आज चिकित्सा विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि जटिल से जटिल सर्जरी के दौरान मरीज को दर्द का अहसास तक नहीं होता। आधुनिक एनेस्थीसिया की बदौलत ऑपरेशन न सिर्फ दर्द रहित, बल्कि पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित और नियंत्रित हो गए हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि 1846 से पहले, जब एनेस्थीसिया का पहला सफल प्रदर्शन नहीं हुआ था, तब बड़े ऑपरेशन कैसे किए जाते थे? वो दौर चिकित्सा जगत के लिए जितना चुनौतीपूर्ण था, मरीजों के लिए उतना ही पीड़ादायक और साहस से भरा हुआ था। उस समय सर्जरी बिना बेहोशी की दवा के की जाती थी, यानी मरीज पूरी प्रक्रिया के दौरान होश में रहता था और असहनीय दर्द सहता था। उस समय सर्जरी के दौरान मरीज का दर्द कम करने के लिए शराब, अफीम, भांग या बेलाडोना जैसी जड़ी-बूटियां दी जाती थी, जिनका असर सीमित और अनिश्चित होता था।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें दी गई जानकारी किसी भी प्रकार की चिकित्सकीय सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है।
उस दौरान मरीज को हिलने से रोकने के लिए कई बार उसे रस्सियों से बांधा जाता था या अटैंडेंट उसे पकड़कर रखते थे। ऐसे में सर्जनों के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती थी, सर्जरी को जितना हो सके उतनी तेजी और सटीकता से पूरा किया जाए। यही वजह थी कि उस समय के सर्जन अपनी स्पीड के लिए मशहूर थे; कुछ ऑपरेशन तो कुछ ही मिनटों में पूरे कर दिए जाते थे। हालांकि, उस दौर में संक्रमण और स्वच्छता के बारे में जानकारी सीमित थी, इसलिए सर्जरी के बाद जटिलताएं और मृत्यु दर काफी अधिक होती थी। कई बार ऑपरेशन सफल होने के बावजूद मरीज संक्रमण की वजह से जान गंवा देता था।

ऑपरेशन करने के लिए बेहोशी की दवा का कब हुआ इजाद
चिकित्सा इतिहास में बड़ा मोड़ 16 अक्टूबर 1846 को आया जब अमेरिका में पहली बार ईथर (Ether) का इस्तेमाल कर सफल एनेस्थीसिया दिया गया। आधुनिक एनेस्थीसिया का सफल सार्वजनिक प्रदर्शन दंत चिकित्सक विलियम टी.जी. मॉर्टन ने मैसाचुसेट्स जनरल अस्पताल में किया था जहां पर ईथर का उपयोग करके एक मरीज की दर्द रहित सर्जरी करने के लिए बेहोश किया गया था। हालांकि, एनेस्थीसिया के इस्तेमाल के लिए इससे पहले भी 1842 में क्रॉफर्ड लॉन्ग द्वारा प्रयास किए गए थे। इसके बाद क्लोरोफॉर्म जैसे दूसरे एनेस्थेटिक विकसित हुए और धीरे-धीरे सर्जरी का पूरा परिदृश्य बदल गया।
एनेस्थीसिया से पहले कैसे की जाती थी सर्जरी
एनेस्थीसिया से पहले सर्जरी में डॉक्टर की काबिलियत काम आती थी। उस समय एक अच्छे सर्जन की पहचान उसकी काबिलियत से ज्यादा उसकी रफ्तार से मापी जाती थी। उस दौर में सर्जरी जितनी जल्दी खत्म होती थी, मरीज के बचने की संभावना उतनी ही ज्यादा होती थी। सर्जरी जल्दी खत्म होती थी तो खून कम बहता था और शॉक कम लगते थे। उस समय मशहूर सर्जन रॉबर्ट लिस्टन अपनी रफ़्तार के लिए जाने जाते थे। वे महज 2-3 मिनट में अंग विच्छेदन (Amputation) कर देते थे।
रॉबर्ट लिस्टन को उस दौर में “The fastest knife in the West End” कहा जाता था। उनके बारे में एक मशहूर किस्सा है कि वे एक बार केवल 28 सेकंड में एक पैर काटने में सफल रहे थे। उस समय डॉक्टर की फुर्ती इसलिए जरूरी थी क्योंकि एनेस्थीसिया के बिना मरीज को होने वाला ‘सर्जिकल शॉक’ (Surgical Shock) और अत्यधिक रक्तस्राव (Bleeding) ही मौत का सबसे बड़ा कारण बनते थे।
