दिल के रोगों का खतरा दिनो दिन बढ़ता जा रहा है। साइलेंट किलर ये डिजीज कब दिल की धड़कनों को धीमा कर देता है लोगों को अंदाजा तक नहीं होता। पिछले कुछ सालों में दिल के रोगों का खतरा बढ़ा है। खराब डाइट, बिगड़ता  लाइफस्टाइल, तनाव, समोकिंग की आदत तेजी से कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड बढ़ा रहा है जो दिल के रोगों का कारण बनता है। आज के समय में हार्ट की बीमारी दुनिया भर में मौत की सबसे बड़ी वजह बन चुकी है। सबसे खतरनाक बात यह है कि ये बीमारी अचानक हो सकती है और कई बार इसके लक्षण पहले से साफ नजर भी नहीं आते। इसी वजह से लोग चाहते हैं कि रूटीन चेकअप में ही ये साफ हो जाए कि उनका दिल स्वस्थ है या नहीं।

एम्स के पूर्व कंसल्टेंट और साओल हार्ट सेंटर के फाउंडर एंड डायरेक्टर और प्रसिद्ध कार्डियोलॉजिस्ट डॉक्टरबिमल छाजर के मुताबिक दिल की हेल्थ का पता लगाने के लिए बाजार में बहुत सारे टेस्ट मौजूद हैं, लेकिन कौन से टेस्ट ज्यादा जरूरी हैं जो आसानी से बीमारी का पता लगा सकते हैं उनके बारे में जानना जरूरी है। अक्सर लोग डॉक्टर के पास जाकर कंफ्यूज हो जाते हैं कि कौन से टेस्ट कराएं और कौन से नहीं कराएं। आइए एक्सपर्ट से जानते हैं कि दिल की बीमारी की असली वजह क्या है और इस बीमारी का पता लगाने के लिए कौन-कौन से टेस्ट कराना जरूरी होता है।

 हार्ट की बीमारी में असली समस्या क्या होती है?

हार्ट डिजीज की जड़ में एक ही बड़ी समस्या होती है वो है धमनियों में ब्लॉकेज। यह ब्लॉकेज अचानक नहीं बनती, बल्कि सालों में धीरे-धीरे विकसित होती है। इसका सबसे बड़ा कारण शरीर में जमा फैट होता है। इस फैट को हम मेडिकल भाषा में कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड कहते हैं। जब ये दोनों बढ़ते हैं, तो धीरे-धीरे हार्ट की धमनियां संकरी होने लगती हैं और ब्लड फ्लो रुकने लगता है। इस फैट का पता लगाने के लिए जरूरी है कि कुछ खास टेस्ट कराएं जाए जो हमें हमारे दिल की सटीक जानकारी दें।

पहला और बुनियादी टेस्ट लिपिड प्रोफाइल है

हार्ट की जांच का सबसे पहला और जरूरी कदम है लिपिड प्रोफाइल टेस्ट है। यह एक साधारण ब्लड टेस्ट होता है, जिसमें टोटल कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड, एलडीएल और एचडीएल की जानकारी मिलती है। भले ही रिपोर्ट में कोलेस्ट्रॉल की नॉर्मल रेंज 130 से 200 लिखी हो, लेकिन 150 से ऊपर जाना हार्ट के लिए सही नहीं माना जाता। अगर कोलेस्ट्रॉल 130 के आसपास और ट्राइग्लिसराइड 100 के आसपास हैं तो हार्ट ब्लॉकेज का खतरा काफी कम हो जाता है। लेकिन जैसे-जैसे ये स्तर बढ़ता हैं, वैसे-वैसे हार्ट अटैक और ब्लॉकेज का रिस्क भी बढ़ता चला जाता है।

दूसरा और सबसे जरूरी टेस्ट सीटी कोरोनरी एंजियोग्राफी

सीटी कोरोनरी एंजियोग्राफी आज के समय में हार्ट की जांच का सबसे भरोसेमंद तरीका माना जाता है। यह टेस्ट साफ-साफ बता देता है कि हार्ट की धमनियों में कितनी प्रतिशत ब्लॉकेज है, चाहे वह 10% हो, 40% हो या 90%। इस टेस्ट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें तार नहीं डाली जाती और न ही मरीज को भर्ती होने की जरूरत होती है। कुछ ही मिनटों में पूरी रिपोर्ट मिल जाती है, जिससे यह तय करना आसान हो जाता है कि सिर्फ लाइफस्टाइल सुधार से काम चलेगा या इलाज की जरूरत है।

हमारे देश में सैकड़ों जगहों पर सीटी कोरोनरी एंजियोग्राफी की सुविधा उपलब्ध है। बड़े शहरों के अलावा अब छोटे शहरों में भी यह टेस्ट आसानी से हो रहा है। अलग-अलग अस्पतालों में इसकी कीमत अलग-अलग हो सकती है, लेकिन ये टेस्ट हार्ट की असली स्थिति समझने में सबसे ज्यादा मददगार है।

तीसरा टेस्ट है इकोकार्डियोग्राफी

इकोकार्डियोग्राफी से हार्ट की संरचना और पंपिंग की जानकारी मिलती है। इससे पता चलता है कि हार्ट की मांसपेशियां सही तरह से काम कर रही हैं या नहीं, हार्ट वाल्व में कोई खराबी तो नहीं है और हार्ट की पंपिंग कमजोर तो नहीं हो गई। कई बार ऐसा होता है कि ब्लॉकेज नहीं होती, लेकिन फिर भी हार्ट कमजोर हो जाता है। ऐसी स्थिति को पहचानने में इको टेस्ट बहुत उपयोगी होता है।

तार वाली एंजियोग्राफी से क्यों सावधान रहना चाहिए

रूटीन चेकअप में तार वाली एंजियोग्राफी कराने की जरूरत नहीं होती। यह एक इनवेसिव प्रक्रिया है और कई बार इसके बाद मरीज पर तुरंत एंजियोप्लास्टी या बाईपास का दबाव बनाया जाता है। जबकि मरीज सिर्फ यह जानना चाहता है कि ब्लॉकेज है या नहीं। इसलिए जब तक ऑपरेशन की पक्की जरूरत न हो, तब तक इस टेस्ट से बचना ही बेहतर माना जाता है।

निष्कर्ष

अगर आप सच में जानना चाहते हैं कि आपका हार्ट स्वस्थ है या नहीं, तो ये तीन टेस्ट लिपिड प्रोफाइल, सीटी कोरोनरी एंजियोग्राफी और इकोकार्डियोग्राफी काफी हैं । इन टेस्ट से हार्ट की फैट स्थिति, ब्लॉकेज और पंपिंग तीनों की पूरी तस्वीर सामने आ जाती है। इससे न सिर्फ सही इलाज का रास्ता तय होता है, बल्कि अनावश्यक डर और जल्दबाजी में कराए जाने वाले ऑपरेशन से भी बचा जा सकता है।

डिस्क्लेमर

यह स्टोरी सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार की गई है। किसी भी तरह के स्वास्थ्य संबंधी बदलाव या डाइट में परिवर्तन करने से पहले अपने डॉक्टर की सलाह जरूर लें।

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