प्रचलन और परंपरा

जैविक उत्पादों की मांग बेहद बढ़ गई है। दरअसल, यह बाजार की तरफ से परोसा गया ऐसा झांसा है जिस पर पहली नजर में यकीन नहीं करने का कोई कारण समझ में नहीं आता है।

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सांकेतिक फोटो।

जैविक उत्पादों की मांग बेहद बढ़ गई है। दरअसल, यह बाजार की तरफ से परोसा गया ऐसा झांसा है जिस पर पहली नजर में यकीन नहीं करने का कोई कारण समझ में नहीं आता है। उलटे जैविक उत्पादों के सेवन को खानपान को लेकर हाल के दशकों में आई जागरूकता के तौर पर ही ज्यादा देखा-सराहा जाता है। पर अब जब ऐसे उत्पादों को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो लोगों के सामने बड़ी दुविधा है। महाराष्ट्र में ऐसे मुद्दों पर कार्य कर रही संस्था ‘भव्यता फाउंडेशन’ के संस्थापक चैतन्य बताते हैं कि बाजार में मौजूद उत्पादों पर सवालिया निशान हैं, जिसकी वजह है इनकी जांच प्रक्रिया में उपभोक्ता की भागीदारी का न होना। जब तक यह प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होगी, उपभोक्ता के छले जाने की गुंजाइश बनी रहेगी।

खासतौर पर ‘मल्टीग्रेन’ उत्पादों को लेकर बाजार में प्रचलित दावों को लेकर चैतन्य कहते हैं, ‘अनाज और दालों के मिश्रण से उनके पोषण तत्व में इजाफा होता है। इस तरह के मिश्रण से एक की कमी की भरपाई दूसरा कर देता है। आयुर्वेद के पैमानों पर देखें तो पेट के रेशे या अग्नि और पाचन नली के माध्यम से ही उत्तकों में पोषक तत्व शोषित होते हैं और कोशिका में जाकर जीवन प्रणाली को सुचारू रखते हैं। इस मिश्रण में गड़बड़ी ही अपच, खाने के पेट में सड़ने और गैस की समस्याओं की जड़ है। इसीलिए मल्टीग्रेन की अवधारणा पर खूब मंथन होना चाहिए।’

खाद्य तेल के उपयोग के बारे में वे कहते हैं कि खाने में रिफाइंड तेल के इस्तेमाल से फैटी एसिड (पीयूएफ) बनते हैं जो उच्च ताप को नहीं सह सकते। बीजों से तेल निकालने की प्रक्रिया में ही ट्रांस फैट में बदल जाने से दिल की बीमारियों और टाइप-2 मधुमेह का खतरा बढ़ जाता है। जबकि पारंपरिक प्रक्रिया से निकाले गए तेल में एंटी आॅक्सीडेंट, विटामिन, फॉस्फोलिपिड, प्रोटीन सब होता है। प्राकृतिक तरीके से निकाले तेल में विटामिन ई भी होता है जो सूजन कम करने और घाव भरने में कारगर होता है।

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