क्या आपने कभी सोचा है कि आप जो खाना खा रहे हैं, वह शरीर से बाहर कब निकलता है? मेडिकल साइंस में इसे गट ट्रांजिट टाइम (Gut Transit Time) कहा जाता है। आसान शब्दों में, खाना पच कर मल के रूप में बाहर आने में जितना समय लेता है, वही गट ट्रांजिट टाइम है, और यही आपकी सेहत के कई अहम संकेत देता है। हालिया रिसर्च बताती है कि मल का पेट में जरूरत से ज्यादा देर रहना न केवल कब्ज का संकेत है, बल्कि यह आपके मेटाबॉलिज्म और एनर्जी लेवल को भी प्रभावित करता है।

कितना होना चाहिए सामान्य ट्रांजिट टाइम ?

आमतौर पर एक हेल्दी इंसान में यह समय 24 से 72 घंटे के बीच होता है। अगर खाना बहुत जल्दी यानी 24 घंटे से कम समय में बाहर निकल जाता है, तो शरीर जरूरी पोषक तत्व ठीक से अवशोषित नहीं कर पाता। अगर बहुत देर यानी 72 घंटे से ज्यादा समय तक टिकता है, तो कब्ज की समस्या हो सकती है और मल सख्त हो जाता है, जिससे पेट फूलना, सुस्ती और स्किन से जुड़ी दिक्कतें हो सकती हैं।

रिसर्च क्या कहती है?

2023 की एक बड़ी रिसर्च में पाया गया कि जिन लोगों का पेट जल्दी साफ होता है और जिनका देर से, उनके आंतों के बैक्टीरिया (माइक्रोबायोम) अलग-अलग होते हैं। यही माइक्रोबायोम हमारी सेहत से जुड़े होते है, इसलिए इसका फर्क शरीर पर भी असर डालता है। जिन लोगों को कब्ज या स्लो ट्रांजिट टाइम की समस्या होती है, उनमें मेटाबॉलिक और सूजन से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। कुछ मामलों में इसका संबंध Parkinson’s disease जैसी बीमारियों से भी देखा गया है। यह स्टडी University of Copenhagen के वैज्ञानिकों Nicola Procházková और Henrik Roager के नेतृत्व में की गई थी।

खाना और मल आंतों में कितनी देर रहते हैं?

आंतों में खाना और मल आंतों में कितनी देर तक रहते हैं इसे जानने के लिए शोधकर्ताओं ने पहले से प्रकाशित स्टडी के डेटा का विश्लेषण किया, जिसमें लोगों के गट ट्रांजिट टाइम, मल की बनावट, डाइट, माइक्रोबायोम की संरचना और बैक्टीरिया द्वारा बनाए गए मेटाबोलाइट्स शामिल थे। इस विश्लेषण में हजारों प्रतिभागियों के डेटा को शामिल किया गया, जिनमें स्वस्थ लोग और Irritable Bowel Syndrome, कब्ज और लिवर सिरोसिस जैसी बीमारियों से ग्रस्त लोग भी शामिल थे। रिसर्च के मुताबिक गट ट्रांजिट टाइम को समझना सिर्फ यह देखने से नहीं होता कि आप कितनी बार शौच जाते हैं। इसके लिए कुछ विशेष कैप्सूल का उपयोग किया जाता है, जिनमें सेंसर लगे होते हैं और जो पाचन तंत्र के अंदर अपनी यात्रा रिकॉर्ड करते हैं।

कैसे मापा जाता है गट ट्रांजिट टाइम?

सिर्फ यह देखना कि आप कितनी बार टॉयलेट जाते हैं, काफी नहीं है। इसके लिए Bristol Stool Scale का इस्तेमाल होता है, जिसमें मल की बनावट से अंदाजा लगाया जाता है
कुछ मामलों में सेंसर वाले कैप्सूल या खास फूड मार्कर का भी उपयोग किया जाता है।

आंतों में क्या होता है?

जितनी देर खाना आंतों में रहता है, उतना ज्यादा समय बैक्टीरिया को उसे तोड़ने का मिलता है। इससे ऐसे केमिकल (मेटाबोलाइट्स) बनते हैं, जो हमारी सेहत को प्रभावित करते हैं। तेज ट्रांजिट टाइम में कार्बोहाइड्रेट पर पनपने वाले बैक्टीरिया ज्यादा होते है और धीमा ट्रांजिट टाइम में प्रोटीन पर पनपने वाले बैक्टीरिया ज्यादा होते हैं। दोनों ही स्थितियों में बैक्टीरिया की विविधता कम हो जाती है, जबकि संतुलित ट्रांजिट टाइम बेहतर हेल्थ का संकेत है।

क्यों जरूरी है इसे समझना?

हर व्यक्ति का गट ट्रांजिट टाइम अलग होता है, इसलिए एक ही डाइट सभी पर एक जैसा असर नहीं करती। Probiotics या दवाओं का असर भी अलग-अलग हो सकता है। पेट का जल्दी या देर से साफ होना सिर्फ एक आदत नहीं, बल्कि आपकी सेहत का बड़ा संकेत है। अगर इसे समझ कर डाइट और लाइफस्टाइल को मैनेज किया जाए, तो कई बीमारियों से बचाव और बेहतर इलाज संभव हो सकता है।

डिस्क्लेमर : यह जानकारी सामान्य जागरूकता के उद्देश्य से दी गई है। यह किसी भी तरह से पेशेवर मेडिकल सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है। यदि आपको पाचन, कब्ज, ब्लोटिंग या अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्या है, तो किसी योग्य डॉक्टर या हेल्थ एक्सपर्ट से सलाह जरूर लें।