पश्चिमी एशिया में फिर से तनाव बढ़ने के बीच दुनिया भर में कच्चे तेल और पेट्रोलियम की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। इसका असर देश की तीन सरकारी तेल कंपनियों इंडियन ऑयल (IOC), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) पर पड़ रहा है। घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की कीमतें नहीं बढ़ाए जाने के कारण इन कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
रेटिंग एजेंसी ICRA के आकलन के मुताबिक, फिलहाल इन कंपनियों को डीजल की हर लीटर बिक्री पर करीब 9 रुपये, पेट्रोल पर 8 रुपये और घरेलू एलपीजी के हर सिलेंडर पर करीब 300 रुपये का नुकसान हो रहा है। तीनों कंपनियों को ईंधन बेचने के कारोबार में रोजाना करीब 530 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है।
अगर चालू वित्त वर्ष (2026-27) की दूसरी छमाही में कच्चे तेल की कीमत 105 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती है और पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ाए जाते हैं, तो 2026-27 में इन कंपनियों को पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर 64,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हो सकता है। इसी तरह, अगर अक्टूबर से मार्च के बीच कच्चे तेल की कीमत 105 डॉलर से ऊपर बनी रहती है और घरेलू एलपीजी के दाम नहीं बढ़ते हैं, तो तीनों कंपनियों का एलपीजी कारोबार में कुल नुकसान एक लाख करोड़ रुपये से अधिक हो सकता है। आईसीआरए ने यह अनुमान लगाया है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और तेल की आपूर्ति में रुकावट के कारण हाल के हफ्तों में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। अमेरिका और ईरान के बीच फिर शुरू हुए संघर्ष, सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के बंद होने और बाब-अल-मंदेब तथा लाल सागर क्षेत्र में हूती हमलों के बढ़ते खतरे ने तेल की कीमतों को ऊपर पहुंचाया है।
भारत के लिए खरीदे जाने वाले कच्चे तेल की औसत कीमत 21 सितंबर को बढ़कर 117.4 डॉलर प्रति बैरल हो गई। 2025-26 में यह औसतन करीब 66 डॉलर प्रति बैरल थी।
तेल कंपनियों को अपनी रिफाइनरियों में कच्चे तेल को पेट्रोल, डीजल और दूसरे उत्पादों में बदलने से फायदा हो रहा है। दुनिया भर में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत और मार्जिन बढ़ने से उनकी रिफाइनिंग से होने वाली कमाई बढ़ी है। लेकिन यह फायदा तीनों भारतीय कंपनियों के कुल नुकसान की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि ये कंपनियां जितना ईंधन अपनी रिफाइनरियों में बनाती हैं, उससे कहीं ज्यादा मात्रा में पेट्रोल और डीजल बेचती हैं। अतिरिक्त ईंधन उन्हें दूसरी रिफाइनरियों से खरीदना पड़ता है। इनमें ऐसी निजी रिफाइनरियां भी शामिल हैं, जिनका अपना बड़ा खुदरा नेटवर्क नहीं है।
देश में पेट्रोल और डीजल बेचने वाले कुल खुदरा केंद्रों में करीब 90 प्रतिशत नेटवर्क इन तीन सरकारी तेल कंपनियों के पास है। घरेलू इस्तेमाल के लिए एलपीजी बेचने के मामले में भी ये तीनों कंपनियां ही मुख्य विक्रेता हैं।
तेल कंपनियों पर बोझ
भारत दुनिया में कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है। अपनी जरूरत का 88 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल भारत दूसरे देशों से आयात करता है।
पश्चिम एशिया में छह महीने से जारी संघर्ष के बीच तेल कंपनियों ने पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की बढ़ी कीमतों का पूरा बोझ ग्राहकों पर नहीं डाला। इससे कंपनियों को भारी नुकसान हुआ।
पिछले दो-तीन महीनों में तेल बेचने से होने वाला नुकसान कुछ कम हुआ था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें फिर तेजी से बढ़ने के कारण यह नुकसान दोबारा बढ़ने लगा है।
तीनों सरकारी तेल कंपनियों को अप्रैल-जून तिमाही में कुल मिलाकर 18,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का शुद्ध घाटा हुआ। तीन महीने से ज्यादा समय से पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। आखिरी बार मई में चार चरणों में पेट्रोल की कीमत कुल 7.35 रुपये और डीजल की कीमत 7.53 रुपये प्रति लीटर बढ़ाई गई थी। इसके बावजूद कंपनियों को पेट्रोल-डीजल बेचने पर नुकसान उठाना पड़ रहा है।
ICRA के वरिष्ठ उपाध्यक्ष प्रशांत वशिष्ठ ने कहा कि अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ते हैं, तो तेल कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बढ़ेगा। इससे कामकाज के लिए उन्हें कम अवधि में ज्यादा कर्ज भी लेना पड़ सकता है।
