महाराष्ट्र में सूखा घोषित करने की लगातार मांग हो रही है। अल नीनो के कारण बारिश कम होने से पानी की किल्लत और बढ़ गई है। इससे न केवल खरीफ की खेती प्रभावित हुई है, बल्कि रबी की खेती भी प्रभावित होने की संभावना है।
शरद पवार सहित कई विपक्षी नेताओं ने राज्य में आधिकारिक तौर पर सूखा घोषित करने की मांग की है। हालांकि, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस का कहना है कि सरकार इस ‘चिंताजनक’ स्थिति से निपटने के लिए ‘सभी जरूरी कदम’ उठा रही है।
महाराष्ट्र में आधिकारिक रूप से सूखा घोषित क्यों नहीं किया गया है?
राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) के नियमों के अनुसार, खरीफ के लिए सूखे की घोषणा का आकलन 5 अक्टूबर के बाद ही शुरू किया जा सकता है। यह वक्त है जब मानसून लौटना शुरू होता है। वहीं रबी के लिए यह आकलन मार्च 2027 में किया जा सकता है।
पूरे भारत में सूखे की कोई एक सर्वमान्य परिभाषा नहीं है। राज्यों को स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर सूखा घोषित करने का अधिकार है। लेकिन राज्य सरकार की रिपोर्ट NDRF के नियमों के तहत तय मानकों के अनुकूल होनी चाहिए, ताकि केंद्र सरकार से राहत कोष जारी कराया जा सके।
महाराष्ट्र ने 5 अक्टूबर के बाद वित्तीय सहायता के लिए केंद्र को प्रस्ताव भेजने का फैसला किया है।
राज्य सरकार ने फसल के नुकसान का आकलन करने के लिए सर्वेक्षण और पंचनामे शुरू कर दिए हैं, ताकि प्रशासन अनाज उत्पादन और वित्तीय नुकसान दोनों का सही आंकड़ा जुटा सके। एक बार जब यह रिपोर्ट सौंप दी जाएगी, तो राहत राशि जारी करने से पहले केंद्र की एक टीम प्रभावित क्षेत्रों का खुद दौरा करके स्थिति का आकलन करेगी।
NDRF के नियमों के तहत, सूखे की घोषणा फसल के नुकसान, नमी की पर्याप्तता सूचकांक, बारिश की कमी के साथ-साथ अनाज उत्पादन में गिरावट और काम की तलाश में मजदूरों के पलायन के आधार पर की जाती है। बुआई कुल खेती योग्य खरीफ/रबी क्षेत्र के 50 प्रतिशत से कम होनी चाहिए, पीने के पानी की किल्लत गंभीर होनी चाहिए, भूजल स्तर में गिरावट होना चाहिए, चारे की कमी होनी चाहिए और बारिश की कमी 70 प्रतिशत तक होनी चाहिए।
पूरे महाराष्ट्र में इस सीजन में अनिश्चित बारिश के कारण खरीफ की बुआई में देरी हुई—10 जून के बजाय बुआई 15 जुलाई को शुरू हो सकी। बुआई के बाद बारिश न होने से फसलों में फूल और फल आने की प्रक्रिया रुक गई। सबसे ज्यादा मार सोयाबीन और कपास पर पड़ी है, जो मराठवाड़ा और विदर्भ के छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका का मुख्य आधार हैं। सूखे के इस दौर ने मराठवाड़ा और पश्चिमी महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में गन्ने की पैदावार को भी प्रभावित किया है।
जुलाई में मानसून सत्र के दौरान, मुख्यमंत्री ने 40,385 करोड़ रुपये के कर्ज माफी की घोषणा की थी। इसमें नियमित रूप से कर्ज चुकाने वालों के लिए 50,000 रुपये का अतिरिक्त प्रोत्साहन शामिल था।
महाराष्ट्र में पानी की क्या स्थिति है?
एक बड़ी चिंता पीने के पानी की किल्लत है। 20 सितंबर तक के आंकड़ों से पता चलता है कि महाराष्ट्र के 138 बड़े बांधों में क्षमता का केवल 85 प्रतिशत और 264 मध्यम बांधों में 65 प्रतिशत पानी ही बचा है। पिछले साल इसी समय ये क्रमशः 96 प्रतिशत और 77 प्रतिशत थे। राज्य के 2,630 छोटे/सूक्ष्म बांधों की स्थिति और भी खराब है, जहाँ पिछले साल के 57 प्रतिशत के मुकाबले केवल 43 प्रतिशत पानी ही बचा है।
क्षेत्रवार देखें तो मराठवाड़ा के 929 बांधों में केवल 46 प्रतिशत पानी बचा है, जबकि पिछले साल यह 81 प्रतिशत था। इसके बाद अमरावती प्रभाग में 64 प्रतिशत, नागपुर प्रभाग में 72 प्रतिशत, पुणे में 88 प्रतिशत, नासिक में 83 प्रतिशत और कोंकण में 76 प्रतिशत पानी उपलब्ध है।
महाराष्ट्र में बारिश का क्या हाल है?
मौसम विभाग के अनुसार, महाराष्ट्र के 36 में से 31 जिलों में बारिश की कमी दर्ज की गई है। इनमें से 20 जिले ऐसे हैं जहाँ 25 से 58 प्रतिशत तक की कमी है। केवल कमी ही नहीं, बल्कि बारिश के बदलते तरीके ने नुकसान को और बढ़ा दिया है- राज्य के 355 सूखाग्रस्त तालुकों में से 100 से अधिक में बारिश के दौर के बीच का अंतर 40 से 60 दिनों तक बढ़ गया। नतीजतन, 147 लाख हेक्टेयर में बोई गई मुख्य खरीफ फसल सूख गई है।
पुराने ढर्रे से अलग, जहाँ बारिश हुई भी, वहाँ भी बहुत कम समय के लिए लेकिन बहुत तेज हुई। इससे मिट्टी की सेहत खराब हुई और कुछ इलाकों में कटाव हुआ। महाराष्ट्र की खेती मुख्य रूप से बारिश पर निर्भर है। इसकी सिंचाई क्षमता 20 प्रतिशत से भी कम है, जो उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की तुलना में काफी कम है।
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धरती जब सूरज के ताप से झुलसने लगे, तब केवल मौसम नहीं बदलता, जीवन का पूरा संतुलन डगमगाने लगता है। कभी जेठ की दोपहर ऋतु का स्वाभाविक स्वभाव मानी जाती थी, मगर आज वही तपती दोपहर भीषण गर्मी का पर्याय बनती जा रही है। खेतों की नमी सूख रही है, नदियों का जल सिकुड़ रहा है, पेड़ों की हरियाली पीली पड़ती जा रही है और किसानों के चेहरे पर भविष्य की चिंता की गहरी रेखाएं उभर रही हैं। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।
