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लैंगिक समता को बड़ा आघात

लैंगिक विषमता को दूर करने के प्रयास और संघर्ष आज महामारी के कारण अपने लक्ष्य से और दूर हो गए हैं। पिछले साल के अंत में ‘यूएन वुमन’ ने अपने एक विश्लेषणात्मक अध्ययन में बताया था कि कोरोना के कारण दुनिया लैंगिक समानता में हुई बढ़ोतरी के मामले में 25 साल पुराने स्तर तक पिछड़ सकती है।

सांकेतिक फोटो।

लैंगिक विषमता को दूर करने के प्रयास और संघर्ष आज महामारी के कारण अपने लक्ष्य से और दूर हो गए हैं। पिछले साल के अंत में ‘यूएन वुमन’ ने अपने एक विश्लेषणात्मक अध्ययन में बताया था कि कोरोना के कारण दुनिया लैंगिक समानता में हुई बढ़ोतरी के मामले में 25 साल पुराने स्तर तक पिछड़ सकती है। महामारी के प्रभाव के कारण पहले के मुकाबले महिलाओं के हिस्से किस तरह घरेलू काम और परिवार की देखभाल ज्यादा आ गई है, इस बारे में तो कई अध्ययन सामने आ चुके हैं। ये सारे अध्ययन एक स्वर में बता रहे हैं कि कोरोना की मार महिलाओं के लिए बहुस्तरीय है और इससे उबरने में उन्हें काफी वक्त लगेगा।

‘यूएन वुमन’ की डिप्टी एक्जिक्यूटिव अनीता भाटिया जब यह कहती हैं कि हमने पिछले 25 सालों में जो भी काम किया है, उस पर पानी फिर सकता है तो साथ में वो इस बात को भी रेखांकित करती हैं कि इस समय महिलाओं पर देखभाल का जो भार बढ़ा है, उससे 1950 के समय की लैंगिक रूढ़ियों के फिर से कायम होने का खतरा पैदा हो गया है। महामारी से पहले भी, यह अनुमान लगाया गया था कि 16 अरब घंटे के अवैतनिक कामों में से लगभग तीन चौथाई काम महिलाएं ही कर रही थीं। ये पूरी दुनिया में हर दिन का हाल था। दूसरे शब्दों में, कोविड-19 से पहले एक घंटे का अवैतनिक काम पुरुष और तीन घंटे का महिलाएं कर रही थीं।

जाहिर है कि महामारी के एक साल से ऊपर के सफरनामे में ये आंकड़े और बढ़े होंगे। भाटिया अपने आकलन में कहती हैं, ‘अगर महामारी से पहले महिलाओं का अवैतनिक काम पुरुषों से तीन तीन गुना था तो मुझे यकीन है कि महिलाओं के अवैतनिक काम के घंटे अब दोगुने हो गए होंगे।’ आगे वह यह भी जोड़ती हैं कि ज्यादा चिंता की बात तो यह है कि अधिकतर महिलाएं अब काम पर वापस ही नहीं लौट रही हैं। साफ है कि ‘यूनएन वुमन’ की यह चेतावनी निराधार नहीं है कि कोरोना के कारण दुश्वारियों ने महिलाओं को न सिर्फ आर्थिक बल्कि लैंगिक समानता के कई मोर्चों पर कमजोर किया है।

विश्व आर्थिक संगठन की ‘वैश्विक लैंगिक भेद अनुपात रिपोर्ट 2021’ ने ‘यूएन वूमन’ के आकलन को और प्रामाणिक आधार दिया है। इसके मुताबिक दुनियाभर में कोरोना की वजह से असमानता बढ़ी है। इस रिपोर्ट का सीधा सा आशय यह कि महिला-पुरुष के समाज में बराबरी पर आने और लाने की बात हर मंच पर होती है लेकिन रिपोर्ट यह बताती है वास्तविक समानता लाने में एक सदी से ज्यादा का वक्त लगेगा। रिपोर्ट के मुताबिक अब महिला-पुरुषों के बीच समानता आने में करीब 135.6 साल लग जाएंगे, जो पिछले साल तक 99.5 साल थे। यानी साल भर में यह अंतर करीब 36 साल बढ़ा है।

वैश्विक आर्थिक मंच की इस रिपोर्ट 2021 में 156 देशों की सूची में भारत 28 पायदान फिसलकर 140वें स्थान पर आ गया है, साथ ही दक्षिण एशिया में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला तीसरा देश भी है। इससे पहले 2020 में 153 देशों में भारत का स्थान 112वें नंबर पर था। यह रिपोर्ट 30 मार्च 2021 को जारी हुई है। भारत के पड़ोसी मुल्कों में से बांग्लादेश इस सूची में 65, नेपाल 106, पाकिस्तान 153, अफगानिस्तान 156, भूटान 130 और श्रीलंका 116वें स्थान पर हैं।

दक्षिण एशिया में केवल पाकिस्तान और अफगानिस्तान सूची में भारत से नीचे हैं। महिला-पुरुष समानता के मामले में आइसलैंड लगातार 12वें साल दुनिया में पहले स्थान पर रहा। वहां समानता का स्तर करीब 90 फीसद है, यानी सबसे कम भेदभाव यहां है। महिला-पुरुष समानता में दूसरे स्थान पर फिनलैंड, तीसरे पर नार्वे, चौथे पर न्यूजीलैंड और पांचवें पर स्वीडन है।

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