वशिष्ठ ने कहा कि 2026-27 में इन कंपनियों की कमाई पर असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कच्चे तेल की कीमतें कितनी रहती हैं, पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में कितना अंतर रहता है, घरेलू ईंधन की कीमतों में बदलाव होता है या नहीं तथा सरकार एलपीजी पर होने वाले नुकसान की कितनी भरपाई करती है।
सरकार आम तौर पर पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर होने वाले नुकसान की भरपाई नहीं करती, क्योंकि इन दोनों की कीमतें आधिकारिक तौर पर बाजार से ही तय होती हैं। सरकार इनकी कीमतों को नियंत्रित नहीं करती। हालांकि, सरकार अभी घरेलू एलपीजी की कीमतें नियंत्रित करती है। इसलिए पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने तेल कंपनियों को एलपीजी पर हुए नुकसान की भरपाई के लिए विशेष आर्थिक सहायता दी है।
आईसीआरए के मुताबिक, 30 जून 2026 तक एलपीजी कारोबार में तेल कंपनियों का कुल नुकसान बढ़कर 61,940 करोड़ रुपये हो गया था। पश्चिम एशिया में आपूर्ति बाधित होने के बाद अंतरराष्ट्रीय एलपीजी कीमतों में बढ़ोतरी का पूरा असर घरेलू ग्राहकों पर नहीं डाला गया, जिससे कंपनियों का नुकसान बढ़ा। जून तिमाही में एक एलपीजी सिलेंडर पर अनुमानित नुकसान करीब 500 रुपये था, जो सितंबर 2026 में घटकर करीब 300 रुपये रह गया। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में एलपीजी की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और घरेलू कीमतों में उसी अनुपात में बढ़ोतरी नहीं होती या सरकार अतिरिक्त मदद नहीं देती, तो यह नुकसान और बढ़ सकता है।
आईसीआरए के विश्लेषकों के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत 85 से 90 डॉलर प्रति बैरल के बीच रहने पर तेल कंपनियों का रिफाइनिंग और ईंधन बेचने का पूरा कारोबार लगभग बराबरी पर आ जाता है। लेकिन अगर कीमत इससे ऊपर जाती है और पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ाए जाते हैं, तो ईंधन बेचने में होने वाले नुकसान की भरपाई रिफाइनरी से होने वाले फायदे से पूरी तरह नहीं हो पाती।
अलग-अलग तेल कीमतों पर कितना नुकसान हो सकता है?
आईसीआरए के आकलन के मुताबिक, अगर चालू वित्त वर्ष के बाकी समय में ब्रेंट कच्चे तेल की औसत कीमत 105 से 115 डॉलर प्रति बैरल रहती है और घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतें नहीं बढ़ती हैं, तो 2026-27 में तेल कंपनियों को पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर करीब 64,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है। इस स्थिति में अगर पेट्रोल और डीजल की कीमतें 4 से 6 रुपये प्रति लीटर बढ़ा दी जाएं, तो ईंधन बेचने से होने वाले नुकसान की भरपाई हो सकती है।
अगर ब्रेंट कच्चे तेल की औसत कीमत 130 से 140 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती है, तो पेट्रोल-डीजल पर नुकसान करीब 1.9 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ सकता है। इस स्थिति में पेट्रोल और डीजल के दाम 6 रुपये प्रति लीटर बढ़ाने के बाद भी नुकसान की पूरी भरपाई होने की संभावना नहीं है।
अगर कच्चे तेल की कीमत 85 से 95 डॉलर प्रति बैरल के बीच रहती है, तो तेल कंपनियों को पेट्रोल-डीजल बेचने के कारोबार में बिना कीमत बढ़ाए भी मुनाफा हो सकता है।
घरेलू एलपीजी के मामले में तेल कंपनियों को प्रति सिलेंडर 90 रुपये तक कीमत बढ़ाए जाने के बाद भी नुकसान होने का अनुमान है।
अगर कच्चे तेल की कीमत 115 से 125 डॉलर प्रति बैरल के बीच रहती है, तो घरेलू एलपीजी की कीमत में कोई बदलाव नहीं होने पर सालाना नुकसान करीब 1.21 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। 90 रुपये प्रति सिलेंडर की बढ़ोतरी के बाद भी यह नुकसान करीब 1.03 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है।
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पश्चिमी एशिया में तनाव के कारण रसोई गैस (एलपीजी)की आपूर्ति में रुकावटें आई हैं। वहीं पिछले 12 महीनों के आंकड़ों के मुताबिक संघर्ष के बाद के 6 महीनों में भारत के कुल एलपीजी आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी बढ़कर 50% से अधिक हो गई है, जो युद्ध से 6 महीने पहले लगभग 10% थी। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।
