जिंदगी में जिस चीज की चाहत हो और वह हासिल हो जाए, तो इसे खुशकिस्मती ही कहा जाता है। आमतौर पर माना जाता है कि कामयाबी हासिल करने के बाद व्यक्ति खुद को खुश और भाग्यशाली महसूस करता है। लेकिन 27 साल के आरव के साथ कहानी कुछ अलग थी। आरव एक छोटे शहर का रहने वाला था। उसका सपना था कि वह मुंबई यानी मायानगरी में किसी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में काम करें, अच्छी कमाई करे और अपने लिए एक बेहतर मुकाम बनाए। मेहनत और लगन से उसने अपना यह सपना पूरा भी कर लिया। पढ़ाई पूरी करने के बाद कॉलेज प्लेसमेंट के जरिए उसे मुंबई की एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिल गई।

अगले दो-तीन सालों में आरव के काम की खूब सराहना हुई और उसे प्रमोशन देकर पूरी टीम की जिम्मेदारी सौंपी गई। उसकी सैलरी भी अच्छी हो चुकी थी। यानी जिन चीजों को हासिल करने का उसने कभी सपना देखा था, उनमें से ज्यादातर अब उसकी जिंदगी का हिस्सा थीं। इसके बावजूद आरव खुद को पूरी तरह खुश और संतुष्ट महसूस नहीं कर पा रहा था। उसके मन में एक तरह का खालीपन और उदासी बनी रहती थी। कामयाबी मिलने के बाद भी उसे पहले जैसी खुशी महसूस नहीं होती थी। कई बार वह सोचता कि “जब मेरी जिंदगी में वह सबकुछ है, जिसकी मैंने कभी इच्छा की थी, तो फिर मैं खुश क्यों नहीं हूं?

आरव की स्थिति को देखकर इसे डिप्रेशन या बर्नआउट कहना सही नहीं होगा। सफलता के बाद भी संतुष्टि महसूस न होने के पीछे लगातार काम का दबाव, बहुत अधिक अपेक्षाएं और बार-बार नए लक्ष्य तय करना जैसे कई कारण हो सकते हैं। मनोविज्ञान में इस प्रक्रिया को हेडोनिक एडेप्टेशन (Hedonic Adaptation) कहा जाता है। यह एक सामान्य मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें समय के साथ व्यक्ति नई परिस्थितियों और उपलब्धियों का आदी हो जाता है और पहले जैसी खुशी कम महसूस होने लगती है। दिमाग और दिल के इस खेल को मिर्ज़ा ग़ालिब के इस शेर से भी समझा जा सकता है—

“हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमाँ लेकिन फिर भी कम निकले।”

आसान शब्दों में कहें तो इंसान की इच्छाएं इतनी ज्यादा होती हैं कि एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। कई ख्वाहिशें पूरी होने के बावजूद उसे लगता रहता है कि अभी भी बहुत कुछ हासिल करना बाकी है। आरव की स्थिति भी कुछ ऐसी ही नजर आती है, जहां एक बड़ी कामयाबी हासिल करने के बाद भी उसे पहले जैसी खुशी और संतुष्टि महसूस नहीं हो रही। आइए आरव की मानसिक स्थिति को और ज्यादा बेहतर तरीके से समझने के लिए मनोचिकित्सक की सलाह लेते हैं।

क्या है हेडोनिक अडॉप्टेशन?

फोर्टिस हॉस्पिटल, शालीमार बाग, दिल्ली में डायरेक्टर ऑफ एकेडमिक, अदायु माइंडफुलनेस में हेड ऑफ डिपार्टमेंट और वरिष्ठ कंसल्टेंट मनोचिकित्सक डॉ. विशाल छाबड़ा से जब हमने आरव की स्थिति को साझा किया तो उन्होंने जनसत्ता को बताया कि हेडोनिक अडॉप्टेशन एक सामान्य मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। इसमें किसी उपलब्धि, नई चीज या खुशी देने वाले अनुभव के बाद शुरुआत में व्यक्ति को बहुत उत्साह और खुशी महसूस होती है, लेकिन कुछ समय बाद दिमाग उस नई परिस्थिति का आदी होने लगता है। इसके बाद वही चीज सामान्य लगने लगती है और शुरुआती उत्साह कम हो जाता है।

नई चीज मिलने पर खुशी ज्यादा क्यों होती है?

जब हम किसी लक्ष्य को पाने की योजना बनाते हैं, तो उसे हासिल करने की उम्मीद और उससे जुड़ी उत्सुकता हमें प्रेरित करती है। उदाहरण के लिए, नई बाइक या कार खरीदने से पहले उसे लेकर काफी उत्साह रहता है। लेकिन उसे पाने और कुछ समय इस्तेमाल करने के बाद वह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाती है और उसका रोमांच कम हो जाता है।

ब्रेन का रिवार्ड सिस्टम इससे कैसे जुड़ा है?

