अक्सर लोग दिल की सेहत की बात आते ही सिर्फ कोलेस्ट्रॉल पर ध्यान देते हैं, लेकिन रक्त में मौजूद दूसरा फैट ट्राइग्लिसराइड्स (Triglycerides) भी उतना ही बड़ा ‘साइलेंट किलर’ है। जब खून में ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर बढ़ता है, तो यह धमनियों को सख्त और मोटा कर देता है (Atherosclerosis), जिससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। मैं  डॉ. रंजन शेट्टी,स्पर्श हॉस्पिटल, बेंगलुरु में लीड कार्डियोलॉजिस्ट एवं मेडिकल डायरेक्टर के पद पर काम करता हूं। हाल ही मेरे पास 35 साल की एक आईटी प्रोफेशनल प्रिया (बदला हुआ नाम) का मामला सामने आया।

प्रिया का वर्क फ्रॉम होम के दौरान वजन कुछ बढ़ गया था। देर रात खाना खाना, कम शारीरिक गतिविधि और अनियमित दिनचर्या उनकी आदत बन चुकी थी। उन्हें न डायबिटीज थी, न हाई ब्लड प्रेशर। उनका LDL यानी खराब  कोलेस्ट्रॉल भी सिर्फ 120 mg/dL था, जो आदर्श स्तर से थोड़ा ही ऊपर था। इसलिए उन्हें लगा कि सब कुछ नॉर्मल है। लेकिन वार्षिक हेल्थ चेकअप में उनके ट्राइग्लिसराइड्स (Triglycerides) की मात्रा 350 mg/dL निकली, जबकि सामान्य स्तर 150 mg/dL से कम माना जाता है। यहीं से उनकी परेशानी शुरू हुई। आपको बता दूं कि केवल LDL नहीं, बल्कि बढ़ा हुआ ट्राइग्लिसराइड्स भी दिल की बीमारी और हार्ट अटैक का खतरा काफी बढ़ा सकता हैं। भारत में अक्सर लोग कोलेस्ट्रॉल की जांच पर ध्यान देते हैं, लेकिन ट्राइग्लिसराइड्स को नजरअंदाज कर देते हैं। जबकि कई भारतीयों में यही मेटाबॉलिज्म बिगड़ने का पहला संकेत होता है।

ट्राइग्लिसराइड्स क्या हैं?

ट्राइग्लिसराइड्स शरीर में मौजूद सबसे सामान्य प्रकार का वसा (Fat) है। यह शरीर के लिए ऊर्जा का भंडार होता है। भोजन के बाद जितनी कैलोरी तुरंत इस्तेमाल नहीं होती, खासकर चीनी, रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट और शराब से मिलने वाली अतिरिक्त कैलोरी, उसे लिवर ट्राइग्लिसराइड्स में बदल देता है। बाद में जरूरत पड़ने पर शरीर इन्हें ऊर्जा के रूप में इस्तेमाल करता है। समस्या तब शुरू होती है, जब शरीर लगातार जितनी कैलोरी खर्च करता है, उससे ज्यादा लेता है। मीठे पेय, मिठाइयां, रिफाइंड आटा, पॉलिश चावल और बैठे रहने वाले लाइफस्टाइल के कारण लिवर लगातार अतिरिक्त ग्लूकोज को ट्राइग्लिसराइड्स में बदलता रहता है। धीरे-धीरे ये रक्त में जमा होने लगता हैं और मेटाबॉलिज्म पर दबाव बढ़ने लगता है। यही वजह है कि कम तेल खाने वाले लोगों में भी ट्राइग्लिसराइड्स बढ़ सकता हैं। इसके पीछे अक्सर ज्यादा चीनी और अतिरिक्त कैलोरी जिम्मेदार होती है, केवल तेल या घी नहीं।

हाई ट्राइग्लिसराइड्स से क्या खतरे हैं?

लगातार बढ़े हुए ट्राइग्लिसराइड्स का संबंध इंसुलिन रेजिस्टेंस, फैटी लिवर, मोटापा और टाइप-2 डायबिटीज से है। ये रक्त में ऐसे कोलेस्ट्रॉल कणों की संख्या बढ़ाते हैं, जो धमनियों में प्लाक बनने का खतरा बढ़ाते हैं। यदि ट्राइग्लिसराइड्स 500 mg/dL से ऊपर पहुंच जाएं, तो Acute Pancreatitis जैसी गंभीर स्थिति का जोखिम भी बढ़ जाता है। ये ब्लड में कोलेस्ट्रॉल से भरपूर कणों की संख्या बढ़ाकर और छोटे, घने LDL कणों के बनने को बढ़ावा देकर दिल की बीमारियों का खतरा भी बढ़ाता हैं। ये कण धमनियों की दीवारों में घुसकर प्लाक बना सकते हैं। बहुत ज़्यादा लेवल आमतौर पर 500 mg/dL से ज़्यादा एक्‍यूट पैंक्रियाटाइटिस का खतरा बढ़ाते हैं, जो पैंक्रियाज में होने वाली सूजन है और जानलेवा हो सकती है।

भारतीयों में खतरा ज्यादा क्यों?

