कैंसर से जंग जीतने में कीमोथेरेपी एक प्रभावी हथियार है, लेकिन इसके साथ आने वाले साइड इफेक्ट्स मरीज के शरीर और मनोबल दोनों पर भारी पड़ सकते हैं। कमजोरी, भूख न लगना और मतली जैसी समस्याओं से निपटने में दवाइयों के साथ-साथ सही पोषण भी बड़ी भूमिका निभाता है। कीमोथेरेपी के दौरान कई मरीजों को भोजन का स्वाद कड़वा या धातु जैसा (Metallic taste) महसूस होने लगता है, जिसे मेडिकल भाषा में ‘Dysgeusia’ कहते हैं। इस कारण मरीज खाना कम कर देते हैं, जिससे शरीर में कमजोरी आने लगती है।

अमेरिका के मियामी बीच स्थित माउंट साइनाई मेडिकल सेंटर के ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. माइक कुसनिर के अनुसार, कैंसर उपचार के कई साइड इफेक्ट्स अक्सर रिपोर्ट नहीं होते। उन्होंने बताया कि स्वाद में बदलाव धीरे-धीरे इतनी बड़ी समस्या बन सकता है कि मरीज खाना ही बंद कर देता है, जिससे वजन तेजी से गिरने लगता है।

डॉक्टर कुसनिर ने बताया कि स्वाद में बदलाव के कारण मरीज को हर चीज बिल्कुल फीकी लगने लगती है। शुरुआत में यह मामूली लगता है, लेकिन समय के साथ यह परेशानी बढ़ जाती है और मरीज के पोषण पर असर डालती है। डॉक्टर ने बताया मरीज मुंह के स्वाद को ठीक करने के लिए आम तौर पर प्लास्टिक के बर्तन इस्तेमाल करते हैं, खाने का तापमान बदलते है या मसाले बढ़ाना जैसे उपाय अपनाते हैं, लेकिन इससे ज्यादा फायदा नहीं होता।

हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, कुछ खास फलों का सेवन कीमो के दुष्प्रभावों को कम करने और शरीर की रिकवरी तेज करने में मददगार साबित हो सकता है। कीमोथेरेपी कराने वाले कई मरीज कीमो माउथ नाम की समस्या से जूझते हैं, जिसमें खाने का स्वाद धातु जैसा, फीका या खराब लगने लगता है। इसके कारण मरीजों की भूख कम हो जाती है, वजन घटता है और पोषण की कमी होने लगती है। एक छोटा सा लाल फल कैंसर का इलाज करने में मददगार साबित होता है। एक्सपर्ट ने Synsepalum dulcificum नाम के एक छोटे लाल फल का जिक्र किया, जिसे आमतौर पर मिरेकल फ्रूट कहा जाता है, जो कैंसर का इलाज करा रहे मरीजों को खाना बेहतर तरीके से खाने में मदद करता है।

ये फल कैसे कैंसर के मरीजों के लिए है असरदार

डॉ. कुसनिर ने बताया पश्चिम अफ्रीका में पाया जाने वाला ये फल जिसमें मिराकुलान नाम का प्रोटीन होता है, जो कुछ समय के लिए स्वाद की अनुभूति बदल देता है। एक्सपर्ट ने बताया जब मैंने पहले नींबू चखा तो वह खट्टा था। लेकिन इस फल को खाने के बाद वही नींबू मीठा लगने लगा, जैसे नींबू पानी। इस फल का असर आमतौर पर 30 से 40 मिनट तक रहता है। हालांकि वैज्ञानिक अभी भी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि यह अलग-अलग लोगों पर अलग तरह से क्यों काम करता है।

एक छोटे क्लिनिकल अध्ययन में पाया गया कि जिन मरीजों ने इस फल का इस्तेमाल किया, उनमें से लगभग आधे ने स्वाद में सुधार महसूस किया और उनकी जीवन गुणवत्ता बेहतर हुई। करीब 14% मरीजों का वजन भी बढ़ा। हालांकि यह फल सभी पर समान रूप से असरदार नहीं रहा और अभी इसके परिणाम शुरुआती माने जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी प्रभावशीलता और सुरक्षा को लेकर और गहन शोध की जरूरत है। यह फल बहुत नाजुक होता है, इसलिए इसे अक्सर फ्रोजन, टैबलेट या पाउडर के रूप में बेचा जाता है, ताकि इसका प्रभाव बना रहे। हाल के वर्षों में इसकी उपलब्धता बढ़ी है, लेकिन अलग-अलग उत्पादों की गुणवत्ता में फर्क हो सकता है। डॉ. कुसनिर के अनुसार हालांकि अब तक सीमित अध्ययनों में इसके कोई साइड इफेक्ट नहीं दिखे हैं। फिर भी मरीजों को इसे इस्तेमाल करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

कुछ विशेषज्ञ इसे डायबिटीज मरीजों के लिए भी उपयोगी मानते हैं, क्योंकि यह कम शुगर वाले खाने को भी स्वादिष्ट बना सकता है। डॉक्टरों का कहना है कि कीमोथेरेपी के दौरान स्वाद में बदलाव मरीजों के लिए रोजमर्रा की जिंदगी को कठिन बना देता है। इससे वे सामाजिक रूप से अलग-थलग भी पड़ सकते हैं। ऐसे में अगर कोई चीज मरीज को दोबारा खाने का आनंद दिला सके, तो यह उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों के लिए फायदेमंद हो सकता है।