हेडोनिक अडॉप्टेशन में ब्रेन का रिवार्ड सिस्टम और किसी अनुभव से मिलने वाली खुशी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। किसी नई या अपेक्षित चीज को पाने की प्रक्रिया में उत्साह महसूस होता है। समय के साथ जब वही अनुभव परिचित हो जाता है, तो उसकी नवीनता कम हो जाती है और वह पहले की तरह रोमांचक महसूस नहीं होता।

आज के समय में हेडोनिक अडॉप्टेशन क्यों ज्यादा महसूस होता है?

आज तकनीक और ऑनलाइन सेवाओं की वजह से कई चीजें बहुत तेजी से उपलब्ध हो जाती हैं। यात्रा की टिकट से लेकर खरीदारी और मनोरंजन तक, बहुत कुछ एक ही क्लिक में मिल जाता है। लगातार नई चीजें और अनुभव जल्दी-जल्दी मिलने से नवीनता का एहसास भी जल्दी खत्म हो सकता है।

क्या नई नौकरी और प्रमोशन भी सामान्य लगने लगते हैं?

नई नौकरी, प्रमोशन, ज्यादा सैलरी, नई कार या घर जैसी उपलब्धियां शुरुआत में काफी खुशी दे सकती हैं, लेकिन समय के साथ व्यक्ति उनकी नई परिस्थिति का आदी हो सकता है। जो चीज पहले बड़ी उपलब्धि लग रही थी, वही बाद में रोजमर्रा की जिंदगी का सामान्य हिस्सा लगने लगती है।

क्या रिश्तों में भी हेडोनिक अडॉप्टेशन होता है?

हेडोनिक अडॉप्टेशन रिश्तों में भी दिखाई दे सकता है। शादी या किसी नए रिश्ते की शुरुआत में उत्साह और आकर्षण अधिक महसूस हो सकता है, लेकिन समय के साथ साथी की मौजूदगी सामान्य लगने लगती है। इसका मतलब हमेशा यह नहीं होता कि प्यार खत्म हो गया है। रिश्ते में साथ समय बिताना, नई गतिविधियां करना और एक-दूसरे को महत्व देना जुड़ाव को बनाए रखने में मदद कर सकता है।

हेडोनिक अडॉप्टेशन और डिप्रेशन-एंग्जायटी में क्या अंतर है?

हेडोनिक अडॉप्टेशन अपने आप में कोई मानसिक बीमारी नहीं है। इसमें खुशी देने वाली किसी उपलब्धि या अनुभव का शुरुआती उत्साह समय के साथ सामान्य स्तर पर आ सकता है। वहीं एंग्जायटी में लगातार चिंता, बेचैनी या घबराहट जैसी समस्याएं हो सकती हैं और डिप्रेशन में लंबे समय तक उदासी, रुचि या आनंद में कमी समेत कई लक्षण दिखाई दे सकते हैं। इसलिए केवल किसी उपलब्धि के बाद उत्साह कम होने को डिप्रेशन या एंग्जायटी नहीं माना जाना चाहिए।

क्या हेडोनिक अडॉप्टेशन नुकसानदायक है?

डॉक्टर विशाल छाबरा ने बताया हेडोनिक अडॉप्टेशन दिमाग की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है और इसका उद्देश्य केवल खुशी को खत्म करना नहीं है। अगर हर उपलब्धि का उत्साह हमेशा एक जैसा बना रहता है तो व्यक्ति नई चीजों या लक्ष्यों की ओर बढ़ने के लिए उतना प्रेरित नहीं होता। हालांकि, लगातार सिर्फ नई चीजों से खुशी पाने की कोशिश करना समस्या पैदा कर सकता है।

हर समय खुश रहने की कोशिश क्यों सही नहीं?

इंसान हर समय एक जैसी खुशी या उत्साह महसूस नहीं कर सकता। किसी उपलब्धि के बाद खुशी का सामान्य स्तर पर लौट आना स्वाभाविक हो सकता है। समस्या तब हो सकती है जब व्यक्ति लगातार उसी उत्साह को दोबारा महसूस करने के लिए नई चीजें, खरीदारी या अनुभव तलाशता रहे और अपनी संतुष्टि को केवल बाहरी उपलब्धियों से जोड़ दे।

हेडोनिक अडॉप्टेशन को समझना क्यों जरूरी है?

हेडोनिक अडॉप्टेशन को समझने से यह महसूस करने में मदद मिल सकती है कि किसी उपलब्धि के कुछ समय बाद उसका सामान्य लगने लगना जरूरी नहीं कि जीवन में कोई बड़ी समस्या है। खुशी के उतार-चढ़ाव सामान्य हैं। इसलिए हर समय उत्साह महसूस करने के बजाय उपलब्धियों के साथ-साथ रिश्तों, रोजमर्रा के अनुभवों और जीवन के दूसरे महत्वपूर्ण पहलुओं पर भी ध्यान देना जरूरी है।

डिस्क्लेमर : यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से दी गई है। यह किसी भी प्रकार के चिकित्सीय या मनोवैज्ञानिक उपचार का विकल्प नहीं है। यदि आप या आपका कोई परिचित लंबे समय से मानसिक तनाव, बर्नआउट या डिप्रेशन का सामना कर रहा है, तो तुरंत किसी प्रमाणित मनोचिकित्सक या काउंसलर से परामर्श अवश्य लें।