वित्त वर्ष 2013-14 में, देश के पशुपालन क्षेत्र से होने वाली कमाई फसलों से होने वाली कमाई के मुकाबले लगभग एक तिहाई (34%) थी। लेकिन 2023-24 तक आते-आते यह बढ़कर आधी से भी ज़्यादा (57%) हो गई। सीधे शब्दों में कहें तो दूध, अंडे, मांस और दूसरे पशु उत्पादों से होने वाली कमाई अनाज, तिलहन, गन्ना, कपास, सब्जियों, फलों और मसालों जैसी फसलों की कीमत की बराबरी करने की तरफ तेज़ी से बढ़ रही है।

हालांकि, पशुओं और मुर्गियों के चारे की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण इसके विकास में भी बाधाएं उत्पन्न हो रही हैं।

मुर्गियों, गायों, भैंसों, भेड़ों, बकरियों और सूअरों को चारे में कार्बोहाइड्रेट की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, जो मुख्य रूप से मक्के से मिलता है। मांस के लिए पाली जाने वाली मुर्गियों के दाने में वजन के हिसाब से 55-65% मक्का होता है, जबकि अंडे देने वाली मुर्गियों के दाने में 50-60% और गाय-भैंसों के चारे में 15-20% मक्का मिलाया जाता है।

कार्बोहाइड्रेट के अलावा इन्हें प्रोटीन, कैल्शियम और फास्फोरस जैसे खनिज, विटामिन, फाइबर, वसा और अन्य चीज़ों की ज़रूरत होती है। प्रोटीन मुख्य रूप से सोयाबीन, सरसों, मूंगफली, सूरजमुखी, बिनौले या चावल की भूसी से तेल निकालने के बाद बची ठोस खली से मिलता है। मांस के लिए पाली जाने वाली मुर्गियों के दाने में 25-30% और अंडे देने वाली मुर्गियों के दाने में 18-20% सोयाबीन की खली होती है। वहीं मवेशियों के बने-बनाए चारे में 40-50% तक अलग-अलग तरह की खली का इस्तेमाल होता है।

आसमान छूते दाम

तमिलनाडु के इरोड जिले की अलंगयम मंडी में मक्के का औसतन भाव अगस्त 2025 में 2,537 रुपये प्रति क्विंटल था, जो अगस्त 2026 में बढ़कर 2,759 रुपये प्रति क्विंटल हो गया। मार्च 2026 के बाद से दामों में यह तेज़ी और भी ज़्यादा देखी गई है।

नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज के मुताबिक, मध्य प्रदेश के इंदौर में सोयाबीन की खली (50% प्रोटीन वाली) की कीमत अगस्त 2025 में 38,186 रुपये प्रति टन थी, जो अगस्त 2026 में उछलकर 58,156 रुपये प्रति टन हो गई। इस महीने कीमतें गिरकर 48,750-49,000 रुपये प्रति टन पर आई हैं, लेकिन फिर भी यह सितंबर 2025 के औसतन भाव 35,327 रुपये से बहुत ज़्यादा हैं।

प्रोटीन के बाकी जरियों का भी यही हाल है। ‘सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ के मुताबिक, मूंगफली और सरसों की खली फिलहाल क्रमशः 38,000 रुपये और 32,600 रुपये प्रति टन पर बिक रही है, जबकि सितंबर 2025 में इनका औसतन भाव क्रमशः 24,188 रुपये और 24,479 रुपये था। इसी तरह बिनौले की खली (30,500 के मुकाबले 36,000 रुपये) और चावल की भूसी की खली (13,669 रुपये के मुकाबले 20,400 रुपये) के दाम भी काफी बढ़े हैं।

CLFMA के चेयरमैन दिव्य कुमार गुलाटी ने बताया, “सोयाबीन की खली के दाम 63,000-64,000 रुपये के अपने सबसे ऊंचे स्तर से थोड़े कम हुए हैं। लेकिन जैसे ही वे थोड़े नरम पड़े, मक्के के दाम चढ़ने लगे। यह बिल्कुल पिंग-पॉन्ग खेल जैसा हो गया है।”

इसका क्या असर पड़ रहा है

नेशनल एग को-ऑर्डिनेशन कमेटी (NECC) द्वारा तय की गई थोक दरों के मुताबिक, दिल्ली में अंडों का भाव 600 रुपया प्रति 100 अंडा चल रहा है। वहीं खुदरा बाज़ार में दुकानें इसे 7 रुपये से 9 रुपये प्रति अंडे के हिसाब से बेच रही हैं (यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप 30 अंडों की ट्रे ले रहे हैं या कम मात्रा में)।

अंडों की मांग और कीमतें आमतौर पर दिवाली के बाद, सर्दियों की शुरुआत और वसंत के मौसम में बढ़ती हैं। गर्मी और मानसून के शुरुआती दिनों में तापमान बढ़ने पर दाम गिर जाते हैं। सबसे बड़ी गिरावट त्योहारों के दौरान आती है — सावन (जुलाई अंत से सितंबर शुरुआत), पितृ पक्ष (सितंबर अंत से अक्टूबर शुरुआत) और नवरात्रि (अक्टूबर मध्य) से लेकर दिवाली व छठ पूजा (नवंबर की शुरुआत से मध्य) तक — जब कई हिंदू परिवारों में अंडे नहीं खाए जाते।

