किसी भी दुर्घटना में हाथ-पैर या शरीर के किसी हिस्से में चोट, दर्द या सूजन होने पर डॉक्टर सबसे पहले एक्स-रे कराने की सलाह देते हैं। एक्स-रे एक प्रकार की अदृश्य विद्युत-चुंबकीय किरण (Electromagnetic Radiation) होती है, जिसकी ऊर्जा सामान्य रोशनी से अधिक होती है। यह शरीर के अंदर तक प्रवेश कर सकती है, इसलिए इसका इस्तेमाल मेडिकल जांच में किया जाता है। हालांकि आज मेडिकल साइंस ने काफी तरक्की कर ली है और अब इलाज व जांच के लिए अल्ट्रासाउंड (Ultrasound) और सीटी स्कैन (CT Scan) जैसी उन्नत तकनीक भी उपलब्ध हैं। अल्ट्रासाउंड हाई-फ्रीक्वेंसी साउंड वेव्स के जरिए शरीर के अंदर के अंगों जैसे लिवर, किडनी, गर्भ आदि की लाइव इमेज दिखाता है जबकि सीटी स्कैन एक्स-रे की मदद से शरीर के अंदर की क्रॉस-सेक्शनल (कट-आउट) तस्वीरें बनाता है, जिससे अंदरूनी चोट या बीमारी का सटीक पता चलता है।
बात करें एक्सरे की तो ये तेज, सस्ता और सबसे सामान्य टेस्ट है। अब सवाल ये उठता है कि बीमारियों का पता लगाने वाली एक्सरे मशीन का निर्माण कब और कहा हुआ और ये कैसे विकसित और उन्नत तकनीक साबित हुई।
कैसे काम करती है एक्सरे मशीन,समझिए इसके पीछे का विज्ञान
एक्स-रे मशीन एक ऐसा उपकरण है जिसका इस्तेमाल शरीर के अंदर की तस्वीरें लेने के लिए किया जाता है। यह खास तरह की उच्च ऊर्जा वाली किरणें (X-rays) शरीर के जिस हिस्से की जांच करनी होती है, वहां डाली जाती हैं। शरीर के अलग-अलग हिस्से इन किरणों को अलग-अलग मात्रा में रोकते हैं। हड्डियां किरणों को ज्यादा रोकती हैं, इसलिए एक्स रे इमेज सफेद दिखाई देती हैं। मांसपेशियां और दूसरे सॉफ्ट उत्तक इसे कम रोकते हैं, इसलिए वे हल्के या धुंधले दिखते हैं। ये किरणें दूसरी तरफ रखे डिटेक्टर या फिल्म पर पड़ती हैं, जिससे अंदर की तस्वीर तैयार हो जाती है। इस तकनीक का इस्तेमाल हड्डी टूटने (Fracture) की जांच, फेफड़ों की जांच, दांतों की जांच करने और कुछ बीमारियों का पता लगाने में किया जाता है।
एक्स-रे का नाम ‘X’ ही क्यों पड़ा?
जब विल्हेम रॉन्टगन ने इन किरणों की खोज की तो उन्हें पता नहीं था कि ये असल में क्या हैं। आपको बता दें कि Mathematics में अज्ञात वस्तु को ‘x’ माना जाता है, इसलिए उन्होंने इसे ‘एक्स-रे’ नाम दिया। रॉन्टगन का निस्वार्थ भाव था इसलिए उन्होंने अपनी इस खोज का पेटेंट नहीं कराया। उनका मानना था कि उनके इस आविष्कार का फायदा पूरी दुनिया को मुफ्त में मिलना चाहिए। इसी वजह से 1901 में उन्हें भौतिकी (Physics) का पहला नोबेल पुरस्कार मिला।
पहली बार एक्स-रे मशीन का आविष्कार कहां और किसने किया
एक्स रे मशीन का अविष्कार साल 1895 में जर्मन वैज्ञानिक Wilhelm Conrad Rontgen ने किया था। इसी खोज के आधार पर बाद में एक्स-रे मशीन विकसित की गई, जो आज चिकित्सा क्षेत्र में बेहद महत्वपूर्ण उपकरण बन चुकी है। बिना चीरा-फाड़ी शरीर के अंदर झांकने वाली पहली इस तकनीक की खोज एक दुर्घटना थी। Roentgen जर्मनी की बुर्ज वर्ग यूनिवर्सिटी (Wurzburg University) में कैथोड किरणों पर शोध कर रहे थे, तभी उन्होंने एक रहस्यमयी चमक देखी जो कार्डबोर्ड के पार जा रही थी। रॉन्टगन ने पहला सफल प्रयोग अपनी पत्नी अन्ना बर्था के हाथ पर किया। जब उन्होंने अपनी पत्नी के हाथ का एक्सरे निकाला, तो उसमें हड्डियों के साथ उनकी शादी की अंगूठी भी साफ नजर आ रही थी। अपनी हड्डियों को देखकर उनकी पत्नी चौंक गई थीं।
एक्सरे से कैंसर की पहचान में कब मिली मदद
