सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को हाथी गलियारों (एलिफेंट कॉरिडोर्स) का नए सिरे से सर्वेक्षण करने का आदेश दिया है। कोर्ट का कहना है कि हाथियों के झुंड स्वभाव से ही लंबी दूरी तय करते हैं, इसलिए फसलों के नुकसान के डर से इन रास्तों को नहीं रोका जा सकता।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ मनुष्यों और हाथियों के बीच बढ़ते संघर्ष से जुड़ी एक पुरानी याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में हाथियों को भगाने के लिए आग के गोले फेंकने, नुकीली सरियों का इस्तेमाल करने और ऐसे अन्य हिंसक तरीकों पर रोक लगाने की मांग की गई थी।

पीठ ने 17 अगस्त के अपने आदेश में केंद्र सरकार से पूछा कि हाथियों के प्राकृतिक रास्ते बदलने के लिए अपनाए जाने वाले इन तरीकों या ऐसे किसी भी ‘बलपूर्वक कदम’ को रोकने के लिए अब तक क्या कार्रवाई की गई है।

हाथी गलियारे दरअसल वे प्राकृतिक रास्ते हैं जो दो अलग-अलग जंगलों या हाथियों के ठिकानों को आपस में जोड़ते हैं। पर्यावरण मंत्रालय ने इन रास्तों को स्पष्ट रूप से चिन्हित किया है। हाथियों की आवाजाही बिना किसी रुकावट के होती रहे, इसके लिए ये गलियारे बहुत जरूरी हैं। इनमें बाधा आने से न सिर्फ इंसानों और हाथियों के बीच टकराव बढ़ता है, बल्कि खुद हाथियों की जान पर भी खतरा मंडराने लगता है। आइए समझते हैं कि ये गलियारे आखिर इतने अहम क्यों हैं।

लेकिन सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि हाथी इतनी लंबी दूरी क्यों तय करते हैं?

एशियाई हाथी काफी घूमते-फिरते हैं और सामाजिक झुंडों में रहने वाले जीव हैं। एक नर हाथी का औसतन ‘होम रेंज’ (वह दायरा जहाँ वह आमतौर पर भोजन, पानी और रहने की जगह तलाशता है) 50 से 300 वर्ग किलोमीटर तक फैला होता है। संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर यह दायरा और बड़ा भी हो सकता है। हाथी अपने इस इलाके में झुंड बनाकर या अकेले, दोनों तरह से आवाजाही करते हैं। यह इलाका जंगल के प्रकार, भोजन और पानी की उपलब्धता, हाथियों की संख्या और इंसानी दखल के हिसाब से घटता-बढ़ता रहता है।

नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज और वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के अध्ययनों के मुताबिक, हाथियों की आवाजाही सीधे तौर पर इस बात पर निर्भर करती है कि किस मौसम में कहाँ भोजन और पानी उपलब्ध है। उदाहरण के लिए, दक्षिण भारत में मानव-हाथी संघर्ष पर पर्यावरण मंत्रालय की एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया कि सूखे के महीनों में हाथियों का केरल की ओर जाना आम बात है, क्योंकि वे पश्चिमी घाट के अपेक्षाकृत नम जंगलों में पानी और भोजन की तलाश में पहुँचते हैं।

इतिहास गवाह है कि जलवायु परिवर्तन और सूखे ने भी हाथियों को हमेशा से एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए मजबूर किया है।

इस पूरे सिलसिले में इन गलियारों की भूमिका बेहद अहम है। इनके जरिए हाथी भोजन की तलाश, अपने प्राकृतिक क्षेत्र में फैलाव और रोज़मर्रा की आवाजाही के लिए सुरक्षित रूप से एक जगह से दूसरी जगह जा पाते हैं। लेकिन सड़कों और इमारतों का निर्माण, खनन और खेती का विस्तार लगातार इन प्राकृतिक रास्तों को प्रभावित कर रहा है।

गलियारों और प्राकृतिक आवासों का विखंडन

मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के निर्देश मुख्य रूप से अलग-अलग राज्यों से गुजरने वाले हाथी गलियारों में खड़ी की जा रही रुकावटों और उससे पैदा होने वाले मानव-हाथी संघर्ष के मुद्दे पर ही केंद्रित थे।

हाथी गलियारे कई वजहों से बाधित होते हैं। हाल के सालों में सड़कों, पुलों, फैक्ट्रियों और खदानों का निर्माण इसके सबसे बड़े कारण बनकर उभरे हैं। राजमार्ग, नई-पुरानी रेलवे लाइनें, नहरें और बिजली की बड़ी लाइनें जैसे बुनियादी ढांचे हाथियों का रास्ता रोक देते हैं। नतीजतन, हाथी खेतों और इंसानी बस्तियों की ओर रुख करने लगते हैं, जिससे टकराव शुरू हो जाता है।