आजकल भारतीयों में यहां तक कि कम उम्र के लोगों में भी 200 से 300 mg/dL के बीच ट्राइग्लिसराइड का लेवल आम होता जा रहा है। इसमें हमारे जीन की भी भूमिका होती है, लेकिन बहुत कम मरीज़ों में ट्राइग्लिसराइड का लेवल मुख्य रूप से जेनेटिक कारणों से होता है। ज्यादातर लोगों में ट्राइग्लिसराइड बढ़ने का मुख्य कारण खराब लाइफस्टाइल, वजन बढ़ना, शारीरिक रूप से सक्रिय न होना, बहुत ज्यादा चीनी खाना, रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट और इंसुलिन रेजिस्टेंस हैं। पश्चिमी देशों के लोगों की तुलना में भारतीयों में कम वजन होने पर भी मेटाबोलिक गड़बड़ियां हो सकती हैं। हम भारतीयों में पेट के आस-पास फैट जमा हो जाता है, इंसुलिन रेजिस्टेंस जल्दी हो जाता है, और डायबिटीज का पता चलने से बहुत पहले ही लिवर ज्यादा ट्राइग्लिसराइड बढ़ने लगता है। इसलिए हो सकता है कि कोई व्यक्ति देखने में बस थोड़ा सा ज़्यादा वज़न वाला लगे, लेकिन उसे दिल की बीमारी का काफी ज़्यादा खतरा हो।

अच्छी बात यह है कि ट्राइग्लिसराइड्स को कम किया जा सकता है। ट्राइग्लिसराइड्स उन ब्लड मार्कर्स में शामिल हैं, जिनमें सही लाइफस्टाइल अपनाने पर तेजी से सुधार देखा जा सकता है। ट्राइग्लिसराइड को कंट्रोल करने के लिए डाइट में चीनी, मिठाइयां और मीठे ड्रिंक का सेवन कम करना जरूरी है। रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट की जगह साबुत अनाज, दालें और सब्जियां खाना भी जरूरी है। पर्याप्त प्रोटीन और हेल्दी फैट का सेवन ट्राइग्लिसराइड कंट्रोल करने में मदद करता है। रोजाना नियमित व्यायाम करना फायदेमंद माना जाता है। शरीर के वजन का 5–10% भी कम करने से ट्राइग्लिसराइड्स में कमी आ सकती है। रात के खाने से लेकर अगले दिन सुबह के भोजन के बीच 12 घंटों का अंतर भी फायदा पहुंचाता है। प्रिया ने भी यही किया। उन्होंने रोजाना पैदल चलना शुरू किया, मीठे और प्रोसेस्ड स्नैक्स कम किए, वजन घटाया और कुछ ही समय में उनके ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर लगातार नीचे आने लगा।

ट्राइग्लिसराइड्स को कैसे करें रिवर्स

नियमित व्यायाम मांसपेशियों को ट्राइग्लिसराइड्स को ऊर्जा के रूप में उपयोग करने में मदद करता है, बजाय इसके कि वे रक्त परिसंचरण में बने रहें। थोड़ा सा भी वजन कम करने से इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार होता है और लिवर द्वारा ट्राइग्लिसराइड्स का उत्पादन कम होता है। कई रोगियों में, ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर कुछ ही हफ्तों में सुधरने लगता है। जितनी जल्दी हम इसे कम करने पर काम करते हैं उतनी जल्दी ही इसे रिवर्स कर सकते हैं। प्रिया के लिए, नियमित हेल्थ चेकअप सिर्फ एक रिपोर्ट कार्ड से कहीं अधिक था। डायबिटीज या हृदय रोग विकसित होने का इंतजार करने के बजाय, उसने रोजाना चलना शुरू किया, मीठे खाद्य पदार्थों और प्रसंस्कृत स्नैक्स का सेवन काफी कम कर दिया, वजन कम किया और अपने ट्राइग्लिसराइड्स के स्तर को लगातार घटते हुए देखा। शरीर के वजन का 5-10% कम करने से भी ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर काफी कम हो सकता है। अधिकांश लोगों के लिए जीवनशैली ही उपचार का प्राथमिक उपाय है। हालांकि, अगर डाइट और व्यायाम के बावजूद ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर अधिक रहता है, या ये स्तर 500 mg/dL से ऊपर है, तो दवा की आवश्यकता हो सकती है।

डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी जांच रिपोर्ट या उपचार से संबंधित निर्णय लेने से पहले अपने डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।

(डॉ. रंजन शेट्टी, लीड कार्डियोलॉजिस्ट एवं मेडिकल डायरेक्टर, स्पर्श हॉस्पिटल, बेंगलुरु)