एक्स रे मशीन की खोज के एक साल बाद यानी (1896) में ही शिकागो के एमिल ग्रुब्बे (Emil Grubbe) ने ब्रेस्ट कैंसर के इलाज के लिए एक्स-रे का इस्तेमाल किया। आज की आधुनिक रेडियोथेरेपी (Cancer Treatment) इसी सिद्धांत पर आधारित है। उच्च ऊर्जा वाली एक्स-रे किरणों का उपयोग कैंसर कोशिकाओं के डीएनए को नष्ट करने के लिए किया जाता है ताकि वे बढ़ न सकें।
विज्ञान में एक्स रे मशीन कैसे चमत्कार साबित हुई
विज्ञान में एक्सरे मशीन वरदान की तरह साबित हुई। जब एक्स रे मशीन की खोज नहीं हुई थी तो डॉक्टर सिर्फ अंदाजा से और मरीज की स्थिति से बीमारी का पता लगाते थे। इसके अलावा बीमारी का पता लगाने के लिए सर्जरी करते थे, लेकिन एक्सरे मशीन ने टूटी हड्डियों और फेफड़ों की बीमारियों की पहचान आसान की। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान घायल सैनिकों के शरीर से गोली निकालने में एक्स रे मशीन की क्रांतिकारी भूमिका रही है। कैंसर के इलाज में भी इसकी अहम भूमिका रही है। इसी तकनीक ने रेडियोथेरेपी की नींव रखी गई।
एक्स रे से मिलने वाला रेडिएशन कितना खतरनाक है?
एक्स-रे से मिलने वाले रेडिएशन को लेकर डरना स्वाभाविक है, लेकिन विज्ञान और रिसर्च के नजरिए से देखें तो यह उतना डरावना नहीं है जितना अक्सर समझा जाता है। मेडिकल विशेषज्ञों और रेडियोलॉजिस्ट के अनुसार, आधुनिक डिजिटल एक्सरे मशीनों को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वे कम से कम रेडिएशन उत्सर्जित करें। एक नॉर्मल चेस्ट एक्स-रे में उतना ही रेडिएशन मिलता है जितना हम सूरज और वातावरण से 10 दिनों में प्राप्त करते हैं। एक्स-रे से निकलने वाले रेडिएशन को ‘मिलीसीवर्ट’ (mSv) में मापा जाता है। हम हर दिन सूरज और धरती से प्राकृतिक रूप से थोड़ा रेडिएशन सोखते हैं। एक सामान्य एक्स-रे में रेडिएशन की मात्रा इतनी कम होती है कि वह 10 दिन धूप में टहलने के बराबर है।
जब ये किरणें शरीर से गुजरती हैं, तो ये कभी-कभी कोशिकाओं के DNA को मामूली नुकसान पहुंचा सकती हैं लेकिन हमारी बॉडी काफी स्ट्रांग होती है जो इन क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की मरम्मत खुद कर लेती है। परेशानी तब होती है जब रेडिएशन की मात्रा बहुत ज्यादा हो और शरीर उसे ठीक न कर पाए।
आधुनिक तकनीक ने कैसे बदला एक्स रे का रूप
पहले एक्स-रे को फिल्म जैसे कैमरा रील पर उतारा जाता था जिसे डेवलप करने में समय लगता था। लेकिन आधुनिक रिसर्च ने ‘Digital Radiography’ को जन्म दिया। इसमें रेडिएशन का स्तर 50-80% तक कम होता है और तस्वीर तुरंत कंप्यूटर पर दिख जाती है। यह पर्यावरण के लिए भी बेहतर है क्योंकि इसमें रसायनों का इस्तेमाल नहीं होता।
सुरक्षा और सावधानी
X-ray मशीन विज्ञान का वरदान तो है, लेकिन इसका अनियंत्रित उपयोग हानिकारक हो सकता है। X-rays में आयनकारी विकिरण (Ionizing Radiation) होता है जो कई स्थितियों में नुकसान पहुंचा सकता है। गर्भवती महिलाओं को डॉक्टर की सलाह के बिना एक्स रे नहीं कराना चाहिए। डॉक्टर लीड एप्रन (Lead Apron) या शील्ड का उपयोग करते हैं ताकि शरीर के संवेदनशील हिस्सों को रेडिएशन से बचाया जा सके। डॉक्टर के मुताबिक बार-बार एक्सरे कराने से कोशिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है। हमेशा प्रमाणित लैब और रेडियोलॉजिस्ट की देखरेख में ही ये जांच कराएं।
डिस्क्लेमर:
इस लेख में दी गई जानकारी केवल शैक्षणिक और जागरूकता के उद्देश्य से है। यह किसी भी पेशेवर चिकित्सा सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है। शरीर में किसी भी प्रकार की चोट, दर्द या समस्या होने पर स्वयं उपचार करने के बजाय तुरंत किसी प्रमाणित डॉक्टर या रेडियोलॉजिस्ट से संपर्क करें। एक्सरे या अन्य कोई भी जांच केवल चिकित्सक के परामर्श पर ही करानी चाहिए।
