गॉल ब्लैडर निकालने का एक ऐसा ही मामला हम आपको बता रहे हैं जिसमें एक 46 साल की महिला ने गॉल ब्लैडर की सर्जरी कराई। सर्जरी के बाद महिला लगभग एक साल तक ब्लोटिंग, क्रोनिक डायरिया और एसिड रिफ्लक्स की समस्या से परेशान रही। महिला को अब तला-भुना खाने पर असहजता होती थी और उसका पाचन पहले जैसा नहीं रहा था। महिला ने हेल्थ चेकअप कराया तो पता लगा कि उसे फैटी लिवर की परेशानी है। फैटी लिवर की दिक्कत को सुनकर महिला के मन में पहला सवाल यही आया कि क्या गॉल ब्लैडर निकलने की वजह से ही उसका लिवर फैटी हुआ है।

मैं सुदीप खन्ना  इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल, नई दिल्ली में गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग में वरिष्ठ सलाहकार हूं। एक गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट होने के नाते में बताना चाहता हूं कि सर्जरी खुद फैटी लिवर की वजह नहीं होती। मोटापा, डायबिटीज, इंसुलिन रेजिस्टेंस, अनहेल्दी खानपान और बॉडी एक्टिविटी की कमी फैटी लिवर के प्रमुख कारण हैं। गॉल ब्लैडर हटाना इस बड़ी मेटाबॉलिक तस्वीर का केवल एक छोटा हिस्सा हो सकता है। हालांकि पित्ताशय खुद पित्त यानी बाइल जूस नहीं बनाता, बल्कि यह काम लिवर करता है। लेकिन पित्ताशय हटाने के बाद बाइल के आंत तक पहुंचने का तरीका हमेशा के लिए बदल जाता है। इससे फैट के पाचन, आंतों के माइक्रोबायोम और पाचन प्रक्रिया में बदलाव आ सकते हैं। कुछ अध्ययनों में यह भी संकेत मिला है कि पित्ताशय निकालने वाले लोगों में मेटाबॉलिक डिसफंक्शन एसोसिएटेड स्टिएटोटिक लिवर डिजीज (MASLD) यानी फैटी लिवर का खतरा थोड़ा बढ़ सकता है।

डॉक्टर किन मरीजों का गॉलब्लैडर निकालने की सलाह देते हैं?

गॉलब्लैडर जिसे पित्ताशय भी कहा जाता है, डॉक्टर किसी भी मरीज को गॉलब्लैडर निकालने की सलाह तब देते हैं जब मरीज को पित्त में पथरी हो, गॉल ब्लैडर में सूजन हो,पथरी पित्त नली में फंस गई हो,गॉल ब्लैडर में पॉलिप जैसी और भी कई परेशानियों में गॉल ब्लैडर निकालने की सलाह देते हैं। मेडिकल भाषा में इस प्रक्रिया को कोलेसिस्टेक्टॉमी (Cholecystectomy) कहा जाता है। हालांकि हर समस्या में गॉल ब्लैडर को निकाला नहीं जाता, डॉक्टर उसे निकालने की सलाह तब देते हैं जब परेशानी बढ़ जाती है।

गॉल ब्लैडर निकलवाने के बाद शरीर में क्या बदलाव होते हैं?

गॉल ब्लैडर लिवर के नीचे स्थित एक छोटा अंग होता है, जिसका मुख्य काम लिवर द्वारा बनाए गए बाइल जूस को इकठ्ठा करना और उसे गाढ़ा बनाकर रखना है। जब भी हम भोजन करते हैं, खासकर फैट वाला भोजन, तब पित्ताशय सिकुड़कर बाइल को छोटी आंत में छोड़ता है। यह बाइल वसा को पचाने और वसा में घुलनशील विटामिन A, विटामिन D, विटामिन E और विटामिन K के अवशोषण में मदद करता है। जब पित्ताशय निकाल दिया जाता है यानी कोलेसिस्टेक्टॉमी की जाती है तब भी लिवर पहले की तरह बाइल बनाता रहता है। फर्क सिर्फ इतना होता है कि अब बाइल पित्ताशय में जमा नहीं होता, बल्कि पूरे दिन लगातार थोड़ी-थोड़ी मात्रा में सीधे आंत में पहुंचता रहता है। अधिकांश लोग इस बदलाव के साथ आसानी से  सामंजस्य बैठा लेते हैं और नॉर्मल लाइफ जीते हैं। लेकिन कुछ लोगों को खासकर वसायुक्त भोजन खाने के बाद पाचन संबंधी दिक्कतें महसूस हो सकती हैं।

क्या गॉल ब्लैडर निकलवाने से फैट का पाचन प्रभावित होता है?

मैं गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट हूं और अक्सर मरीजों से सुनने को मिलता हौ कि क्या गॉल ब्लैडर निकलवाने से फैट का पाचन प्रभावित होता है? गॉल ब्लैडर निकलवाने के बाद भोजन के समय एक साथ पर्याप्त मात्रा में गाढ़ा बाइल नहीं निकलता, इसलिए कुछ लोगों में अधिक मात्रा में फैट पचाना थोड़ा मुश्किल हो सकता है जिसकी वजह से मरीजों को कुछ परेशानियां जैसे ब्लोटिंग, अपच, ढीला मल,दस्त, पेट में असहजता जैसी समस्याएं हो सकती है। ये परेशानियां खासतौर पर तला-भुना या ज्यादा चिकनाई वाला भोजन खाने के बाद होती हैं। हालांकि ज्यादातर मामलों में समय के साथ शरीर इस बदलाव के अनुसार खुद को ढाल लेता है और लक्षण धीरे-धीरे कम हो जाते हैं। बहुत कम लोगों को लंबे समय तक इलाज की जरूरत पड़ती है।

गॉल ब्लैडर निकलवाने के बाद क्या सचमुच फैटी लिवर का खतरा बढ़ जाता है?

