हाई कोलेस्ट्रॉल ऐसी समस्या है जो खुद आने का कोई संकेत नहीं देती। इसके बढ़ने से न दर्द, न बुखार और न ही ऐसा कोई लक्षण दिखता जो इंसान को सोचने पर मजबूर करें। साइलेंट किलर के नाम से अपनी पहचान बनाने वाली ये बीमारी खामोश है लेकिन बेहद खतरनाक मानी जाती है। सालों तक व्यक्ति खुद को बिल्कुल ठीक महसूस करता रहता है, जबकि अंदर ही अंदर उसकी नसों में नुकसान होता रहता है।

यशोदा हॉस्पिटल्स, हैदराबाद के सीनियर कंसल्टेंट जनरल फिज़िशियन डॉ. के. सेशी किरण के मुताबिक हाई कोलेस्ट्रॉल को साइलेंट कंडीशन कहा जाता है क्योंकि आमतौर पर इसके लक्षण तब तक सामने नहीं आते, जब तक इससे जुड़ी जटिलताएं विकसित न हो जाएं। कोलेस्ट्रॉल हमारी बॉडी का दुश्मन नहीं है बल्कि सच्चाई ये है कि ये शरीर को कोशिकाएं बनाने और हार्मोन बनाने में मदद करता है।

समस्या तब शुरू होती है जब खून में LDL यानी खराब कोलेस्ट्रॉल की मात्रा जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती है। ये खराब कोलेस्ट्रॉल नसों की दीवारों पर चिपकने लगता है, जिससे धीरे-धीरे नसें संकरी होती जाती हैं। नसों के संकरा होने से ब्लड फ्लो कम होने लगता है, दिल पर ज्यादा दबाव पड़ने लगता है और एक दिन अचानक हार्ट अटैक या स्ट्रोक हो जाता है।

भारत में कोलेस्ट्रॉल कैसे बन रहा है परेशानी?

दुनियाभर में दिल की बीमारियों के लगभग एक-तिहाई मामलों का सीधा संबंध हाई कोलेस्ट्रॉल से माना जाता है। दिल की बीमारी आज भी दुनिया में मौत का सबसे बड़ा कारण है। भारत में कोलेस्ट्रॉल के मामले जिस तरह बढ़ रहे हैं वो चिंताजनक है। एक रिसर्च के मुताबिक भारत में 25 से 30% वयस्कों में लिपिड डिसऑर्डर या हाई कोलेस्ट्रॉल पाया जाता है। कुछ शहरों में यह आंकड़ा इससे भी ज्यादा है। पहले ग्रामीण इलाकों में यह समस्या कम मानी जाती थी, लेकिन बदलते लाइफस्टाइल और खानपान के चलते वहां भी तेजी से ये बीमारी बढ़ रही है। डराने वाली बात ये है कि भारत में अब 30 से 40 की उम्र के लोग ICU पहुंच रहे हैं, वो भी बिना यह जाने कि वे किसी जोखिम में थे।

लिपिड डिसऑर्डर क्या है और क्यों बन रहा है यह बड़ा खतरा?

लिपिड डिसऑर्डर (Dyslipidemia) उस स्थिति को कहा जाता है, जब खून में मौजूद फैट्स यानी लिपिड्स का संतुलन बिगड़ जाता है। इसमें सिर्फ एक ही नहीं, बल्कि कोलेस्ट्रॉल से जुड़ी कई गड़बड़ियां शामिल हो सकती हैं जैसे

  • LDL कोलेस्ट्रॉल का बढ़ जाना
  • HDL कोलेस्ट्रॉल का कम हो जाना
  • ट्राइग्लिसराइड्स का बढ़ जाना
  • कुल कोलेस्ट्रॉल का सामान्य से ज्यादा होना

किन लोगों को है हाई कोलेस्ट्रॉल का खतरा

लोगों में मिथ है कि कोलेस्ट्रॉल मोटे लोगों में होता है जो पूरी तरह गलत है। पतले और एक्सरसाइज करने वाले लोगों में भी खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है। इसके लिए कुछ जेनेटिक्स कारण, तनाव, नींद की कमी, स्मोकिंग और रोज़मर्रा का जंक या प्रोसेस्ड खाना जिम्मेदार होता है।

हाई कोलेस्ट्रॉल की पहचान कैसे करें?

ज्यादातर लोगों को हाई कोलेस्ट्रॉल का पता रूटीन ब्लड टेस्ट से ही चलता है। खासतौर पर जिन लोगों के परिवार में दिल के रोगों की हिस्ट्री है, डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर है, मोटापा या स्मोकिंग की आदत है और लाइफस्टाइल काफी सुस्त है ऐसे लोगों को कोलेस्ट्रॉल बढ़ने का खतरा ज्यादा रहता है। बहुत ज्यादा कोलेस्ट्रॉल में कभी-कभी आंखों के आसपास या त्वचा पर फैटी डिपॉजिट दिख सकता हैं, लेकिन ये लक्षण दुर्लभ होते हैं।

कितनी बार जांच जरूरी है?

  • 20 की उम्र के बाद एक बेसलाइन कोलेस्ट्रॉल टेस्ट कराएं। अगर सब नॉर्मल हो, तो हर 4–6 साल में एक बार ये टेस्ट जरूर कराएं।
  • 40 की उम्र के बाद या हाई रिस्क वालों को साल में एक बार जांच जरूर कराना चाहिए।

कोलेस्ट्रॉल को कैसे कंट्रोल करें?

सही डाइट, नियमित एक्सरसाइज, स्मोकिंग से दूरी, अच्छी नींद और वजन कंट्रोल करने से कोलेस्ट्रॉल काफी हद तक सुधर सकता है। लेकिन अगर कोलेस्ट्रॉल बहुत ज्यादा हो या जेनेटिक समस्या जैसे फैमिलियल हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया हो तो दवा खाना जरूरी होता है।

निष्कर्ष

हाई कोलेस्ट्रॉल भले ही चुपचाप रहता हो, लेकिन इसके नतीजे बहुत शोर मचाते हैं। समय रहते ध्यान दिया जाए तो इससे होने वाले नुकसान को रोका जा सकता है। जागरूकता, नियमित जांच और सही इलाज ही इसका सबसे बड़ा समाधान है।

डिस्क्लेमर

यह स्टोरी सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार की गई है। किसी भी तरह के स्वास्थ्य संबंधी बदलाव या डाइट में परिवर्तन करने से पहले अपने डॉक्टर की सलाह जरूर लें।

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