सर्जरी के साफ माहौल की थी कमी
आज के ऑपरेशन थिएटर (OT) की तरह उस समय स्वच्छता (Hygiene) का अभाव था जिसकी वजह से मरीज में संक्रमण बढ़ने का, ज्यादा खून बहने का खतरा ज्यादा रहता था। उस समय डॉक्टर अपने पुराने, खून से सने हुए कोट पहनकर गर्व से सर्जरी करते थे। वे अपने औजारों को साफ करने के बजाय उन्हें अक्सर अपने जूतों पर रगड़कर या थूक से साफ कर लेते थे क्योंकि तब ‘जर्म थ्योरी’ (Germ Theory) की समझ नहीं थी।
मरीज को काबू करने के तरीके थे बेहद कठोर
बिना एनेस्थीसिया के सर्जरी के दौरान मरीज को हिलने से रोकना डॉक्टरों के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती थी। इसीलिए उस समय मरीज को काबू में रखने के तरीके काफी कठोर और परेशान करने वाले थे। सर्जरी टेबल पर मरीज को बांधने के लिए चमड़े के मजबूत पट्टों का इस्तेमाल किया जाता था, ताकि वो दर्द के कारण झटके न ले सके। इसके अलावा, कई बार ताकतवर असिस्टेंट्स को बुलाया जाता था, जो मरीज के हाथ-पैर और शरीर को कसकर पकड़कर रखते थे। कुछ मामलों में मरीज को इतना दबाकर पकड़ा जाता था कि वह हिल भी न सके, क्योंकि सर्जरी के दौरान हल्की-सी हरकत भी जानलेवा साबित हो सकती थी। यह प्रक्रिया न केवल शारीरिक रूप से, बल्कि मानसिक रूप से भी बेहद भयावह होती थी।
‘पेन-मैनेजमेंट’ के देसी और खतरनाक थे तरीके
क्योंकि उस समय बेहोशी की दवा नहीं थी इसलिए डॉक्टर दर्द को कम करने के लिए देसी तरीकों को अपनाते थे। ऑपरेशन के दौरान दर्द को कम करने के लिए मरीज को अफीम और शराब जैसे मादक पदार्थ दिए जाते थे, ताकि वो सुन्न पड़ जाएं। कुछ डॉक्टर ‘मेस्मेरिज्म’ का उपयोग करते थे ताकि मरीज का ध्यान भटकाया जा सके। मेस्मेरिज्म एक पुरानी मनोवैज्ञानिक पद्धति है, जिसे 18वीं सदी में Franz Mesmer ने विकसित किया था। इस अवस्था में व्यक्ति ज्यादा शांत, केंद्रित और सुझावों के प्रति संवेदनशील हो जाता है। उस समय सर्जरी के दौरान दर्द को कम करने के लिए मरीज की बर्फ से सिकाई की जाती थी जिसकी वजह से उसका अंग सुन्न हो जाता था। ये सारी तरकीबे उस समय मरीजों को परेशान करने वाली होती थी।
16 अक्टूबर 1846 चिकित्सा इतिहास का टर्निंग पॉइंट
16 अक्टूबर 1846 का दिन चिकित्सा जगत में एक ऐतिहासिक मोड़ के रूप में दर्ज है, जिसे ‘Ether Day’ के नाम से जाना जाता है। इस दिन William T. G. Morton ने Massachusetts General Hospital में पहली बार सार्वजनिक रूप से ईथर (Ether) का उपयोग कर सफल एनेस्थीसिया का प्रदर्शन किया। इस ऐतिहासिक प्रक्रिया के दौरान मरीज को बेहोश करके सर्जरी की गई, जिससे उसे दर्द का अहसास नहीं हुआ, जो उस समय के लिए एक क्रांतिकारी उपलब्धि थी। इस ऑपरेशन का नेतृत्व सर्जन John Collins Warren ने किया था। डॉक्टर ने सर्जरी सफल होने के बाद दर्शकों से कहा Gentlemen, this is no humbug. यानी यह कोई धोखा नहीं है। यह घटना आधुनिक एनेस्थीसिया युग की शुरुआत मानी जाती है, जिसने सर्जरी को दर्दनाक प्रक्रिया से सुरक्षित और मानवीय चिकित्सा में बदल दिया।
ईथर से अलग-अलग तरह के एनेस्थीसिया का सफर कैसा रहा?