लेकिन इस साल, NECC की सुझाई कीमतें जुलाई में ही 725-730 रुपये प्रति 100 अंडे तक पहुंच गईं, जिसमें जुलाई का औसतन भाव 670.5 रुपये रहा, जो पिछले साल से 38.7% ज़्यादा था। NECC के मुख्य परिचालन अधिकारी संजीव चिंतावार ने समझाया, “कई वजहें एक साथ आ गईं। भीषण गर्मी और एल नीनो की वजह से बारिश में देरी से पानी की किल्लत हुई, जिससे मुर्गियाँ बीमार पड़ीं और उनकी मौत का आंकड़ा बढ़ा। इसके अलावा, जुलाई में मक्के और सोयाबीन खली दोनों के दाम अचानक बहुत बढ़ गए।”

हालांकि सावन की वजह से अंडों के दाम थोड़े कम हुए हैं, लेकिन चारे की महंगाई की चुनौती वैसी ही बनी हुई है। चिंतावार ने कहा, “पिछले चार महीनों में अंडे देने वाली मुर्गियों के दाने की कीमत 24-26 रुपये से बढ़कर 30-32 रुपये प्रति किलो हो गई है। किसान की कुल अंडा उत्पादन लागत में 65-70% खर्च सिर्फ दाने का होता है।”

उत्तर भारत में जून के अंत और जुलाई की शुरुआत में ब्रायलर मुर्गे के थोक दाम भी 150 रुपये प्रति किलो (जीवित वजन) को पार कर गए थे। सावन के बाद अब ये 120 रुपये प्रति किलो के आसपास टिके हैं।

पोल्ट्री फेडरेशन ऑफ इंडिया के संयुक्त सचिव विक्की थापर ने कहा, “पिछले चार महीनों में ब्रायलर के दाने के दाम 40 रुपये से बढ़कर 46 रुपये प्रति किलो हो गए हैं, जिससे किसानों का मुनाफा बहुत कम हो गया है। अब उनकी कुल उत्पादन लागत ही लगभग 110 रुपये प्रति किलो आ रही है।”

किसान 35-45 ग्राम के एक दिन के चूजे को 35-42 दिनों में खिला-पिलाकर 2-2.5 किलो का तैयार मुर्गा बनाते हैं। वहीं, अंडे देने वाली मुर्गियों का चक्र लंबा होता है। वे 18-20 हफ्ते में अंडे देना शुरू करती हैं और 70-72 हफ्ते की उम्र तक अंडे देती हैं। एक मुर्गी साल में 250-300 अंडे देती है।

आगे की राह

पिछले कुछ हफ़्तों में सोयाबीन की खली के दामों में थोड़ी कमी आई है।

इसकी एक वजह यह है कि इस खरीफ सीजन में किसानों ने पिछले साल के बराबर ही सोयाबीन बोया है। अक्टूबर-नवंबर में कटाई के लिए तैयार फसल की हालत भी अब तक सामान्य से अच्छी बताई जा रही है और किसी बड़े बीमारी की खबर नहीं है।

बाकी फसलों (जिन्हें ज़्यादा पानी और खाद चाहिए होती है) के मुकाबले सोयाबीन पर एल नीनो का असर कम पड़ा है। इसके अलावा, अपनी खुद की दाना बनाने वाली कुछ बड़ी पोल्ट्री कंपनियों ने बाहर से सोयाबीन मंगवाने के सौदे किए हैं, जो 2025-26 में लगभग 9 लाख टन होने का अनुमान है। इससे स्टॉक और आने वाले समय में इसकी उपलब्धता बेहतर हुई है।

CLFMA के अधिकारी गुलाटी ने चिंता जताते हुए कहा, “हमारी असली चिंता मक्के को लेकर है, जिसकी खरीफ में बुआई घटी है (सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 4.1% कम) और पैदावार का अनुमान भी बहुत अच्छा नहीं है। इसके अलावा, एल नीनो रबी (सर्दियों) की मक्का फसल को भी नुकसान पहुंचा सकता है।”

अमेरिकी कृषि विभाग ने 2026-27 में भारत का मक्का उत्पादन 500 लाख टन रहने का अनुमान लगाया है, जो 2025-26 के रिकॉर्ड 551 लाख टन से काफी कम है।

चीनी के बढ़ते दामों को देखते हुए, नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा अक्टूबर से शुरू हो रहे नए पेराई सीजन में मिलों को एथेनॉल बनाने के लिए गन्ने के रस या गाढ़े शीरे का इस्तेमाल करने से रोकने की उम्मीद है।

अगर मक्के के दाम इसी तरह बढ़ते रहे — जिसका सीधा असर पशुओं के चारे की लागत पर और आखिरकार दूध, अंडे व मांस खरीदने वाले ग्राहकों की जेब पर पड़ेगा — तो एथेनॉल बनाने के लिए मक्के के इस्तेमाल पर भी रोक लगाने पर विचार किया जा सकता है। ऐसा होने पर 2026-27 में पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने (E20) का सरकारी लक्ष्य पूरा करना भी मुश्किल हो जाएगा।

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