भारत में हाथियों के मुख्य रूप से चार बड़े इलाके हैं—पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर पहाड़ियां और ब्रह्मपुत्र के मैदानी इलाके, शिवालिक पहाड़ियां और गंगा के मैदान, तथा मध्य भारत और पूर्वी घाट। भारत में मौजूद कुल 22,446 हाथियों में से आधे से ज्यादा अकेले पश्चिमी घाट के तीन राज्यों—कर्नाटक (6,013), तमिलनाडु (3,136) और केरल (2,785) में रहते हैं।

लेकिन कभी एक-दूसरे से जुड़े रहने वाले पश्चिमी घाट के ये जंगल अब तेजी से टुकड़ों में बंट रहे हैं। जमीन के बदलते इस्तेमाल, चाय-कॉफी के बागानों, बेकाबू फैलती बेकार वनस्पतियों और खेतों की बाड़बंदी ने इस पूरे इलाके को बांट दिया है। पिछले साल आई अखिल भारतीय हाथी गणना रिपोर्ट में भी इस समस्या पर चिंता जताई गई थी।

ऐसी ही रुकावटें शिवालिक और ब्रह्मपुत्र के मैदानी इलाकों में भी देखने को मिलीं, जहाँ पारंपरिक रास्ते विखंडित हो रहे हैं। यहाँ रेलवे लाइनों, सड़कों, बिजली के खंभों और जमीनों के व्यावसायिक इस्तेमाल को मुख्य वजह बताया गया।

हालाँकि, हाथी संरक्षण के लिहाज से सबसे गंभीर चुनौती मध्य भारत और पूर्वी घाट के इलाके में खड़ी हुई है। पिछले कुछ दशकों में इस क्षेत्र में हाथियों की संख्या बढ़ी है। 1980 के दशक के मध्य से ही इस इलाके में हाथियों की आवाजाही तेजी से बढ़ी।

जंगलों के खात्मे और खनन के दबाव के कारण पिछले 20 सालों में झारखंड और ओडिशा से हाथी बड़ी संख्या में छत्तीसगढ़ पहुँचे हैं। इतना ही नहीं, अब हाथी मध्य प्रदेश के उमरिया और शहडोल तथा महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले तक फैल चुके हैं।

गलियारों की मैपिंग

ये गलियारे बिखरे हुए जंगलों और हाथियों के आवासों को आपस में जोड़ते हैं। इनके जरिए अलग-अलग झुंडों के बीच आवाजाही और आनुवंशिक मेलजोल बना रहता है, जिससे हाथियों की आबादी में आनुवंशिक विविधता कायम रहता है। गलियारे सुरक्षित रहें तो मौसम के बदलाव के दौरान हाथियों को जंगल के भीतर ही भोजन और पानी मिल सकता है। इससे उनके खेतों और इंसानी बस्तियों में जाने की संभावना भी कम होती है।

साल 2023 में सरकार द्वारा कराए गए सर्वे में 15 राज्यों के 4 प्रमुख क्षेत्रों में कुल 150 हाथी गलियारों की पहचान की गई थी। वहीं, दक्षिण भारत में मानव-हाथी संघर्ष पर आई हालिया रिपोर्ट में इन रास्तों में आने वाली रुकावटों को चिन्हित किया गया, जिससे यह साफ होता है कि हाथियों का सफर कितना मुश्किल हो चुका है।

रिपोर्ट में दक्षिणी क्षेत्र के 32 गलियारों में कई बड़ी बाधाएं पाई गईं—जैसे हाईवे, बेंगलुरु-चेन्नई रेलवे लाइन, पनबिजली परियोजनाएं, हाई-टेंशन बिजली लाइनें, बिजली के झटके देने वाली बाड़ें, पत्थर की खदानें, सिकुड़ते रास्ते, चाय-कॉफी के बागान, रिसॉर्ट्स और आश्रम।

देश में सबसे ज्यादा हाथी गलियारे पश्चिम बंगाल में दर्ज किए गए, जहाँ उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों को मिलाकर 26 गलियारे चिन्हित हुए। इन गलियारों की लंबाई-चौड़ाई अलग-अलग है। उदाहरण के लिए, मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ में स्थित चरमार-जिंगोल गलियारा 20 किमी लंबा और 2.5 किमी चौड़ा है। यह पर्यावरण के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण गलियारा है, जिससे होकर हर साल करीब 80 से 100 हाथी ओडिशा से छत्तीसगढ़ के अंदरूनी जंगलों तक आसानी से आते-जाते हैं।

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ओडिशा के कंधमाल जिले के बालिगुडा फॉरेस्ट रेंज में बीते महीने एक हाथी की करंट लगकर मौत हो गई थी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।