मौसम में बदलाव, धूल-मिट्टी या अचानक बढ़ते प्रदूषण के कारण सांस लेने में तकलीफ की समस्या बढ़ सकती है। अक्सर लोग यह मानते हैं कि अस्थमा यानी दमा का अटैक एकदम अचानक आता है, लेकिन चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि हमारा शरीर अटैक आने से कुछ घंटे या दिन पहले ही इसके शुरुआती संकेत देने लगता है। अगर इन लक्षणों को समय रहते पहचान लिया जाए, तो किसी भी आपातकालीन स्थिति से बचा जा सकता है।
संत परमानंद अस्पताल दिल्ली, में फेफड़ों, गंभीर रोगों और नींद से जुड़ी बीमारियों के विशेषज्ञ डॉ. दीपांश गुप्ता ने जनसत्ता को बताया अस्थमा अटैक एक ऐसी परेशानी है जिसमें सांस की नलियों में सूजन और सिकुड़न बढ़ जाती है, जिससे हवा का फेफड़ों तक पहुंचना और बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। इसे ब्रोंकोस्पाज्म (Bronchospasm) भी कहा जाता है। इसकी वजह से मरीज को छाती में जकड़न, सांस फूलना, खांसी और सांस लेते समय सीटी या सायं-सायं की आवाज जैसी समस्या हो सकती है।
क्या अस्थमा अटैक अचानक आता है या शरीर उससे पहले कुछ संकेत देता है?
अस्थमा अटैक हमेशा अचानक नहीं आता। कुछ मरीजों में अटैक से पहले खांसी बढ़ना, सीने में जकड़न, सांस फूलना, सांस लेते समय सीटी या सायं-सायं की आवाज जैसे लक्षण बढ़ सकते हैं। लेकिन कई बार लक्षण बिना किसी स्पष्ट चेतावनी के भी अचानक शुरू हो सकते हैं। वायरल इंफेक्शन, धूल-धुआं, एलर्जी, ठंडी हवा या मौसम में बदलाव जैसे ट्रिगर अटैक को भड़का सकते हैं। इसलिए अस्थमा मरीजों को अपने सामान्य लक्षणों में होने वाले बदलाव पर ध्यान देना चाहिए और डॉक्टर द्वारा बताए गए एक्शन प्लान का पालन करना चाहिए।
अस्थमा अटैक कितनी देर तक रहता है?
अस्थमा अटैक के लक्षण कुछ मिनट से लेकर कई घंटों तक रह सकते हैं। अगर समय पर इलाज न मिले या अटैक गंभीर हो, तो समस्या कई दिनों तक भी बनी रह सकती है। गंभीर स्थिति में सांस लेने में बहुत ज्यादा परेशानी हो सकती है और यह जानलेवा भी हो सकता है।
अस्थमा अटैक के लक्षणों की पहचान कैसे करें?
छाती में जकड़न, सांस लेते समय सायं-सायं की आवाज, बहुत ज्यादा सांस फूलना और लगातार खांसी अस्थमा अटैक के प्रमुख लक्षण हो सकते हैं। अगर अस्थमा का मरीज अपना इनहेलर लेने के बाद भी सांस लेने में परेशानी महसूस कर रहा है, तो उसे जल्द से जल्द डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। हर बार अस्थमा अटैक से पहले शरीर कोई स्पष्ट चेतावनी नहीं देता। कई बार लक्षण अचानक शुरू हो सकते हैं। हालांकि, कुछ मरीजों में पहले से खांसी, नजला-जुकाम या सांस संबंधी परेशानी बढ़ सकती है। वायरल इंफेक्शन, निमोनिया या अन्य संक्रमण भी कुछ लोगों में अस्थमा अटैक को ट्रिगर कर सकते हैं।
एलर्जी और अस्थमा में क्या संबंध है?
एलर्जी कई लोगों में अस्थमा का ट्रिगर हो सकती है। धूल, धुआं, परागकण, परफ्यूम, ठंडी हवा या अन्य एलर्जेन के संपर्क में आने पर कुछ लोगों में सांस की नलियों में सूजन और सिकुड़न बढ़ सकती है। एलर्जी से एलर्जिक राइनाइटिस यानी छींक और नाक बहने की समस्या भी हो सकती है और कुछ लोगों में इसके साथ अस्थमा भी मौजूद हो सकता है।
अस्थमा के मरीजों में सुबह के समय खांसी क्यों बढ़ जाती है?