अब तक ऐसा कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है कि केवल गॉलब्लैडर निकालने से फैटी लिवर हो जाता है। असल में पित्त की पथरी (Gallstones) और फैटी लिवर दोनों के कई जोखिम कारक एक जैसे होते हैं। मोटापा,टाइप-2 डायबिटीज, इंसुलिन रेजिस्टेंस,हाई कोलेस्ट्रॉल, अनहेल्दी खानपान दोनों परेशानियों के लिए ये रिस्क फैक्टर हैं। इनमें से कई समस्याएं मरीजों में सर्जरी से पहले ही मौजूद होती हैं, इसलिए यह तय करना मुश्किल है कि फैटी लिवर का कारण सर्जरी है या पहले से मौजूद मेटाबॉलिक समस्याएं।

वैज्ञानिक गॉल ब्लैडर और फैटी लिवर के बीच संबंध क्यों मानते हैं?

बाइल के प्रवाह में बदलाव और गट माइक्रोबायोम में बदलाव की वजह से गॉल ब्लैडर और फैटी लिवर का कनेक्शन माना जाता है। सर्जरी के बाद बाइल भोजन के समय एक साथ निकलने के बजाय लगातार आंत में पहुंचता रहता है। इससे कुछ लोगों में खासकर भारी भोजन के बाद फैट का पाचन थोड़ा कम प्रभावी हो सकता है। लंबे समय में यह मेटाबॉलिज्म को प्रभावित कर सकता है। गट माइक्रोबायोम में बदलाव यानी बाइल केवल वसा पचाने का काम नहीं करता, बल्कि यह आंतों में मौजूद अच्छे और बुरे बैक्टीरिया के संतुलन को बनाए रखने में भी मदद करता है।

जब बाइल का प्रवाह बदलता है, तो गट माइक्रोबायोम की संरचना भी बदल सकती है। इसके कारण कुछ लोगों में ब्लोटिंग, दस्त, कब्ज, छोटी आंत में बैक्टीरिया की अधिक वृद्धि (SIBO) जैसी समस्याएं हो सकती हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि गट माइक्रोबायोम में गड़बड़ी गट-लिवर एक्सिस के माध्यम से लिवर में सूजन और फैटी लिवर के खतरे को बढ़ा सकती है। अब वैज्ञानिक जानते हैं कि बाइल एसिड सिर्फ पाचन में ही नहीं, बल्कि हार्मोन की तरह भी काम करते हैं। ये ब्लड शुगर कंट्रोल करने, इंसुलिन संवेदनशीलता बढ़ाने, कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करने और शरीर में फैट जमा होने की प्रक्रिया को भी प्रभावित करते हैं। इसलिए पित्ताशय हटने के बाद बाइल एसिड के सामान्य चक्र में बदलाव इन प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है। हालांकि इस विषय पर अभी रिसर्च जारी है और इसे  फिलहाल प्रत्यक्ष कारण नहीं माना जा सकता।

पित्ताशय निकलवाने के बाद लिवर को कैसे रखें हेल्दी?

अधिकांश लोगों को सर्जरी के बाद किसी विशेष दवा की जरूरत नहीं पड़ती। डॉक्टर अक्सर हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाने की सलाह देते हैं, जिससे पाचन और लिवर दोनों हेल्दी रहते हैं। इसके लिए एक बार में बहुत ज्यादा खाने के बजाय कम मात्रा में और संतुलित भोजन करना जरूरी है।  तला-भुना और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का सेवन कम किया जाए। खूब पानी पिएं और फाइबर का सेवन पर्याप्त करें।  धीरे-धीरे नियमित शारीरिक गतिविधि शुरू करें और वजन को कंट्रोल करें। डायबिटीज, ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल में रखें। ये सभी उपाय फैटी लिवर से बचाव में सर्जरी की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

आपको बता दें कि पित्ताशय निकालने की सर्जरी दुनिया भर में सबसे सुरक्षित और सफल ऑपरेशनों में से एक मानी जाती है। अधिकांश मरीजों को इससे पित्त की पथरी के दर्द से स्थायी राहत मिलती है और लंबे समय तक उनकी सेहत पर इसका कोई गंभीर साइड इफेक्ट देखने को नहीं मिलता।  हालांकि यदि सर्जरी के बाद लंबे समय तक पेट संबंधी समस्याएं बनी रहें या फैटी लिवर का पता चले, तो इसे केवल ऑपरेशन का परिणाम मानने के बजाय अपने लाइफस्टाइल, वजन, खानपान और मेटाबॉलिक हेल्थ पर भी ध्यान देना जरूरी है।

(सुदीप खन्ना  इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल, नई दिल्ली में गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग में वरिष्ठ सलाहकार हैं।)