1846 में ईथर (Ether) के इस्तेमाल ने सर्जरी की दुनिया में क्रांति ला दी। इससे पहले ऑपरेशन दर्दनाक और जोखिम भरे होते थे, लेकिन ईथर ने पहली बार मरीज को बेहोश करके दर्द को कंट्रोल करना संभव बनाया। इसके बाद एक के बाद एक एनेस्थीसिया का निर्माण होता रहा। 19वीं सदी के अंत तक क्लोरोफॉर्म और अन्य एनेस्थेटिक दवाओं का इस्तेमाल शुरू हुआ। धीरे-धीरे वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने समझा कि हर सर्जरी के लिए मरीज को पूरी तरह बेहोश करना जरूरी नहीं है इसलिए उन्होंने एनेस्थीसिया की अलग-अलग तकनीकों का विकास शुरू किया।
एनेस्थीसिया को तीन रूपों में किया विकसित
- लोकल एनेस्थीसिया (Local Anesthesia) का इस्तेमाल बॉडी के जिस हिस्से में सर्जरी की जाती थी उसके लिए किया गया। इसमें शरीर के सिर्फ एक छोटे हिस्से को सुन्न किया जाता था, जैसे दांत निकालने या छोटी सर्जरी के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता था। इस एनेस्थीसिया से मरीज पूरी तरह होश में रहता है और रिकवरी जल्दी होती है।
- रीजनल एनेस्थीसिया (Regional Anesthesia) का इस्तेमाल बड़ी सर्जरी करने के लिए किया जाता था। इसका इस्तेमाल महिलाओं में डिलीवरी के लिए किया जाता था जिसमें शरीर के एक बड़े हिस्से जैसे कमर से नीचे के हिस्से को सुन्न किया जाता था। इसमें मरीज का दर्द पूरी तरह खत्म हो जाता है, लेकिन मरीज जागरूक रहता था।
- जनरल एनेस्थीसिया (General Anesthesia) बड़ी सर्जरी के लिए इस्तेमाल होता था जिसमें मरीज को बेहोश कर दिया जाता था। इस एनेस्थीसिया का इस्तेमाल हार्ट या ब्रेन ऑपरेशन के लिए ज्यादा किया जाता था। इसे लगाने से मरीज को कुछ भी महसूस नहीं होता और सर्जरी आसानी से की जा सकती थी।
आज का मॉडर्न एनेस्थीसिया कैसे करता है काम
आज एनेस्थीसिया केवल मरीज को बेहोश करने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक एडवांस्ड और मल्टी-लेयर मेडिकल सिस्टम बन चुका है, जो पूरी सर्जरी के दौरान मरीज की सुरक्षा सुनिश्चित करता है। आधुनिक एनेस्थीसिया में हाई-टेक मॉनिटरिंग डिवाइस का इस्तेमाल होता है, जो मरीज की बॉडी के हर फंक्शन पर नजर रखता हैं। इस डिवाइस की मदद से ऑक्सीजन लेवल (SpO₂), दिल की धड़कन (ECG), ब्लड प्रेशर, सांस लेने की दर और यहां तक कि शरीर में कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर पर भी नजर रखी जाती है। कुछ जटिल सर्जरी में ब्रेन एक्टिविटी तक मॉनिटर की जाती है, ताकि बेहोशी की गहराई सही बनी रहे।
दवा के डोज का रखा जाता है ख्याल
अभी सर्जरी के लिए एनेस्थीसिया के डोज का भी ध्यान रखा जाता है। दवाओं की डोज़ मरीज की उम्र, वजन, मेडिकल हिस्ट्री और सर्जरी के प्रकार को ध्यान में रखते हुए दी जाती है ताकि जोखिम कम से कम और रिकवरी फास्ट हो। प्रशिक्षित एनेस्थेटिस्ट की निगरानी में ये डोज दिया जाता है जो सर्जरी के दौरान मरीज की सांस, दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर पर लगातार नजर रखता हैं।
डिस्क्लेमर
यह लेख केवल सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें दी गई जानकारी किसी भी प्रकार की चिकित्सकीय सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है। एनेस्थीसिया या किसी भी सर्जरी से जुड़ा निर्णय लेने से पहले अपने डॉक्टर या योग्य एनेस्थेटिस्ट से परामर्श अवश्य लें। हर मरीज की स्थिति अलग होती है, इसलिए उपचार और प्रक्रिया व्यक्ति विशेष के अनुसार तय की जाती है।
