ताज़ा खबर
 

अस्पताल में होते हैं फंगल संक्रमण के 15 फीसद तक मामले

विशेषज्ञ मानते हैं कि 100 फीसद असंक्रमित वातावरण बनाना लगभग असंभव होता है, यहां तक कि अस्पताल में भी। ज्यादातर मामलों में मरीज में पहले से ही सुप्त अवस्था में संक्रमण मौजूद होता है।

Author August 11, 2019 6:47 AM
अस्पताल में पनपने वाला संक्रमण ज्यादा खतरनाक होता है।

बारिश के मौसम में खास तौर से पनपने वाले फंगल संक्रमण कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले मरीजों के लिए जानलेवा बन सकते हैं। इनवेसिव फंगल संक्रमण उन मरीजों को होता है जिनकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है। जिनमें अनियंत्रित मधुमेह, कैंसर, सर्जरी और अंग प्रत्यारोपण कराने वाले मरीज शामिल हैं। सामुदायिक संक्रमण भी अक्सर तब सामने आते हैं जब मरीज कोई इलाज करा रहा होता है और उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है। बारिश के मौसम में इनवेसिव फंगल संक्रमण की चपेट में आने से बचने के लिए डॉक्टरों के खास सुझाव हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कमजोर प्रतिरोधकता (इम्यूनिटी कम्प्रोमाइज्ड) वाले मरीज फंगस जैसे पैथोजीन का अटैक होने पर उनसे मुकाबला करने में सक्षम नहीं होते हैं। ऐसा अनुमान है कि फंगल संक्रमण के 10-15 फीसद मामले अस्पताल में होते हैं और इनमें बीमार पड़ने (मॉर्बिडिटी) और मृत्यु का खतरा अधिक रहता है। क्योंकि अस्पताल में पनपने वाला संक्रमण ज्यादा खतरनाक होता है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि 100 फीसद असंक्रमित वातावरण बनाना लगभग असंभव होता है, यहां तक कि अस्पताल में भी। ज्यादातर मामलों में मरीज में पहले से ही सुप्त अवस्था में संक्रमण मौजूद होता है। श्वसन विज्ञान, क्रिटिकल केयर व स्लीप मेडिसिन के विशेषज्ञ डॉ प्रशांत सक्सेना का कहना है कि ऐस्परजिलोसिस और कैंडीडायसिस सबसे आम इनवेसिव फंगल संक्रमण हैं जो अस्पताल में होते हैं। इनवेसिव फंगल संक्रमण की पहचान और इसका इलाज कठिन होता है। अक्सर डॉक्टर इन संक्रमण की पहचान विभिन्न प्रकार के डाइग्नोस्टिक टेस्टिंग के जरिए करते हैं। फंगल संक्रमण को ठीक करने के लिए लंबे इलाज की जरूरत पड़ती है जो कि करीब छह हफ्तों तक चलता है।

उन्होंने बताया कि रोग प्रतिरोधक क्षमता उनकी कमजोर होती है जिनमें जटिल सर्जरी करा रहे लोग, जो अपनी बीमारी के इलाज के लिए थेरेपी के तहत दवाओं की हाई डोज ले रहे होते हैं। अंग प्रत्यारोपण के मामले में भी यह आवश्यक होता है कि मरीज की प्रतिरोध क्षमता कम की जाए ताकि नए अंग को उनका शरीर आसानी से स्वीकार कर ले, जो कि वैसे प्राकृतिक प्रतिरोध सिस्टम में साथ रिजेक्ट हो सकता है। लंबे समय तक एंटीबायोटिक दवाओं का दुरुपयोग, स्टेरॉइड का इस्तेमाल और अन्य कारक कमजोर प्रतिरोध क्षमता के लिए जिम्मेदार होते हैं।
डॉ प्रशांत सक्सेना का कहना है कि इनवेसिव फंगल संक्रमण होने पर लंबे समय तक आइसीयू में रहना पड़ता है। ठीक होने में अधिक समय लगता है। इनवेसिव फंगल संक्रमण को नियंत्रित रखने अथवा अस्पताल में होने वाले संक्रमण से बचाव के लिए अस्पताल तमाम एहतियात बरतते हैं। जैसे लंबे समय तक मरीज को कैथेटर लगाकर रखने से बचना, एंटीबायटिक का कम से कम उपयोग, एंटीबायटिक के संबंध में तय दिशानिर्देशों का पालन और पर्याप्त निगरानी।

लक्षण
जागरुकता महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले मरीज और उनके परिवार के सदस्यों को बुखार, सिर दर्द और विशेषकर आंखों में सूजन जैसे लक्षणों को लेकर सतर्क रहना चाहिए। मगर कई बार यह इनवेसिव फंगल संक्रमण का सिग्नल भी हो सकते हैं। ऐसे में इनके बारे में तुरंत डॉक्टर को बताया जाना चाहिए।

बचाव
बिना डॉक्टर से पूछे दवाओं के इस्तेमाल से बचें।
अस्पताल के नियमों का पालन करें। इससे संक्रमण को भीतर जाने से रोक सकते हैं।
मरीज से मिलने आने वालों को फूल लेकर अंदर नहीं जाना चाहिए।
जिन लोगों की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो उन्हें बागवानी, जंगल के हरित क्षेत्र में ट्रेकिंग आदि करने से बचना चाहिए।
निर्माणाधीन जगहों पर जाने से बचें।
मरीज को एन95-99 मास्क पहनें।
घर में एचपीईए-बेस्ड एअर फिल्टरेशन सिस्टम होने से छोटे कण भी छन जाते हैं।
जिससे मरीज के कमरे में फंगी के बीज पहुंचने से रोका जा सकता है।
मरीज को चिड़िया अथवा किसी अन्य पालतू जानवर के बीट आदि से बचना चाहिए।
मरीज को नर्म, अधिक पके फल व सब्जियां नहीं खानी चाहिए। काले धब्बे वाली सब्जियां जैसे कि प्याज नहीं खाना चाहिए।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 दिन में पिएंगे इतने कप कॉफी तो बढ़ जाएगा माइग्रेन का खतरा
2 दुनिया से खत्म हो जाएगा कुपोषण, अगर मिल जाएं यह चार बेहद सस्ती चीजें
3 जानिए कैसे भारतीय खानों के मिश्रण में छिपा है प्रोटीन का खजाना