हाल ही में बॉलीवुड अभिनेता Varun Dhawan ने बताया कि उनकी बेटी को डेवलपमेंट डिस्प्लेसिया ऑफ द हिप (DDH) का डायग्नोस हुआ है। ये एक ऐसी परेशानी है जो आमतौर पर नवजात शिशुओं में देखी जाती है। ये एक ऐसी परेशानी है जिसमें शिशु का कूल्हे का जोड़ (hip joint) सही तरीके से विकसित नहीं होता। आमतौर पर जांघ की हड्डी का गोल हिस्सा (ball) कूल्हे के सॉकेट में मजबूती से फिट रहता है। लेकिन DDH में ये जोड़ ढीला हो सकता है और सही जगह से खिसक सकता है या फिर जगह से पूरी तरह डिसलोकेट हो सकता है।
इंद्रप्रस्था अपोलो हॉस्पिटल में ऑर्थोपेडिक और जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी में सीनियर कंसल्टेंट Dr Raju Vaishya ने बताया अगर बच्चे की इस कंडीशन का इलाज नहीं कराया जाए तो इसकी वजह से बच्चे को रेंगने में, चलने और दौड़ने में दिक्कत हो सकती है। उम्र बढ़ने पर अगर इसका इलाज न किया जाए, तो यह बच्चे की रेंगने, चलने और दौड़ने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है और समय के साथ दर्द, लंगड़ापन या जल्दी गठिया का कारण बन सकता है। एक्सपर्ट ने बताया ये समस्या जन्म के समय दिखाई नहीं देती, इसलिए शुरुआती जांच बहुत जरूरी होती है। अगर समय पर पहचान और इलाज हो जाए, तो बच्चे सामान्य जीवन जी सकते हैं।
यह समस्या कितनी आम है?
दुनियाभर में लगभग 0.5% से 1.5% शिशु DDH से प्रभावित करती है। कुछ मामलों में यह हल्की होती है और अपने आप ठीक हो जाती है, जबकि कुछ मामलों में इलाज जरूरी होता है। अनुमान है कि हर 1,000 जीवित जन्मों में लगभग 0 से 2.6 बच्चों में DDH पाया जाता है। हालांकि हल्के मामलों की अक्सर पहचान नहीं होती तो इसलिए यह संख्या कम आंकी जा सकती है।
किन बच्चों को DDH से प्रभावित होने का ज्यादा खतरा
आमतौर पर लड़कियों को DDH से प्रभावित होने का ज्यादा खतरा होता है। मां की पहली संतान को और जिस बच्चे का जन्म उल्टी स्थिति में हुआ हो यानी ब्रीच में जन्मे बच्चे और जिनके परिवार में पहले से DDH की हिस्ट्री रही हो उनको इस बीमारी का ज्यादा खतरा होता है। भारत में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ज्यादातर बच्चों में इसका पता 1-2 साल की उम्र में चलता है, जो कि आदर्श समय से काफी देर है। इसलिए समय पर पहचान के लिए स्क्रीनिंग प्रोग्राम की जरूरत है।
DDH के बच्चों में कौन से दिखते है लक्षण
डॉ. वैश्य के अनुसार, यह स्थिति अक्सर नवजात शिशुओं की नियमित जांच के दौरान पकड़ में आ जाती है। डॉक्टर कूल्हे के जोड़ में अस्थिरता पहचान सकते हैं, भले ही माता-पिता को कोई लक्षण न दिखें। थोड़े बड़े शिशुओं में माता-पिता कुछ संकेत देखकर इस परेशानी का पता लगा सकते हैं जैसे
- पैरों की लंबाई में अंतर
- एक पैर की कम मूवमेंट
जांघ की स्किन की सिलवटों में असमानता
भारत में कई मामलों में देर से पहचान होती है, जहां बच्चे चलने में देरी, लंगड़ापन या असामान्य चाल के साथ डॉक्टर के पास आते हैं।
इसका इलाज कैसे होता है?
DDH का इलाज संभव है और खासकर समय पर पहचान होने पर यह पूरी तरह ठीक भी हो सकता है।
जन्म से 6 महीने तक कैसे होता है ट्रीटमेंट
सॉफ्ट ब्रेस का उपयोग किया जाता है, जिससे हिप सही स्थिति में रहे।
6 महीने से 2 साल के बच्चे का इलाज
बिना सर्जरी के हिप को सही जगह पर लाकर प्लास्टर लगाया जाता है।
बड़े बच्चों में
जिन बच्चों की उम्र 5-6 साल या इससे ज्यादा होती है उनको सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है। डॉ. वैश्य के अनुसार अगर समय पर इलाज हो जाए, तो अधिकांश बच्चों को सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती। अगर समय पर पहचान और इलाज हो जाए, तो ज्यादातर बच्चे सामान्य रूप से चल-फिर सकते हैं।
इलाज में देरी होने पर क्या हो सकता है?
अगर बीमारी की पहचान देर से हो तो बच्चे में लगातार लंगड़ापन हो सकता है। कूल्हे में पुराना दर्द रह सकता है। चलने-फिरने में दिक्कत हो सकती है और गंभीर स्थिति में कम उम्र में ही आर्थराइटिस हो सकता है।
डिस्क्लेमर
यह लेख केवल सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें दी गई जानकारी किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है। DDH या किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लक्षण दिखाई देने पर तुरंत योग्य डॉक्टर या विशेषज्ञ से परामर्श लें। किसी भी उपचार या दवा को अपनाने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक है।
