दुनिया भर में टीबी (Tuberculosis) एक ऐसी बीमारी बनी हुई है जो लंबे इलाज के बाद भी शरीर में वापस लौट आती है। इसका सबसे बड़ा कारण है टीबी के बैक्टीरिया (Mycobacterium tuberculosis) की वह अद्भुत क्षमता है जिससे वो हमारी Immunity की नज़रों से बच निकलते हैं। लेकिन आखिर एक सूक्ष्म बैक्टीरिया इंसानी शरीर के इतने जटिल डिफेंस सिस्टम को चकमा कैसे दे देता है? हाल ही में IIT बॉम्बे और कोलकाता के वैज्ञानिकों ने एक साझा शोध में इस गुत्थी को सुलझाया है। वैज्ञानिकों ने पाया कि टीबी के बैक्टीरिया शरीर के भीतर अपनी संरचना को बदल लेते हैं और एक सुप्त अवस्था (Dormant state) में चले जाते हैं, जहां उन पर दवाइयां भी बेअसर हो जाती हैं। यह खोज भविष्य में टीबी के इलाज के नए तरीके विकसित करने और इलाज की अवधि को कम करने में क्रांतिकारी साबित हो सकती है।
रिसर्च से समझें कैसे खुद को बदलकर शरीर से छिपते हैं टीबी के बैक्टीरिया
ट्यूबरकुलोसिस (TB) का कारण बनने वाला बैक्टीरिया Mycobacterium tuberculosis (Mtb) अपने बाहरी फैटी मेम्ब्रेन यानी वसा परत को लगातार बदलता रहता है, जिससे वो इम्यून सिस्टम से बच निकलता है। ये बैक्टीरिया तनाव में भी जिंदा रहता है और शरीर की कोशिकाओं में घुसने का रास्ता बना लेता है। Indian Institute of Technology Bombay के वैज्ञानिकों की एक नई स्टडी में इन बदलावों को पहचानने का तरीका खोजा गया है, जिससे ये समझने में मदद मिल सकती है कि टीबी के बैक्टीरिया मल्टीड्रग-रेजिस्टेंट यानी दवाओं के प्रति प्रतिरोधी क्यों बनते जा रहे हैं।
प्रोटीन नहीं, फैट से होगी पहचान
ये रिसर्च Dr Shobhna Kapoor के नेतृत्व में की गई। उन्होंने बताया कि भारत में टीबी का बोझ ज्यादा है क्योंकि कई मरीज इलाज पूरा नहीं करते, जिससे एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) बढ़ता है और बीमारी दोबारा उभरती है। डॉक्टर शोभना के मुताबिक अब संक्रमण को पहचानने के लिए केवल प्रोटीन नहीं बल्कि बैक्टीरिया के फैट को भी देखा जा सकता है, जिससे मुश्किल मामलों की पहचान आसान हो सकती है।
कैसे बदलता है बैक्टीरिया खुद को
रिसर्च में पाया गया कि टीबी का बैक्टीरिया स्थिर नहीं रहता, बल्कि एक्टिव रहता है। ये निष्क्रिय अवस्थाओं के बीच अपनी संरचना बदलता रहता है। ये बैक्टीरिया तनाव सहन कर पाता है और इम्यून सिस्टम से बच निकलता है जिसकी वजह से ये लंबे समय तक शरीर में बना रहता है। ये रिसर्च Journal of Materials Chemistry B में प्रकाशित हुई है। इसमें एक नई तकनीक का इस्तेमाल किया गया, जिसमें बिना किसी डाई या केमिकल मार्कर के लिक्विड क्रिस्टल के रंग बदलने से बैक्टीरिया में हो रहे बदलावों का पता लगाया जाता है।
टीबी को कंट्रोल करना क्यों मुश्किल
टीबी का बैक्टीरिया एक लेटेंट या डॉर्मेंट अवस्था में चला जाता है जिसमें कोई लक्षण नहीं दिखते, बीमारी फैलती नहीं है लेकिन बैक्टीरिया शरीर में जिंदा रहता है। कमजोर इम्यूनिटी होने जैसे HIV या दूसरा संक्रमण होने पर ये बैक्टीरिया दोबारा एक्टिव हो सकता है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि ज्यादातर एंटीबायोटिक्स केवल एक्टिव बैक्टीरिया पर असर करती हैं, जबकि डॉर्मेंट बैक्टीरिया बच जाते हैं और बाद में दवाओं के प्रति सहनशील (resistant) हो सकते हैं।
सस्ती और आसान जांच की जरूरत
डॉ कपूर के अनुसार, टीबी की पहचान के लिए सस्ती और तेज तकनीक जरूरी है। अभी ज्यादातर टेस्ट में स्पुटम टेस्ट, कल्चर टेस्ट और महंगे इम्यूनोलॉजिकल टेस्ट शामिल हैं। नई तकनीक के जरिए बिना महंगे उपकरण और कोल्ड स्टोरेज के, बड़े स्तर पर जांच संभव हो सकती है।
कोलकाता रिसर्च से समझें कि बैक्टीरिया खुद को कैसे कंट्रोल करते हैं
कोलकाता स्थित JIS Institute of Advanced Studies and Research की Dr Kamakshi Sureka Paul के नेतृत्व में दूसरी रिसर्च में ये समझा गया कि टीबी बैक्टीरिया खुद को कैसे कंट्रोल करता है।
इसमें एक खास सिग्नलिंग मॉलिक्यूल की पहचान की गई, जो बैक्टीरिया की ग्रोथ, सर्वाइवल, संक्रमण फैलाने की क्षमता को कंट्रोल करते हैं। वैज्ञानिकों ने ऐसे कंपाउंड्स भी खोजे हैं जो इस सिस्टम को बाधित कर सकते हैं, जिससे टीबी के इलाज के नए रास्ते खुल सकते हैं।
नई रिसर्च कैसे बेहतर इलाज में कर सकती है मदद
रिसर्चर्स के अनुसार ये खोज एंटी-वायरुलेंस और एंटीमाइक्रोबियल थेरेपी विकसित करने में मदद कर सकती है। डॉ पॉल ने कहा हमें नए टारगेट्स पहचानने और वैकल्पिक इलाज की रणनीतियां विकसित करने की जरूरत है, ताकि टीबी जैसी गंभीर बीमारी पर बेहतर तरीके से काबू पाया जा सके।
डिस्क्लेमर:
यह लेख केवल सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें दी गई जानकारी किसी भी प्रकार की मेडिकल सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है। ट्यूबरकुलोसिस (TB) एक गंभीर संक्रामक बीमारी है, जिसके लक्षण या संदेह होने पर तुरंत योग्य डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से संपर्क करना आवश्यक है। बिना चिकित्सकीय सलाह के किसी भी तरह का इलाज शुरू करना या बीच में छोड़ना खतरनाक हो सकता है और इससे दवा-प्रतिरोधी (Drug-resistant) टीबी का खतरा बढ़ सकता है।
