प्रदूषण कम करने पर होती है कमाई

धुआं उगलते कारखानों और जंगलों की कटाई की वजह से करीब 200 साल से दुनिया की अर्थव्यवस्था का पहिया चल रहा है।

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सांकेतिक फोटो।

धुआं उगलते कारखानों और जंगलों की कटाई की वजह से करीब 200 साल से दुनिया की अर्थव्यवस्था का पहिया चल रहा है। लेकिन इसका परिणाम भी हम सभी भुगत रहे हैं। शहरों में तो अब सांस लेना भी मुश्किल हो रहा है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की हालत हर सर्दियों के मौसम में देखी जा सकती है कि लोग धुंध और धुएं से किस तरह परेशान हो जाते हैं।

दूसरी ओर पृथ्वी का फेफड़ा कहे जाने वाले जंगल जल रहे हैं। दुनिया के कई हिस्सों में अक्सर जंगलों की आग की खबर हम देखते और सुनते हैं। इस बीच हम कोरोना विषाणु संक्रमण जैसी महामारी भी देख रहे हैं। इन सब की जड़ में जहरीली गैस का उत्सर्जन भी एक कारण है।

इसका समाधान क्या है? क्या सभी उद्योग धंधों को बंद कर देने चाहिए? लेकिन ऐसा तो नहीं किया जा सकता है क्योंकि दुनिया को चलाना जरूरी है और यह उद्योगों के बिना मुमकिन नहीं है। इसका एक हल यह हो सकता है कि अक्षय ऊर्जा के स्रोतों से उद्योगों को चलाया जाए। इसमें सौर या पवन ऊर्जा का उपयोग किया जा सकता है जिससे कि कोई कार्बन उत्सर्जन नहीं होता है। हालांकि पूरी दुनिया को अक्षय ऊर्जा स्रोत से अभी चलाना मुश्किल है क्योंकि इसमें कई सालों का समय लगेगा। ऐसे में अभी क्या किया जा सकता है?

इसी का एक विकल्प है ‘कार्बन क्रेडिट’। ‘कार्बन क्रेडिट’ एक प्रकार का प्रमाणपत्र है जो कार्बन उत्सर्जन पर दिया जाता है। ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन घटाने के लिए इसे तैयार किया गया है। देश या उद्योग जितना कार्बन उत्सर्जन करेंगे, उतना ही अधिक उनको ऐसे प्रोजेक्ट में खर्च करना हो जो उत्सर्जन को घटाएं। इसका मतलब हुआ कि उत्सर्जन जितना कम होगा, उतना पैसा बचेगा। ‘कार्बन क्रेडिट’ एक तरह से देश या उद्योग को कार्बन उत्सर्जन की भरपाई करते हैं।

आसान भाषा में कहें तो आप जितनी गंदगी फैलाते हैं, उतनी ही मात्रा में सफाई कर दें तो गंदगी होगी ही नहीं। ‘कार्बन क्रेडिट’ के पैसे से कहीं जंगल लगाए जा रहे हैं जो उत्सर्जित गैसों को सोखते हैं। कहीं अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश हो रहा है जो जीवाश्म र्इंधन के इस्तेमाल को घटाती हैं। एक ‘कार्बन क्रेडिट’ का मतलब है कि आपने एक टन कार्बन डाईआॅक्साइड या दूसरी ग्रीन हाउस गैसों को पर्यावरण में जाने से रोका है। जिन देशों या कंपनियों को अपना कार्बन उत्सर्जन घटाना है, वो ‘कार्बन क्रेडिट’ खरीदते हैं।

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