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अकेले बैठकर पीते हैं शराब तो हो सकती है ये बीमारी, जानिए- क्या है इसके लक्षण?

शराबखोरी वह स्थिति है जब व्यक्ति शराब का अधिक सेवन करता है और शारीरिक व मानसिक दिक्कतें होने के बावजूद भी लगातार शराब पीता है।

शराबखोरी होने से शारीरिक, मानसिक, सामाजिक दिक्कतें होना शुरू हो जाती है।

कई लोग कभी-कभी शराब का सेवन करते हैं तो कई लोग हर रोज या दिन में कई बार शराब पीते हैं। अधिक मात्रा में शराब के सेवन से शराबखोरी होने का खतरा भी बढ़ जाता है। जी हां शराबखोरी वह स्थिति है जब व्यक्ति शराब का अधिक सेवन करता है और शारीरिक व मानसिक दिक्कतें होने के बावजूद भी लगातार शराब पीता है। शराबखोरी होने से शारीरिक, मानसिक, सामाजिक दिक्कतें होना शुरू हो जाती है, जिसमें शराब विषाक्तता, लीवर की दिक्कतें, कार्य में असमर्थता और मानसिक दिक्कतें शामिल है। लेकिन आपको बता दें कि शराबखोरी लिंग संबंधी बीमारी नहीं होती है और यह महिला, पुरुष दोनों को हो सकती है।

शराबखोरी के लक्षण- इस स्थिति में व्यक्ति शराब के नुकसान जानने के बाद भी इसका लगातार सेवन करता है और अधिकतर अकेले में शराब पीता है। वहीं जब शराब पीने वाले से पीने के बारे में पूछा जाए तो वो प्रतिकूल हो जाता है। साथ ही व्यक्ति शराब पीने के लिए अलग अलग बहाने ढूंढता है और ज्यादा शराब से काम पर असर पड़ना शुरू हो जाता है और प्रतिभा के प्रदर्शन में कमी आने लगती है। अगर कोई शराब पीने से रोकने की कोशिश करता है, तो व्यक्ति हिंसक हो जाता है। शराब से पीड़ित व्यक्ति की याददाश्त कमजोर और समस्यापूर्ण हो जाती है, जिसे ब्लैकआउट कहा जाता है। शराब का सेवन करने वाले व्यक्ति की भूख कम हो जाती है, क्योंकि उसके यकृत (लीवर) की परेशानी और पाचन प्रणाली की सूजन, हृदय की जलन और मतली को पैदा करती हैं।

कैसे करें इलाज- इसकी के बारे में जानकारी खून में अल्कोहल का स्तर जानकार, खून की जांच कर, लीवर की जांचकर, मैग्नेशियम की जांच कर करके ली जाती है। शराबखोरी होने पर डॉक्टर की परामर्श लेना आवश्यक है और उसी के साथ खुद पर कंट्रोल रखना बहुत जरुरी है। कई लोग सीबीटी के माध्यम से भी शराब छोड़ देते हैं। इसके लिए आप आयुर्वेद आदि का सहारा भी ले सकते हैं। शराबखोरी से बचने के लिए क्लोर्डाइजीपौक्साइड का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। वहीं शराब की इच्छा को कम करने के लिए अकेम्प्रोसेट और नाल्ट्रिक्जोन की अच्छा विकल्प है, इन दवाओं को निश्चित मात्रा में दिया जाता है। आमतौर पर ये दवाएं व्यक्ति को छह से बारह महीनों तक दी जाती है।

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