोशिकाओं (न्यूरॉन्स) के बीच संचार में मदद करते हैं। रिसर्च यह भी बताती है कि अगरबत्ती के धुएं के नियमित संपर्क से शिशुओं में मस्तिष्क के विकास में देरी और बुजुर्गों में संज्ञानात्मक क्षमता (कॉग्निटिव परफॉर्मेंस) में कमी या दिमाग की संरचना में बदलाव हो सकता है।
इस रसायन को सांस के जरिए लेना, खासकर बंद या कम हवादार जगहों में लगातार रहने से शरीर में धीरे-धीरे इसके जमाव का कारण बन सकता है, जिसे इंटॉक्सिकेशन कहा जाता है। इसके लक्षण धीरे-धीरे विकसित होते हैं और अक्सर तब तक नजर नहीं आते जब तक ये क्वालिटी ऑफ लाइफ को प्रभावित न करने लगें। रिसर्च में पाया गया कि अधिकतर अगरबत्ती उत्पादों में सैलिसिलेट की मात्रा लगभग 10% से 20% के बीच होती है। जब इन्हें बंद या कम वेंटिलेशन वाले स्थानों पर नियमित रूप से जलाया जाता है, तो इससे निकलने वाले धुएं के कारण यह रसायन शरीर में जमा होने लगता है और विषाक्तता पैदा कर सकता है।
इसके लक्षण क्या हैं?
एक्सपर्ट ने बताया इसके लक्षण लगभग कई बीमारियों से मिलते जुलते होते हैं, इसलिए पहचान करना मुश्किल हो सकता है। आम तौर पर लगातार सिरदर्द, चक्कर, थकान, मतली, कानों में आवाज आना और सांस लेने के असामान्य पैटर्न देखे जा सकते हैं। कुछ मामलों में तंत्रिका तंत्र से जुड़े लक्षण भी दिखाई देते हैं। बच्चों में कभी-कभी दौरे भी हो सकते हैं।
किन लोगों को ज्यादा खतरा?
इस परेशानी से बच्चे, बुजुर्ग और उन लोगों को सबसे ज्यादा खतरा है जिन्हें पहले से सांस या तंत्रिका तंत्र से जुड़ी समस्याएं हैं, ऐसे धुएं के लंबे समय तक संपर्क में आने से ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं।
बचाव कैसे करें?
अगरबत्ती जलाते समय कमरे में अच्छी वेंटिलेशन होना जरूरी है
इसका उपयोग कम और कम समय के लिए करें
ऐसे उत्पाद चुनें जिनमें कम या बिना रसायनों के एडिटिव्स हों
घर के माहौल और इस्तेमाल होने वाले सुगंधित या केमिकल उत्पादों पर ध्यान दें
जरूरी जानकारी
हेल्थ एक्सपर्ट को भी मरीजों का इलाज करते समय उनके घरेलू वातावरण और आदतों के बारे में पूछना चाहिए। कई लोग अनजाने में अपने घर के वातावरण से लंबे समय तक नुकसान झेलते रहते हैं। अगर हम इनडोर पर्यावरणीय प्रभावों को समझें, तो अपने घर को ज्यादा सुरक्षित और स्वस्थ बना सकते हैं।
डिस्क्लेमर : यह जानकारी केवल सामान्य जागरूकता और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए दी गई है। इसे किसी भी तरह से पेशेवर चिकित्सा सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। यदि आपको लगातार सिरदर्द, चक्कर, सांस लेने में परेशानी या अन्य कोई लक्षण महसूस हों, तो तुरंत योग्य डॉक्टर से परामर्श लें। बिना चिकित्सकीय सलाह के किसी भी दवा या उपचार को शुरू या बंद न करें।
