जम्मू और कश्मीर में पहले अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के आयोजन के अवसर पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि इसका मकसद फिल्म उद्योग को यह याद दिलाना है कि स्विट्जरलैंड और अन्य देशों से भी पहले बॉलीवुड फिल्मों की शूटिंग कश्मीर में हुआ करती थी। ‘इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ जम्मू एंड कश्मीर’ (IFFJK) का आयोजन 7 से 10 सितंबर तक किया जा रहा है।

अपनी खूबसूरत वादियों के कारण यह घाटी फिल्म निर्माताओं की पहली पसंद हुआ करती थी। लेकिन जैसे ही 1989 में आतंकवाद शुरू हुआ, बॉलीवुड कश्मीर से गायब हो गया। यहाँ जानिए कि कैसे आतंकवादियों की धमकियों की वजह से घाटी में सिनेमाघर बंद हो गए और बॉलीवुड से कश्मीर का नाता टूट गया।

बॉलीवुड का कश्मीर से था पुराना नाता

1989 तक कश्मीर हिंदी फिल्म निर्माताओं का सबसे पसंदीदा ठिकाना था। चाहे शम्मी कपूर और सायरा बानो की फिल्म ‘जंगली’ (1961) हो, या सनी देओल और अमृता सिंह की ‘बेताब’ (1983) फिल्म निर्माता अक्सर शूटिंग के लिए कश्मीर के खूबसूरत नज़ारों का रुख करते थे।

उस समय कश्मीर में एक दर्जन से ज़्यादा सिनेमाघर थे, जिनमें से नौ अकेले राजधानी श्रीनगर में चल रहे थे।

सिनेमाघरों पर क्यों लगा ताला

जैसे ही आतंकवाद फैला, सिनेमाघर और शराब की दुकानें आतंकवादियों के निशाने पर आ गईं। 18 अगस्त 1989 को ‘अल्लाह टाइगर्स’ नाम के एक आतंकी संगठन ने कश्मीर में सिनेमाघरों और शराब की दुकानों पर पूरी तरह से रोक लगाने का ऐलान कर दिया। खुद को ‘एयर मार्शल नूर खान’ कहने वाले अल्लाह टाइगर्स के प्रमुख ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सिनेमाघरों और शराब की दुकानों को ‘गैर-इस्लामी’ बताया और मालिकों को इन्हें बंद करने की धमकी दी। अगले ही कुछ महीनों के भीतर घाटी के सभी सिनेमाघर बंद हो गए।

आतंकवाद बढ़ने के साथ ही सुरक्षा बलों ने इनमें से कई सिनेमाघरों को अपने नियंत्रण में ले लिया और उन्हें अस्थायी शिविरों व पूछताछ केंद्रों में बदल दिया। कुछ अन्य सिनेमाघरों को अस्पतालों, नर्सिंग होम और व्यापारिक केंद्रों में बदल दिया गया।

जब सिनेमाघर बंद हो गए, तो भारतीय सेना ने पहल की और आम जनता के लिए उन सिनेमाघरों को खोल दिया, जहाँ बैरक बनाए थे- जैसे बारामूला में थिमैया हॉल और पट्टन में ज़ोरावर हॉल। लेकिन जैसे-जैसे आतंकवाद बढ़ा और आत्मघाती हमलों से सुरक्षा शिविरों को निशाना बनाया जाने लगा, इन्हें भी सुरक्षा कारणों से जनता के लिए बंद कर दिया गया।

सरकार की कोशिशें

1990 के दशक के मध्य में, जब 1996 में जम्मू और कश्मीर में चुनी हुई सरकार सत्ता में आई, तो उसने ब्याज मुक्त कर्ज देने का वादा करके सिनेमाघरों को दोबारा खोलने पर जोर दिया। 1998-99 में कश्मीर में तीन सिनेमाघर फिर से खुले- उच्च सुरक्षा वाले बदामीबाग छावनी में ‘ब्रॉडवे’, सिविल सचिवालय के पास ‘नीलम’, और शहर के बीचों-बीच स्थित ‘रीगल’ सिनेमा।

24 सितंबर 1999 को रीगल सिनेमा के दोबारा खुलने के पहले ही दिन जब लोग ‘प्यार कोई खेल नहीं’ फिल्म देखकर बाहर निकल रहे थे, तभी आतंकियों ने ग्रेनेड फेंक दिया। इसमें एक नागरिक की मौत हो गई और एक दर्जन से ज़्यादा लोग घायल हो गए। इसके बाद रीगल सिनेमा हमेशा के लिए बंद हो गया। अब इसकी जगह एक बड़ा शॉपिंग सेंटर बन रहा है।

ब्रॉडवे और नीलम सिनेमा चलते रहे, लेकिन दर्शकों की कमी के कारण उन्हें वित्तीय नुकसान होने लगा। ब्रॉडवे 2005 में बंद हो गया, जबकि नीलम 2010 तक किसी तरह चला—इस दौरान 2005 में नीलम सिनेमा पर एक आत्मघाती हमला भी हुआ था। इस तरह घाटी एक बार फिर बिना किसी सिनेमाघर के रह गई।

सिनेमा की वापसी

2022 में ब्रॉडवे सिनेमा के मालिक धर परिवार ने एक और कोशिश की और श्रीनगर के कड़े सुरक्षा वाले शिवपोरा इलाके में घाटी का पहला मल्टीप्लेक्स—आईनॉक्स (INOX)—शुरू किया।

तीन स्क्रीन और 520 सीटों वाला यह मल्टीप्लेक्स अब ‘इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ जम्मू एंड कश्मीर’ (IFFJK) के लिए चुनी गई फिल्मों की स्क्रीनिंग का केंद्र भी है।

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भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने जम्मू के सांबा जिले में स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) को सुरक्षा के लिहाज से ‘संवेदनशील’ माना है और इसीलिए इस संस्थान में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) की सशस्त्र टुकड़ी तैनात की जाएगी। पूरी खबर के लिए यहाँ क्लिक करें।