अस्थमा के मरीजों में रात के समय सांस संबंधी परेशानी बढ़ सकती है। सुबह उठने पर सांस की नलियों में जमा स्राव पूरी तरह बाहर न निकल पाने के कारण खांसी और बलगम की समस्या ज्यादा महसूस हो सकती है। हालांकि, बार-बार सुबह की खांसी को केवल अस्थमा मान लेना सही नहीं है और इसके पीछे अन्य कारण भी हो सकते हैं।
कोई व्यक्ति खुद कैसे पहचानें कि उसे अस्थमा हो सकता है?
सिर्फ लक्षणों के आधार पर व्यक्ति खुद से अस्थमा का निदान नहीं कर सकता। अगर बार-बार छाती में जकड़न, सांस फूलना, सायं-सायं की आवाज, खांसी या मौसम बदलने पर सांस संबंधी परेशानी होती है, तो डॉक्टर से जांच करवानी चाहिए। खासकर अगर धूल-मिट्टी, धुआं, ठंडी हवा या किसी खास एलर्जेन के संपर्क में आने पर लक्षण बढ़ते हैं, तो अस्थमा की जांच जरूरी हो सकती है।
अस्थमा की पहचान के लिए कौन सा टेस्ट होता है?
अस्थमा की जांच के लिए डॉक्टर पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट (PFT) या स्पाइरोमेट्री जैसी जांच कर सकते हैं। इससे यह पता लगाने में मदद मिलती है कि फेफड़े कितनी अच्छी तरह काम कर रहे हैं और सांस की नलियों में रुकावट है या नहीं। इसलिए केवल अपने लक्षणों को देखकर खुद से अस्थमा की पुष्टि नहीं करनी चाहिए।
धुएं, परफ्यूम और ठंडी हवा से खांसी हो तो क्या यह अस्थमा है?
इन चीजों के संपर्क में आने के बाद खांसी, सांस फूलना, सीने में जकड़न या सायं-सायं की आवाज आना अस्थमा के लक्षण हो सकते हैं, लेकिन केवल इन लक्षणों से अस्थमा की पुष्टि नहीं की जा सकती। ये एलर्जी या सांस की दूसरी समस्याओं से भी जुड़े हो सकते हैं। बार-बार ऐसा होने पर डॉक्टर से जांच कराना बेहतर है।
सीजनल अस्थमा क्या होता है?
कुछ लोगों में अस्थमा के लक्षण खास मौसम या मौसम बदलने के दौरान ज्यादा दिखाई देते हैं। इसे सीजनल अस्थमा कहा जाता है। ऐसे मरीजों में मौसम के साथ बदलने वाले एलर्जेन, ठंडी हवा या वायरल संक्रमण जैसे कारक लक्षणों को बढ़ा सकते हैं। उपचार मरीज के लक्षणों और अस्थमा की गंभीरता के अनुसार तय किया जाता है।
Peak Flow Meter क्या है और यह कैसे मदद करता है?
Peak Flow Meter एक ऐसा उपकरण है जिससे मरीज अपने Peak Expiratory Flow Rate (PEFR) यानी फेफड़ों से हवा को तेजी से बाहर निकालने की क्षमता को माप सकता है। लंबे समय से अस्थमा से जूझ रहे मरीज के लिए इसकी नियमित रीडिंग उपयोगी हो सकती है। अगर उसकी रीडिंग लगातार कम हो रही है या सुबह और शाम की रीडिंग में सामान्य से ज्यादा अंतर आने लगा है, तो यह संकेत हो सकता है कि अस्थमा अच्छी तरह नियंत्रित नहीं है। इसकी सही निगरानी और व्यक्तिगत सीमा डॉक्टर की सलाह से तय करनी चाहिए।
अस्थमा के मरीज किन चीजों से बचें?
सबसे जरूरी है कि मरीज अपने अस्थमा ट्रिगर को पहचाने और उससे बचने की कोशिश करे। धूल-मिट्टी, धुआं, परफ्यूम, ठंडी हवा, मौसम में बदलाव या किसी खास एलर्जेन से लक्षण बढ़ते हैं तो उस स्थिति में अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। मौसम बदलने पर कुछ मरीजों को मास्क का इस्तेमाल करने और डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाओं को नियमित रूप से लेने की जरूरत हो सकती है।
अस्थमा मरीजों के लिए वैक्सीनेशन क्यों जरूरी हो सकता है?
कुछ श्वसन संक्रमण अस्थमा के लक्षणों को बढ़ा सकते हैं। इसलिए डॉक्टर मरीज की उम्र, स्वास्थ्य और जोखिम के आधार पर इन्फ्लुएंजा और न्यूमोकोकल वैक्सीनेशन की सलाह दे सकते हैं। कौन-से टीके जरूरी हैं, यह डॉक्टर से व्यक्तिगत सलाह लेकर तय करना चाहिए।
अस्थमा का इलाज कैसे किया जाता है?
अस्थमा के इलाज का तरीका उसकी गंभीरता और नियंत्रण पर निर्भर करता है। हल्के अटैक में डॉक्टर द्वारा निर्धारित रिलीवर दवा या इनहेलर का इस्तेमाल किया जा सकता है, जबकि मध्यम या गंभीर अटैक में नेबुलाइजेशन, स्टेरॉयड या अस्पताल में उपचार की जरूरत पड़ सकती है। गंभीर स्थिति में मरीज को ICU की देखभाल भी आवश्यक हो सकती है। दवाओं की मात्रा या इनहेलर की फ्रीक्वेंसी खुद से नहीं बढ़ानी चाहिए।
क्या अस्थमा मरीज एक्सरसाइज कर सकते हैं?
अस्थमा होने का मतलब यह नहीं है कि मरीज को एक्सरसाइज छोड़ देनी चाहिए। डॉक्टर की सलाह और बीमारी के उचित नियंत्रण के साथ नियमित शारीरिक गतिविधि सामान्य फिटनेस के लिए फायदेमंद हो सकती है। अगर एक्सरसाइज के दौरान बार-बार सांस फूलती है, खांसी या सीने में जकड़न होती है, तो डॉक्टर को इसकी जानकारी देनी चाहिए।
अस्थमा में डाइट का क्या ध्यान रखें?
अस्थमा मरीजों के लिए कोई एक खास डाइट जरूरी नहीं होती। अगर किसी व्यक्ति को किसी विशेष खाद्य पदार्थ से एलर्जी होने की पुष्टि हुई है और उससे लक्षण बढ़ते हैं, तो डॉक्टर की सलाह से उस चीज से बचना चाहिए। केवल यह मानकर कि कोई खास भोजन अस्थमा को बढ़ाता है, बिना पुष्टि के कई खाद्य पदार्थों को डाइट से हटाना उचित नहीं है।
एलर्जी की पहचान कैसे की जाती है?
अगर डॉक्टर को एलर्जी की आशंका होती है, तो स्थिति के अनुसार स्किन प्रिक टेस्ट या ब्लड टेस्ट की मदद ली जा सकती है। कुछ मामलों में एलर्जी टेस्टिंग के जरिए संभावित एलर्जेन की पहचान करने में मदद मिलती है। हालांकि, हर अस्थमा मरीज को व्यापक एलर्जी पैनल की जरूरत हो, यह जरूरी नहीं है।
नहाते समय अस्थमा मरीजों को सांस क्यों फूल सकती है?
नहाने के दौरान गर्म पानी की भाप, नमी, तापमान में अचानक बदलाव या बाथरूम में मौजूद फंगस जैसे कारक कुछ संवेदनशील लोगों में सांस संबंधी लक्षणों को ट्रिगर कर सकते हैं। लेकिन नहाते समय सांस फूलना केवल अस्थमा की वजह से हो, यह जरूरी नहीं है। अगर यह समस्या बार-बार होती है, तो डॉक्टर से कारण की जांच करानी चाहिए।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी और विशेषज्ञ की सलाह पर आधारित है। अस्थमा के लक्षण और अटैक की गंभीरता हर व्यक्ति में अलग हो सकती है। सांस लेने में गंभीर परेशानी, बोलने में दिक्कत या इनहेलर के बाद भी राहत न मिलने पर तुरंत चिकित्सकीय सहायता लें। यह जानकारी डॉक्टर की जांच और उपचार का विकल्प नहीं है।
